दिंनाक: 22 Apr 2013 12:15:40 ओ समाज के कर्मठ यतियो! राष्ट्र-धर्म के सेवा-व्रतियो! कैसी पीर पली अन्तर में, इस पर तनिक विचार लो। सोच-समझकर ढंग से इसका कर कोई उपचार लो।। वीरों को जन कर भी भारत मां कितनी असहाय मिली! बहशी दानवता के आगे मानवता निरुपाय मिली। सोचो खुद, इस सबके पीछे कोई तो कारण होंगे। सुविधाओं की चाहत होगी, दुविधाओं के कण होंगे। ओ सुविधाओं की परिणतियो! संस्कृति की संभावित क्षतियो! पानी भर मन के गिलास में ये कण सभी निथार लो। सोच-समझकर ढंग से इसका कर कोई उपचार लो।। 1।। संघर्षों के पथ में किसको, कब-कब बिखरे फूल मिले? पर्वत पर चढ़ने वालों को मौसम कब अनुकूल मिले? प्राणों के, प्रण के बल पर ही ऊपर चढ़ना पड़ता है। तप से आतम को पिघलाकर आगे बढ़ना पड़ता है। ओ विश्वासों की पावतियो! निष्ठाओं की मौन प्रणतियो! अपने तन को वज्र बनाओ, उर में भर अंगार लो। सोच-समझकर ढंग से इसका कर कोई उपचार लो।।2।। यों तो सत, रज, तम, तीनों गुण युग-युग से हैं साथ रहे। ध्वंसों, निर्माणों में सबके अपने-अपने हाथ रहे। पर अन्तर्मन की पलकों ने सत को ही सम्मान दिया। हर वाणी ने सत की ही श्रम-निष्ठा का गुण-गान किया। श्रम-निष्ठा की शुभ सन्ततियो! नयी सदी की मुखर प्रगतियो! सदाचरण से अपने वश में कर सारा संसार लो। सोच-समझकर ढंग से इसका कर कोई उपचार लो।।3।। लेकर गौरवमय अतीत से आदर्शों की अरुणाई। घोलो उसमें नव चिन्तन की, नव प्रतिभा की तरुणाई। कर्मठता से आशाओं के मुख पर न उल्लास रचो। भ्रष्टों की छाती पर चढ़कर जयधर्मी इतिहास रचो। कीर्ति-कथा की कंचन-कृतियो! शूर शिवा के सेनापतियो! यह अवसर है देश-धर्म के सारे कर्ज उतार लो। सोच-समझकर ढंग से इसका कर कोई उपचार लो।।4।। आचार्य देवेन्द्र देव