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इस सृष्टि के चेतन पदार्थों में नारी का एक प्रमुख स्थान है, क्योंकि नारी सृष्टि की सृजन-कर्त्री है। सृष्टि का यह विशिष्ट कार्य एकमात्र नारी के द्वारा ही सम्पन्न होता है। अत: इसे 'जननी' की संज्ञा से विभूषित कर सम्मानित पद पर आसीन किया गया है।
श्रीरामचरितमानस के अयोध्या काण्ड में श्रीराम-वन-गमन के एक प्रसंग में महर्षि वाल्मीकि भगवान श्रीराम के लिए कहते हैं-
जननी सम जानहिं पर नारी…
तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।
अर्थात् 'हे राम! जो जन (शास्त्रीय विधि से पत्नी रूप में प्राप्त नारी के अतिरिक्त अन्य) पराई नारियों को जननी अर्थात् अपनी माता के समान समझते हैं, ऐसे पवित्र हृदय वाले जनों के मन, आपके विश्राम के लिए शुभ घर हैं।' श्रीरामचरितमानस के इस वचन का स्पष्ट भाव यह है कि जो पराई नारियों को अपनी माता के समान सम्मान देते हैं, वे जन श्रीभगवान के प्रिय भक्तों की श्रेणी में आते हैं। यदि विचार किया जाये तो भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रीभगवान का प्रिय बनने से बढ़कर कोई और उपलब्धि तो इस संसार में है नहीं। अत: नारी सम्मान की इससे उत्तम, सार्वजनिक एवं विश्वस्तरीय मान्यता कहीं और नहीं मिलती, जिसका अनुकरण करने पर व्यक्ति श्रीभगवान का प्रिय भक्त बन जाता है। यहां पर विचारणीय यह भी है कि पराई स्त्रियों को अपनी माता के समान समझने के इस सन्दर्भ में जाति-वर्ग-वर्ण पांति के लिए भी कोई प्रावधान नहीं है। अर्थात् इस सन्दर्भ में विश्व की सभी नारियां एक समान मानी गई हैं।
जननी (अपनी माता) के बाद पत्नी का ही मनुष्य के साथ सबसे अधिक सामीप्य संबंध होता है। श्रीरामचरितमानस के तृतीय सोपान (अरण्यकाण्ड) में महासती अनुसुइया के द्वारा सीताजी के प्रति उपदेश में नारी (पत्नी) को, मनुष्य के धैर्य, धर्म और मित्र के समकक्ष स्थान दिया गया है-
धीरज धर्म मित्र अरु नारी।
आपद काल परिखिअहिं चारी।।
अर्थात्- 'धैर्य, धर्म, मित्र और नारी, इन चारों की परीक्षा अपत्ति काल में होती है।' प्रस्तुत प्रसंग में, गोस्वामीजी द्वारा लिखित इस पंक्ति का यह भाव लेना सर्वाधिक प्रासंगिक होगा कि- आपत्ति काल में, नारी ही पत्नी रूप में, मित्र बनकर (सहचरी बने रहते हुए) मनुष्य के 'धैर्य' और 'धर्म' को साधे रखने में सहायक सिद्ध होती है। श्रीरामचरितमानस में ऐसे अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं, जिनमें नारियों ने विपत्ति काल में अपने पति को धैर्य धारण करके धर्मानुकूल ही आचरण करने का परामर्श दिया। इस दृष्टिकोण से भी भारतीय सभ्यता में नारी का सम्माननीय स्थान है। श्रीरामचरितमानस में पत्नी के अतिरिक्त अन्य रूपों में नारी सम्मान का अपना अलग-अलग स्थान है जिसका प्रतिपादन अन्य प्रसंगों में अलग से किया गया है। जैसे, एक तिरस्कृत पत्नी (नारी) का उद्धार और उसके मान-सम्मान की पुन: प्रतिष्ठा-
गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर।।
(मानस-1/210)
उक्त पंक्तियों में जनकपुर यात्रा के दौरान मार्ग में पड़ी हुई एक पत्थर की शिला को दिखाकर महर्षि विश्वामित्र, भगवान श्रीराम से कहते हैं कि- हे राम! वर्षों से अपने पति महर्षि गौतम द्वारा शापित और तिरस्कृत होकर पत्थर की शिला बनी हुई ऋषि पत्नी अहिल्या अपने उद्धार हेतु आपके पतित पावन चरणों की रज चाहती है, अत: कृपा करके आप इसका उद्धार करें। अपने गुरु महर्षि विश्वामित्र जी की आज्ञा सुनकर पत्थर की शिला बनी हुई ऋषि पत्नी अहिल्या को चेतनता प्रदान करके भगवान श्रीराम उसका उद्धार करते हैं और उसके मान-सम्मान की पुन: प्रतिष्ठा करते हैं। अहिल्या उद्धार का प्रसंग यह दर्शाता है कि किसी पवित्रात्मा नारी/पुरुष से यदि अनजाने में कोई अपराध हो जाए तो उसका प्रायश्चित कर लेने के बाद उस नारी/पुरुष के मान-सम्मान की पुन: प्रतिष्ठा की व्यवस्था होनी चाहिए।
श्रीरामचरितमानस के चतुर्थ सोपान (किष्किन्धा काण्ड) में वर्णित बालि वध का तो पूरा प्रसंग ही नारी सम्मान की प्रतिष्ठा को समर्पित है-
मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना।
नारि सिखावन करसि काना।।
भगवान श्रीराम सुग्रीव के बड़े भाई अत्याचारी बालि के समक्ष नारी सम्मान की प्रतिष्ठा करते हुए कहते हैं कि हे दुष्ट बालि! तुम तो मूढ़-बुद्धि हो ही, परन्तु तुमने अभिमान के वशीभूत होकर अपनी विदुषी नारी की सीख पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया, जिसके फलस्वरूप तुम्हारी यह दशा हुई है। भगवान श्रीराम, स्त्रियों के मान-सम्मान और उसकी रक्षा के सन्दर्भ में आगे कहते हैं-
अनुज बधू भगिनी सुतनारी।
सुनु सठ कन्या सम ए चारी।।
(मानस-4/8/7)
इन्हहिं कुदृष्टि बिलोकइ जोई।
ताहि बधे कछु पाप न होई।।
(मानस-4/8/8)
अर्थात्- हे दुराचारी बालि! अपने छोटे भाई की पत्नी, अपनी बहन, अपनी पुत्रवधू और अपनी पुत्री, इन चारों को एक समान दृष्टि से देखना चाहिए और इन चारों पर कुदृष्टि डालने वाले का वध करने पर कोई पाप नहीं होता, अर्थात् ऐसे दुराचारी के लिए तो मृत्यु दण्ड ही उचित दण्ड है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि श्रीरामचरितमानस में अपने छोटे भाई की पत्नी, अपनी बहन, अपनी पुत्र वधू और अपनी कन्या (पुत्री), इन चारों को समान बताकर घर परिवार में और संसार की समस्त स्त्रियों को जननी (अपनी माता) के समान समझना बताकर, सार्वजनिक रूप से विश्व के समस्त नारी समाज के मान-सम्मान की पूर्ण प्रतिष्ठा की गई है। भगवान श्रीराम का बालि के प्रति उपर्युक्त उपदेश घर-परिवार एवं सार्वजनिक रूप- दोनों ही प्रकार से नारी सम्मान की प्रतिष्ठा करता है।











