अधूरेआदमी दिंनाक: 26 Nov 2012 12:13:41 डा. तारादत्त 'निर्विरोध' आदमी हैं ही कहां, सब अधबने-से हैं, नाम हैं दो-चार अंगुली पर गिने-से हैं। शहर है जंगल, भला छाया मिले कैसे? साख-सा कोई नहीं है, सब तने-से हैं। बात मतलब की यहां पर लोग सुन लेते, और हम अपने लिए भी अनसुने-से हैं। दर्द का भी तो यहां जब-तब कमल खिलता, प्यार तक के पांव कीचड़ में सने-से हैं। क्या बताएं और क्या किससे छिपाएं हम? इन मुखौटों के लिए हम आईने से हैं।