वालमार्ट 'लाबिंग'रिश्वत के रास्ते पहुंचाई गईदेश की अस्मिता को चोट?-डा. विशेष गुप्ता
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वालमार्ट 'लाबिंग'रिश्वत के रास्ते पहुंचाई गईदेश की अस्मिता को चोट?-डा. विशेष गुप्ता

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Dec 15, 2012, 12:00 am IST
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दिंनाक: 15 Dec 2012 15:21:32

 

भारत में मल्टी ब्रांड 'रिटेल' कारोबार को संसद के दोनों सदनों में स्वीकृति मिले अभी एक सप्ताह ही व्यतीत हुआ है कि इस बीच इसकी अंदरूनी परतें भी खुलनी शुरू हो गयी हैं। स्मरण रहे कि सरकार ने 'मल्टी ब्रांड रिटेल सेक्टर' में 51 फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी है। इसके अलावा 'सिंगल ब्रांड रिटेल' में भी सौ फीसदी विदेशी निवेश के दरवाजे खुल गए हैं। दस लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में अब विदेशी रिटेल स्टोर खुल सकेंगे। केन्द्र सरकार भले ही इसे लेकर खुशफहमी पाले हो, परन्तु इससे जुड़े अनेक विसंगत मुद्दे भी सामने आने लगे हैं। एफडीआई से जुड़ा पहला मुद्दा तब खड़ा हुआ था, जब पिछले दिनों कुछ राजनीतिक पार्टियां बाहरी तौर पर इसके खिलाफ दिखाई दी थीं, परन्तु विश्वास मत पर वे संप्रग-2 का हिस्सा बन गयीं। इन पार्टियों के दोहरे मापदण्ड को सम्पूर्ण भारत ने अपनी खुली आंखों से देखा और जमकर आलोचना भी की। परन्तु वालमार्ट 'लाबिंग' रपट को लेकर सरकार कटघरे में खड़ी हो गयी है। 'लाबिंग' पर खर्च की गयी 125 करोड़ की मोटी धनराशि ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। संसद के दोनों सदनों में भाजपा, माकपा तथा तृणमूल कांग्रेस ने इस मसले पर सरकार को जवाब देने को मजबूर कर दिया है।

अमरीका से शुरुआत

दरअसल वालमार्ट की 'लाबिंग' से जुड़े मुद्दे की शुरुआत अमरीकी सीनेट से हुई, जहां वालमार्ट की रपट पटल पर रखी गयी। इस रपट में साफ कहा गया था कि 2008 से 2012 तक खर्च की गयी 125 करोड़ की राशि में से सितम्बर 2012 में खत्म हुई अन्तिम तिमाही में भारत में निवेश के मुद्दे पर चर्चा करने एवं 'रिटेल' कारोबार बढ़ाने के लिए 'लाबिंग' पर 1.65 मिलियन डालर यानी 10 करोड़ रुपए खर्च किए गए। यह रपट बताती है कि यह 'लाबिंग' वालमार्ट ने अमरीकी सीनेट, यूएस हाउस आफ रिप्रेजेन्टेटिव, यूएस ट्रेड रिप्रेजेन्टेटिव तथा राज्य के यूएस विभाग के साथ मिलकर की थी। भारत के सन्दर्भ में रपट यह भी संकेत देती है कि वालमार्ट ने भारत में विभिन्न प्रकार के 'लाबिंग' क्रियाकलाप सम्पन्न करने के लिए तीन मिलियन यूएस डालर यानी लगभग 18 करोड़ रुपए खर्च किए। वालमार्ट ने यह भी कह दिया कि उसकी कम्पनी 2008 से लगातार इस 'लाबिंग' को अंजाम दे रही है। उल्लेखनीय है कि वालमार्ट वर्तमान में भारती एन्टरप्राइजेज के साथ 17 थोक स्टोर्स का परिचालन देश में कर रही है तथा इसका 18वां थोक श्रृंखला स्टोर 'वेस्ट प्राइस' के नाम से हाल ही में हैदराबाद में खोला गया है।

इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि वालमार्ट 'लाबिंग' में सफल रही है। कहना न होगा कि अमरीका के लिए 'लाबिंग' जैसी प्रक्रिया कोई नई नहीं है, बल्कि अनेक अमरीकी कम्पनियां अनेक माध्यमों से विरोधियों को मनाने, नीति निर्धारकों को प्रभावित करने, दूसरे देशों से जुड़ी आर्थिक नीतियों की विचारधारा बदलने तथा अपने आधार पर उस देश के कानून बनवाने के लिए 'लाबिंग' करती रही हैं। अमरीका के साथ ही ब्रिटेन, स्लोवेनिया तथा यूरोप से जुड़े कई देशों में 'लाबिंग' के संदर्भ में कानून हैं। ब्रिटेन में तो इसे लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है। परन्तु भारत में यह न तो आर्थिक संस्कृति का हिस्सा है और न ही यहां की अर्थव्यवस्था का। घोषित तौर पर भारत में 'लाबिंग' शब्द या तो रिश्वत के सन्दर्भ में प्रयुक्त होता है, जो कि भारतीय परिवेश के अनुसार पूरी तरह अनैतिक है।

दांव पर स्वदेशी नीतियां

भारत में 'मल्टी ब्रांण्ड रिटेल' में एफडीआई को स्वीकृत कराने में वालमार्ट ने 125 करोड़ रुपए खर्च किए हैं, यह निश्चित ही भारत के लिए एक बहुत गम्भीर मामला है। इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरह ही वालमार्ट जैसी कम्पनियां भारत की स्वदेशी नीतियों तक को दांव पर लगा रही हैं। पूरी दुनिया आज उदार नीतियां अपनाकर एक दूसरे के देशों में प्रवेश करने के मौके तलाश रही है। आज केन्द्र सरकार भी वैश्विक आधार पर यह वकालत कर रही है कि विदेशी कम्पनियों के निवेश के बिना भारत प्रगति नहीं कर सकता। उसका दुष्परिणाम हम देख रहे हैं कि यहां विदेशी कम्पनियों के उत्पाद स्वदेशी उत्पादों पर भारी पड़ रहे हैं। स्वदेशी बाजार पर धीरे-धीरे विदेशी बाजार हावी होता जा रहा है और हमारा स्वदेशी ढांचा, विशेषकर हमारे लघु और कुटीर उद्योग दम तोड़ रहे हैं और हमारी आर्थिक आत्मनिर्भरता खत्म होती जा रही है। इसका सबसे बड़ा असर तो हमारे ग्रामीण व कस्बाई क्षेत्रों में बढ़ रही भीषण बेरोजगारी के रूप में सामने आ रहा है।

भारत के लिए बहुत बड़ी चिन्ता का विषय यह है कि वालमार्ट सम्पूर्ण विश्व की एक बहुत बड़ी कम्पनी है जिसका वार्षिक कारोबार 450 अरब डालर के करीब है, जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद की लगभग 40 प्रतिशत राशि है। अभी तो केवल 'लाबिंग' से जुड़ा यह मुद्दा वालमार्ट का ही सामने आया है। कड़वी सच्चाई यह है कि विश्व की कई विदेशी कम्पनियां भारत में घुसपैठ के लिए उतावली हैं। वह इसलिए क्योंकि भारत का 'रिटेल' बाजार अभी 500 बिलियन डालर के करीब है तथा इसके 2020 तक एक ट्रिलियन डालर के होने की उम्मीद है। साथ ही भारत जैसे विकासशील देश में 40-50 करोड़ मध्यम वर्ग है जो सीधे इस नए आर्थिक बाजार का बहुत बड़ा उपभोक्ता है, जिस पर पूरे विश्व की नजर है। दरअसल 'लाबिंग' पर 125 करोड़ रुपए खर्च का जो यह मसला सामने आया है यह कोई नया नहीं है। इससे पहले भी भारत-अमरीका परमाणु समझौते के समय बहुत बड़ी 'लाबिंग' की बात सामने आ चुकी है। माना तो यहां तक जा रहा है कि विदेशों से भारत के हर सौदे में कहीं न कहीं 'लाबिस्ट' कम्पनियां अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती रही हैं। शायद यह बाहरी देशों की बहुत बड़ी सियासत है जो भारत की सामाजिक- आर्थिक नीतियों को अपने पक्ष में कराने के लिए उतावले हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वालमार्ट के द्वारा खर्च किए गए 125 करोड़ रु. की धनराशि का 'लाबिंग' के नाम पर रिश्वत के रूप में प्रयोग किया गया है।

दोषी को सजा मिले

'लाबिंग' की इस प्रक्रिया से यह बात तो प्रथम दृष्ट्या सिद्ध हो जाती है कि विदेशी कम्पनी 'वालमार्ट' के द्वारा इस पैसे का उपयोग यहां एफडीआई से जुड़े नीतिगत फैसले के लिए किया गया। निश्चित ही इससे यहां की आर्थिक नीतियों की मौलिकता को धक्का लगा है। केवल इतना ही नहीं, इस समय केन्द्र सरकार विदेशी कम्पनियों के दबाव में है और अर्थव्यवस्था का स्वदेशी परिप्रेक्ष्य घायल अवस्था में है। अब बिल्कुल ठीक समय है जब 'लाबिंग' के जरिए रिश्वत से जुड़ा यह मुद्दा सतह पर आ गया है। इस सन्दर्भ में यह जांच होनी ही चाहिए कि 'मल्टी ब्रांड रिटेल' से जुड़ी एफडीआई भारत में लाने के लिए कौन-कौन सी राजनीतिक पार्टियां शामिल रहीं और इससे जुड़ी नीतियों को प्रभावित करने में कुल कितना पैसा 'लाबिंग' के जरिए आया और किसको गया। ताकि इस जांच के जरिए भारत में पर्दे के पीछे चल रहे 'लाबिंग' के इस खेल का पर्दाफाश हो, दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिल सके। तभी शायद भारत को विदेशी कंपनियों के हाथों गिरवी रखने से बचाया जा सकता है।

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