समाज सुधारक के रूप में डा. अम्बेडकर-डा. कृष्ण गोपालसहसरकार्यवाह, रा.स्व.संघ
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समाज सुधारक के रूप में डा. अम्बेडकर-डा. कृष्ण गोपालसहसरकार्यवाह, रा.स्व.संघ

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Oct 13, 2012, 12:00 am IST
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दिंनाक: 13 Oct 2012 16:41:45

अपनी विलक्षण क्षमताओं के आधार पर एक विशिष्ट स्थान बना चुके डा. भीमराव अम्बेडकर का जीवन अनेक प्रकार की विविधिताओं से परिपूर्ण है। उनकी सर्वाधिक ख्याति एक संविधान निर्माता तथा समाज के उपेक्षित और वंचित वर्ग के अधिकारों की रक्षा हेतु संघर्षरत योद्धा के रूप में ही अधिक है। उनके जीवन के ये दोनों ही आयाम महत्वपूर्ण हैं किन्तु, आश्चर्य की बात यह है कि उनके जीवन और कार्य के अनेक महत्वपूर्ण आयाम और भी हैं, जिनके बारे में अध्ययन, चिन्तन तथा विश्लेषण आवश्यकतानुरूप नहीं हो पाया है।

विलक्षण क्षमता और प्रतिभा

एक बात हम सभी को सदैव ध्यान में रखनी होगी कि अति सामान्य परिवार में जन्मे डा. भीमराव अम्बेडकर, सभी प्रकार के अभाव, उपेक्षा, अपमान एवं तिरस्कार सहते हुए अपनी विलक्षण क्षमताओं और प्रतिभा के बल पर आज एक महत्वपूर्ण स्थान पर विराजमान हैं। उनकी प्रतिभा को देश ने स्वीकार किया था। इसी के फलस्वरूप, वे संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य बने। उनके मन में यह लक्ष्य था कि देश में अस्पृश्य बन्धुओं को उनके संवैधानिक अधिकार दिलाने का प्रयास करूंगा। उनको आश्चर्य तो तब हुआ जब उन्हें 'संविधान प्रारूप समिति' का सदस्य बनाया गया, और जब उन्हें इस 'प्रारूप समिति' का अध्यक्ष बनाया गया तब तो उनके आश्चर्य की सीमा नहीं रही। उनको स्वप्न में भी यह कल्पना नहीं थी कि एक ऐसी सभा (संविधान सभा), जिसमें अधिकांश सदस्य तथाकथित उच्च जातियों के थे, मिलकर उन जैसे एक अस्पृश्य व्यक्ति को 'प्रारूप समिति' का अध्यक्ष भी बना सकते हैं।

हम यहां विचार करेंगे कि डा. अम्बेडकर का समाज सुधारक के रूप में मौलिक स्वरूप कैसा है? हम जानते हैं कि विगत दो हजार वर्षों की व्यापक राजनीतिक एवं सामाजिक उथल-पुथल ने कुछ विचित्र परिस्थितियां खड़ी कीं और समाज में अनेक प्रकार के विभेद उत्पन्न हो गये थे। इस दृष्टि से व्यापक समाज सुधारों की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता के अनुरूप ही डा. अम्बेडकर एक समाज सुधारक थे तथा युगानुकूल सामाजिक व्यवस्थाओं की पुनर्स्थापना के वे पुरोधा थे। सदियों से वंचित, उपेक्षित अपमानित एवं तिरस्कृत जातियों को उन्होंने आशा और विश्वास के साथ एक मजबूत संबल प्रदान किया, जो असहाय और असंगठित थे उन्हें एक मजबूत आधार और मंच दिया, भय और प्रताड़ना के कारण जिनकी वाणी 'मूक' हो गई थी उन्हें सशक्त वाणी दी। साथ ही, अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध एकजुट होकर संघर्ष करने की क्षमता भी उन्हें प्रदान की।

यह बात हमारे स्मरण में सदैव रहनी चाहिए कि वे जिस व्यवस्था के विरुद्ध लड़ रहे थे वह सदियों की रूढ़ परम्पराओं के कारण दृढ़ हो गई थी और कहीं-कहीं तो उसने तथाकथित शास्त्रों और धर्म की विकृत धारणाओं से सहारा लेने की कोशिश भी की थी। इस कारण, इन कुरीतियों, रूढ़ियों तथा मिथ्या मान्यताओं की जड़ें गहरी थी तथा ये दीवारें बहुत मजबूत थीं। इनसे संघर्ष लेना और उनको ढहाना आसान न था।

डा. अम्बेडकर ऐसे दृढ़ प्रतिज्ञ व्यक्ति थे जिन्होंने अपने बाल्यकाल से लेकर संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष पद तक इन भेदभावों को स्वयं झेला। अपमान और तिरस्कार की पीड़ा ने अनेक बार उनके हृदय के अन्तरतम को झकझोर कर रख दिया था। अपने करोड़ों बन्धुओं के दु:ख को देखकर वे दृढ़ होते चले गये। 'अपना यह जीवन इन्हीं पीड़ित मानवजनों के दु:खों को दूर करने में ही लगा दूंगा' यह संकल्प दिन प्रतिदिन और अधिक मजबूत होता चला गया।

भौतिक सुखों की चाह, उच्च पद प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा, व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, परिवार आदि का मोह भी उन्हें इस मार्ग से कभी विचलित न कर सका। इसी कारण जब आवश्यकता पड़ी तब वे केन्द्रीय मंत्री का प्रतिष्ठित पद छोड़कर नेहरू जी के मंत्रिमंडल से बाहर आ गये। हैदराबाद के निजाम तथा वैटिकन सिटी के पोप द्वारा अकूत सम्पत्ति का निवेदन भी उन्हें उनके मार्ग से भ्रमित न कर सका और वे निरन्तर अपने सुनिश्चित मार्ग पर चलते रहे जिसके द्वारा करोड़ों अस्पृश्य बन्धुओं को सम्मानित जीवन प्राप्त करवा सकें।

आन्दोलनकारी समाज सुधारक

डा. अम्बेडकर जी के जीवन में एक महत्वपूर्ण बात हमको दिखलाई देती है वह यह है कि वे पुरानी सभी मान्यताओं, आदर्शों और व्यवस्थाओं को ध्वस्त करना नहीं चाहते तथा किसी जाति या वर्ण के वे शत्रु नहीं हैं, जो अच्छा है वह संभालकर रखना और जो अनावश्यक है उसे हटाना ही उन्हें अभीष्ट है। इस दृष्टि से वे एक 'आन्दोलनकारी' हैं।

डा. अम्बेडकर यह जानते थे कि भारतीय दर्शन के मौलिक तत्व बहुत उदात्त हैं। किन्तु, विकृतियों, रूढ़ियों, ढोंग, पाखण्ड, कर्मकाण्डों एवं परंपराओं का अनावश्यक अतिरेक, जिसने उस समस्त दर्शन जो सभी मनुष्यों को समान मानता है तथा करुणा, प्रेम, ममता, बन्धुत्व, दया, क्षमा, श्रद्धा आदि सद्गुणों का सन्देश देता है एवं उसका संरक्षण भी करता है, को ढंक लिया है, वही हमारे परिवर्तन का मूलाधार बना रहे।

सुधारवादी आन्दोलन को चलाते समय हर क्षण यह बात स्मरण रखनी होगी कि यदि किसी भी कारण से आपसी प्रेम, ममता और बन्धुत्व का भाव समाप्त हो गया तो परिवर्तन का यह संघर्ष एक क्रूर वैमनस्य में बदलकर अधिकतम अधिकारों को पाने की इच्छा रखने वाले गृहयुद्ध में बदल जायेगा। अत: वे कहते थे कि हम यह बात ध्यान में रखें कि हमारे देश में सभी सद्गुणों का दाता, 'धर्म' है। इस 'धर्म' को अपने विशुद्ध रूप में पुनर्स्थापित करना है। ढोंग, पाखण्ड, भेदभाव, कर्मकाण्ड आदि के परे 'धर्म' में अन्तनिर्हित महान सद्गुणों को संरक्षित करते हुए हमें आगे बढ़ना है। कुछ लोग कहते हैं कि धर्म की मानव जीवन में कोई आवश्यकता नहीं है। डा. अम्बेडकर लोगों के इस मत से सहमत नहीं थे। उन्होंने कहा- 'कुछ लोग सोचते हैं कि धर्म समाज के लिए अनिवार्य नहीं है, मैं इस दृष्टिकोण को नहीं मानता। मैं धर्म की नींव को समाज के जीवन तथा व्यवहार के लिए अनिवार्य मानता हूं।'

मार्क्सवादी लोग धर्म को अफीम कहकर उसका तिरस्कार करते हैं। धर्म के प्रति यह विचार मार्क्सवादी दृष्टिकोण की आधारशिला है। डा. अम्बेडकर मार्क्सवादियों के इस मत से सहमत नहीं थे। वे इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थे कि 'धर्म' मनुष्य को न केवल एक अच्छा चरित्र विकसित करने में सहायता करता है अपितु वह समाज के संरचनात्मक पक्षों को भी निर्धारित करता है। चरित्र एवं शिक्षा को वे धर्म का ही अंग मानते थे।

वे कहते थे 'धर्म' के प्रति नवयुवकों को उदासीन देखकर मुझे दु:ख होता है।' डा. साहब का मानना था कि 'धर्म' कोई पंथ या कर्मकाण्ड नहीं है। धर्म के नाम पर हो रहे निरर्थक ढोंग, पाखण्ड तथा व्यर्थाडम्बरों को वे धर्म नहीं मानते। धर्म से उनका तात्पर्य है-  व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवस्थाओं को आदर्श रूप से संचालित करने वाला 'नैतिक दर्शन', जो सभी के लिए श्रेयस्कर है वही 'धर्म' है।

(लेखक के व्याख्यान पर आधारित पुस्तक 'अम्बेडकर चिंतन का धरातल : सम्यक दृष्टि' का अंश। पुस्तक का प्रकाशन भीमराव अम्बेडकर पीठ, हिमाचल प्रदेश वि.वि., शिमला ने किया है।)

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