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मकर संक्रांति से सूर्य का उत्तरायण प्रारंभ हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करता है किंतु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना गया है। यह प्रवेश क्रिया छह-छह माह के अंतराल पर होती है।
भारत उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है। मकर संक्रांति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है अर्थात् भारत से दूर होता है। इसी कारण यहां रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है, किंतु मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अत: इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होता है तथा रात्रि छोटी होने से अंधकार कम। अत: मकर संक्रांति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है।
प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्यशक्ति में वृद्धि होती है। ऐसा जानकर संपूर्ण भारतवर्ष में लोगों द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना, आराधना एवं पूजन कर, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है।
सूर्य के प्रति ऐसी ही कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उत्तराखण्ड के बागेश्वर में उत्तरायणी मेला लगता है। 14 जनवरी को शुरू होने वाले इस मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। श्रद्धालु सरयू और गोमती नदी के संगम पर डुबकी लगाते हैं, बागनाथ के मन्दिर में भगवान शिव के दर्शन करते हैं और ब्राह्मणों एवं भिक्षुकों को दान-दक्षिणा देकर पुण्य अर्जित करते हैं। इस मेले के सन्दर्भ में एक कथा प्रचलित है। चन्द्रवंशी राजा कल्याणसिंह की कोई सन्तान नहीं थी। उन्हें बताया गया कि बागनाथ के दरबार में मनौती मांगने से उन्हें अवश्य सन्तान प्राप्त होगी। उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हो गई और बालक का नाम निर्भय चन्द्र रखा गया। पुत्र प्राप्ति से बहुत प्रसन्न रानी ने बच्चे को बहुमूल्य हीरा-मोती की माला पहनायी। माला पहनकर बालक अत्यधिक प्रसन्न रहता था। एक बार बालक जिद पर आ गया तो रानी ने उसे डराने के लिये उसकी माला कौवे को दे देने की धमकी दे डाली। बच्चा एक और जिद करने लगा कि कौवों को बुलाओ। रानी ने बच्चे को मनाने के लिये कौवों को बुलाना शुरू कर दिया। बच्चा तरह-तरह के पकवान और मिठाइयां खाता था, उसका अवशेष कौवों को भी मिल जाता था इसलिये कौवे बालक के इर्द-गिर्द घूमते रहते थे। शनै:-शनै: बालक की कौवों से दोस्ती हो गई। घुघुती नामक राजा का मंत्री राजा के नि:संतान होने के कारण राजा के बाद राज्य का स्वामित्व पाने का स्वप्न देखा करता था, लेकिन निर्भय चन्द्र के कारण उसकी इच्छा फलीभूत न हो सकी। परिणामस्वरूप वह निर्भय चन्द्र की हत्या का षड्यंत्र रचने लगा और एक बार बालक को चुपचाप से घने जंगल ले गया। कौवों ने जब आंगन में बच्चे को नहीं देखा तो आकाश में उड़कर इधर-उधर उसे ढूंढ़ने लगे। अकस्मात् उनकी नजर मंत्री पर पड़ी, जो बालक की हत्या की तैयारी कर रहा था। कौवों ने कांव-कांव का कोलाहल कर, बालक के गले की माला अपनी चोंच में उठा कर राजमहल के प्रांगण में डाल दी। बच्चे की टूटी माला देखकर सब आशंकित हो गये। मंत्री को बुलाया गया। पर मंत्री कहीं था ही नहीं। राजा को षड्यंत्र का आभास हो गया और उन्होंने कौवों के पीछे-पीछे सैनिक भेजे। वहां जाकर उन्होंने देखा कि हजारों कौवों ने मंत्री घुघुती को चोंच मार-मार कर बुरी तरह घायल किया है और बच्चा कौवों के साथ खेलने में मगन है। निर्भय चंद्र और मंत्री को लेकर सैनिक लौट आये। सारे कौवे भी आकर राजदरबार की मीनार पर बैठ गये। मंत्री को मौत की सजा हुई। उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर कौवों को खिला दिये गये। लेकिन इससे कौवों का पेट नहीं भरा। अत: निर्भय चंद्र की प्राण रक्षा के उपहारस्वरूप नाना प्रकार के पकवान बनाकर उन्हें खिलाये गये। इस घटना से प्रतिवर्ष घुघुती माला बनाकर कौवों को खिलाने की परम्परा शुरू हुई। यह संयोग ही था कि उस दिन मकर संक्रान्ति थी।
संक्रान्ति की सुबह जल्दी उठकर बच्चों को पिठयां लगाकर, दिया जला कर उनके गले में घुघुती की माला पहना कर 'काले कौवा काले' कहने के लिये छत-आंगन या घर के दरवाजे पर खड़ा कर दिया जाता है। यह त्योहार बच्चों का ही त्योहार माना जाता है। बच्चे उस दिन बहुत खुश रहते हैं। अपनी माला में गछे, गेहूं के आटे में गुड़ मिलाकर घी या तेल में पके खजूरों को घुघुती का प्रतीक मानकर चिल्ला-चिल्ला कर गाते हैं- काले कौवा काले, घुघुती माला खाले।…।
बागेश्वर के उत्तरायणी मेले को हर कोई अपनी नजर से देखता है। व्यापारी के लिये यह व्यापार करने का मौका है तो श्रद्धालु इसे नहाने और उत्सव के रूप में देखते हैं। लेकिन अब सरकारीकरण के बाद प्रशासन इसे कमाई का जरिया मानता है।
बहरहाल, अब उत्तरायणी मेले को पांच दिनों में बांध दिया गया है। नगर पालिका ने इस बार प्रदर्शनी को नुमाइश मैदान से हटा कर सरयू नदी के किनारे लगा कर एक नई शुरुआत की है। माघ स्नान के पहले दिन नगर में सांस्कृतिक दलों की झांकियां निकलती हैं। इस अवसर पर शोभायात्रा भी निकलती है, जिसमें बच्चे, वृद्ध, महिलाएं सभी बहुत ही उत्साह के साथ भाग लेते हैं। इस दौरान निकली शोभायात्रा में पारम्परिक लोकनृत्य का ऐसा दृश्य देखने को मिलता है कि मन काफी समय तक पर्वतीय समाज की सांस्कृतिक विरासत पर टिका रहता है।











