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प्रताप नामक समाचारपत्र के संपादक और स्वतंत्रता आंदोलन के सजग पहरुआ थे गणेश शंकर विद्यार्थी। उनकी लेखनी ब्रिटिश हुक्मरानों का चैन छीन लेती थी। जुल्म. अमानवीयता और अन्याय का वे निर्भीकता से जमकर विरोध करते थे। हिन्दी दैनिक प्रताप में उन्होंने खुद तो अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ लिखा ही, समान विचारधर्मी तमाम कलमकारों व साहित्यकारों को भी अपनी लेखनी की धार को प्रखर कर अंग्रेजी हुकूमत की काली करतूतों के प्रति जनता में चेतना फैलाने का अवसर दिया। अंग्रेजी प्रशासन की जुल्म की कार्रवाईयां भी विद्यार्थी जी को उनके कर्मपथ और ध्येय से विचलित नहीं कर पाठ।
गणेश शंकर विद्यार्थी प्रारंभ से ही क्रांतिकारियों की पसंदीदा दो पत्रिकाओं- कर्मयोगी और स्वराज्य से जुड़े। फिर कानपुर से प्रताप नामक साप्ताहिक अखबार निकाला। इस अखबार से उन्होंने क्रांतिकारियों को भी जोड़ा जिन्होंने प्रताप में लेख लिखकर जनता को जगाने का काम किया। इसी दौरान उन्हें कई मुकदमों का सामना करना पड़ा। अंग्रेजी शासन ने उन पर भारी जुर्माने लगाए। कई बार जेल भी भेजा। पर वे डटे रहे और 1926 में प्रताप का दैनिक संस्करण शुरू किया। 1931 में कानपुर में सांप्रदायिक दंगा हो गया। 25 मार्च, 1931 को वे दंगाइयों को शांत करने के लिए मौके पर पहुंचे। पर इसी दौरान कुछ अराजक तत्वों ने उनकी हत्या कर दी। कलम के धनी इस पत्रकार की हत्या से पूरा देश स्तब्ध रह गया। उमेश शुक्ल











