हम अंधेरे से लड़े हैं दिंनाक: 01 Dec 2012 11:51:37 प्रशान्त अवस्थी रोशनी की चाह में यह भीड़ भागी जा रही है। तृप्ति की ले चाहना हर प्यास मरुथल पा रही है। किन्तु सोचो, प्रश्नवाचक चिह्न का उत्तर दिए बिन, कब सफलता के यहां पर आज तक झंडे गड़े हैं। हम अंधेरे से लड़े हैं।। मानता हूं बहुत कुछ बदला हुआ सा लग रहा अब। दे रही है द्वार पर दस्तक घृणा, दिग्भ्रमित हैं सब। किन्तु समझो विश्व भर में जब दानव ज्यादा बढ़े हैं, विश्व का सारा गरल तब एक शिव पीने बढ़े हैं। हम अंधेरे से लड़े हैं।। विश्वास के सारे धरातल आज डगमग डोलते हैं। और कागों की जमातों के मुखर स्वर बोलते हैं। किन्तु इस वातावरण का हल हमें ही खोजना है, इसीलिए दीपक दिवाली के अमावस को जले हैं। हम अंधेरे से लड़े हैं।।