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भाजपा का परचम

Written byArchiveArchive
Jul 14, 2012, 12:00 am IST
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भाजपा का परचम

दिंनाक: 14 Jul 2012 16:38:23

निकाय चुनाव: उ.प्र. व म.प्र. में फहरा

12 नगर निगमों में से 10 में भाजपा के महापौर

राजधानी लखनऊ में डा. दिनेश शर्मा की रिकार्ड एक लाख 71 हजार वोटों से जीत

कांग्रेस का खाता तक न खुला

धूल चाट गए जातिवादी–अवसरवादी

लखनऊ से सुभाष चन्द्र सिंह

उत्तर प्रदेश में हाल ही में सम्पन्न नगर निकाय चुनावों में भाजपा को जनता ने ऐसा सिर-आंखों पर बैठाया कि वह खुद अचंभित रह गई। 12 नगर निगमों में से 10 पर उसे जीत मिली। उसकी यह जीत पिछले निकाय चुनाव में मिली सफलता से भी बड़ी है। पांच साल पहले हुए चुनावों में उसे 12 में से 8 सीटों पर जीत मिली थी। राजधानी लखनऊ में दूसरी बार महापौर बने डाक्टर दिनेश शर्मा ने तो जीत का रिकार्ड ही बना डाला। पिछली बार मात्र नौ हजार वोटों से जीतने वाले डा. शर्मा इस बार एक लाख 71 हजार से भी ज्यादा वोटों से जीते। इस चुनाव की दूसरी सबसे बड़ी खासियत यह रही कि राष्ट्रीय पार्टी का दावा करने वाली कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला। वह अपने निशान पर लड़ी थी। सपा-बसपा तो खैर पहले ही मैदान छोड़ चुकी थीं। अपने चिन्ह पर न लड़कर उन्होंने पार्टी के कार्यकर्ताओं को समर्थन देकर चुनाव लड़वाया था। ये दोनों दल भी बुरी तरह पिटे। इलाहाबाद में बसपा समर्थित उम्मीदवार और बरेली में सपा समर्थित उम्मीदवार ही जीत सके।

कार्यकर्ताओं में उत्साह

प्रदेश में नगर निकाय चुनाव चार चरणों में हुए थे। तपती गर्मी में पूरा जून प्रचार में बीता था। अनुमान था कि मतदाता, खासकर शहरी मतदाता घर से नहीं निकलेगा। इसीलिए कांग्रेस, सपा, बसपा को लग रहा था कि शहरी मतदाताओं की पहली पसंद भाजपा को लोकसभा, विधानसभा के बाद नगर निकाय चुनावों में भी करारा झटका लगेगा। विधानसभा चुनाव में हार से निराश भाजपा भी कहीं न कहीं सशंकित थी। लेकिन मतदाता और भाजपा के कार्यकर्ता पूरी तरह उत्साहित थे। कार्यकर्ताओं ने इस बार ठान लिया था कि वे पूरा प्रयास करेंगे और उन्होंने वह कर दिखाया। यह कार्यकर्ताओं का ही तो कमाल था कि राजधानी लखनऊ की आठ विधानसभा सीटों में से सात पर विधानसभा चुनाव हार चुकी भाजपा फिर उठ खड़ी हुई। लखनऊ में भाजपा के डाक्टर दिनेश शर्मा को 45 प्रतिशत से अधिक मत मिले। यही नहीं, कांग्रेस के डाक्टर नीरज बोरा, जिन्होंने प्रचार पर पानी की तरह पैसा बहाया था, किसी तरह अपनी जमानत बचा पाए। हां, भाजपा के विरोध में मुस्लिम बयार जरूर बही। इसीलिए 'पीस पार्टी' का करीब-करीब गुमनाम चेहरा, मोहम्मद रईस तीसरे नंबर पर रहे।

वहीं कई निर्दलीय ऐसे जीते जो भाजपा के समर्थक हैं। इसलिए सदन चलाने में डाक्टर शर्मा को कोई दिक्कत नहीं होगी।

शेष प्रदेश के बड़े महानगरों में भी भाजपा की जीत का सिलसिला जारी रहा। नौ अन्य नगर निगमों में भाजपा उम्मीदवार जीते। आगरा में इंद्रजीत आर्य, गोरखपुर में डाक्टर सत्या पांडे, मुरादाबाद में वीणा अग्रवाल, मेरठ में हरिकांत अहलुवालिया, अलीगढ़ में शकुंतला भारती, झांसी में किरन राजू, वाराणसी में रामगोपाल मोहले, कानपुर में जगतवीर सिंह द्रोण, गाजियाबाद में तेलूराम कंबोज ने भाजपा के कमल निशान पर जीत दर्ज की। लखनऊ में जीते डाक्टर दिनेश शर्मा और कानपुर में जगतवीर सिंह द्रोण को छोड़ दिया जाए तो सभी चेहरे जनता के लिए नए थे। यह जनता के उत्साह का ही तो नतीजा है कि मुरादाबाद जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्र में भी कमल खिला। यहां से पूर्व क्रिकेट कप्तान अजहरुद्दीन कांग्रेस के सांसद हैं। यहां भाजपा की वीणा अग्रवाल को 99,192 वोट मिले जबकि 'पीस पार्टी' के हुमायूं कबीर को मात्र 29,071 वोट मिले। कांग्रेस तो मुकाबले में भी नहीं रही। कानपुर से श्रीप्रकाश जायसवाल केंद्रीय मंत्री हैं, तब भी वहां से कांग्रेस हार गई। इलाहाबाद और झांसी में पहले कांग्रेस के महापौर थे। इस बार इन दोनों स्थानों पर वह बुरी तरह हारी। झांसी से प्रदीप जैन केंद्र में मंत्री हैं।

पता लगा है कि सपा गाजियाबाद में धांधली करना चाहती थी। भाजपा के तेलूराम कंबोज के समर्थन में पड़े दो हजार से अधिक वोटों को अवैध करार दे दिया गया था। देर रात तक परिणाम घोषित नहीं किया गया। भाजपा के तीखे विरोध के चलते रात दो बजे के बाद परिणाम घोषित किया गया। तेलूराम कंबोज ने 9,583 मतों से सपा समर्थित प्रत्याशी पर जीत दर्ज की।

निकाय चुनाव में कई संदेश साफ तौर पर पढ़े जा सकते हैं। एक तो यही कि भाजपा अब भी प्रदेश की जनता की पसंद है। उसे थोड़ी और मेहनत करनी होगी, कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रखना होगा। दूसरा यह कि भाजपा को जनता की समस्याओं को लेकर आंदोलन छेड़ने होंगे। सपा-बसपा और कांग्रेस जैसे जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बल पर चुनाव जीतने की आकांक्षा रखने वाले अवसरवादी दलों से इतर उसे जनहित के मुद्दों से जुड़ना होगा। कांग्रेस का भाजपा-विरोध अब बेमानी हो गया है। बसपा के लिए भी सबक है कि काठ की हांडी एक बार ही चढ़ती है। सपा के गुंडाराज के विरोध में एक बार पूरी सत्ता मिली तो मायावती जनता से दूर, केवल पैसा बनाने में जुट गईं। सपा के लिए तो सबसे बड़ा सबक है कि केवल हिंदू विरोध और मुस्लिम तुष्टीकरण के बल पर राजनीति के दिन लद गए।

कांग्रेस के दुर्ग धराशायी

49 निकायों में से 36 में भाजपा के हाथ कमान

भूरिया और कमलनाथ के गढ़ों में भी कांग्रेस को मात

म.प्र. में पिछले दिनों हुए महेश्वर उपचुनाव के बाद अब नगरीय निकाय चुनावों में भी भाजपा ने कांग्रेस को जबरदस्त पटखनी दी है। वर्ष 2013 में होने वाले विधानसभा चुनावों के करीब एक साल पहले हुए इन चुनावों में भाजपा ने कांग्रेस के गढ़ों में सेंध लगाते हुए 15 जिलों के 49 निकायों में से 35 पर कब्जा जमा लिया। अगले साल विधानसभा चुनाव में सत्ता प्राप्ति का सपना संजोए बैठी कांग्रेस के हिस्से में अध्यक्ष पद की केवल आठ सीटें ही आ सकीं। यहां तक कि कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया के गृह जिले झाबुआ और केंद्रीय मंत्री कमलनाथ के छिंदवाड़ा में भी कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा। बड़वानी निकाय में तो 55 साल में पहली बार भाजपा का अध्यक्ष चुना गया। छह सीटों पर निर्दलीयों ने कब्जा जमाया। इन परिणामों से संकेत एक बार फिर साफ हैं कि न तो भूरिया के चलते कांग्रेस का जनजाति कार्ड काम कर सका और न ही भाजपा नेताओं पर कीचड़ उछालने वाली बयानबाजी काम आई।

दो चरणों में हुए नगरीय निकाय चुनावों के पहले चरण में 29 सीटों के चुनाव परिणाम घोषित किए गए, जिनमें भाजपा को 20 तो कांग्रेस को केवल तीन सीटें मिलीं। चार सीटों पर निर्दलीयों ने कब्जा जमाया। दूसरे चरण में 22 नगर पालिकाओं और नगर परिषदों के चुनाव परिणाम घोषित किए गए, जिनमें से 15 भाजपा के हिस्से, पांच कांग्रेस के और दो निर्दलीयों के हिस्से आईं। गौरतलब है कि पिछले निकाय चुनावों में भाजपा के खाते में 25, जबकि कांग्रेस के पास 11 सीटें थीं। सात निकाय नए बनाए गए हैं। इनमें पहली बार चुनाव हुए हैं।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया के संसदीय क्षेत्र रतलाम-झाबुआ और केंद्रीय मंत्री कमलनाथ के संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा के अलावा राजेंद्र सिंह राजूखेड़ी के क्षेत्र धार, अरुण यादव के बड़वानी (खंडवा), बसोरी सिंह मेश्राम के मंडला-डिंडोरी और राजेश नंदिनी सिंह के अनूपपुर(शहडोल) में कांग्रेस चारों खाने चित हो गई। भूरिया के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद महेश्वर और जुबेरा में हुए उपचुनावों में भी कांग्रेस का जनजाति कार्ड निष्प्रभावी हो चुका था।

भूरिया निशाने पर

हाल में हुए विधानसभा उपचुनाव के दौरान महेश्वर सीट पर मिली हार और अब नगरीय निकाय चुनावों में भी परिणाम अपेक्षित नहीं आने के चलते कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया के विरोधी सक्रिय हो गए हैं। भूरिया के संसदीय क्षेत्र रतलाम और झाबुआ में भी हार के बाद घबराहट की स्थिति है। सूत्रों के अनुसार, भूरिया के विरोधियों ने प्रभारी महासचिव बी.के. हरिप्रसाद से गुहार लगाई है और हालात बदलने के लिए सख्त कदम उठाने की मांग की है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा ने जीत के बाद कहा कि गांव की जनता ने हमें विश्वास सौंपा है, भाजपा की विचारधारा का सम्मान कर हमें गले लगाया है। भाजपा और राज्य सरकार पूरी प्रतिबद्धता के साथ उसकी सेवा में तत्पर रहेगी। उन्होंने कहा कि हम चुनाव को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं, जनविश्वास पर खरे उतरते हैं। मंडला, झाबुआ, छिंदवाड़ा, धार, शहडोल जैसे कांग्रेस प्रभाव क्षेत्रों, जहां लोकसभा में कांग्रेस को समर्थन मिला था, में निकाय चुनाव में भाजपा ने जीत दर्ज कर जनविश्वास अर्जित किया है।

जीत से बढ़ी जवाबदेही

–शिवराजसिंह चौहान, मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने नगरीय निकाय चुनाव में मिली शानदार सफलता पर अनुसूचित जनजाति क्षेत्र की जनता और कार्यकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि आजादी के बाद पहली बार भारतीय जनता पार्टी का परचम उन क्षेत्रों में फहराया गया है जहां हमारी पहुंच बाद में बनी। इस जीत ने हमें अपनी जवाबदेही का भी अहसास कराया है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार जन आकांक्षाओं पर खरी उतरेगी। चौहान ने कहा कि यह भाजपा की विचारधारा और कार्यकर्ताओं की कर्मठता का फल है, प्रदेश सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन और उनसे आम आदमी को मिले सुखद अहसास का फल है। इन परिणामों ने साबित कर दिया है कि प्रदेश के सुदूर अंचल में रहने वाले वनवासी भी विकास की रोशनी से राहत और आगे बढ़ने का रास्ता पा रहे हैं।

जनसंपर्क और कार्यकर्ताओं का उत्साह

लखनऊ से महापौर पद पर जीते डाक्टर दिनेश शर्मा कार्यकर्ताओं में जितने लोकप्रिय हैं, उससे कहीं ज्यादा लोकप्रिय जनता में हैं। सरल और सहज स्वभाव है उनका। शायद यही कारण था कि जब उनकी उम्मीदवारी घोषित की गई तो पहले दिन से परिणाम की घोषणा सी हो गई। आम जनता के बीच यह बहस चल निकली कि वह पिछली बार के मुकाबले इस बार कितने ज्यादा वोटों से जीतेंगे। पूरे लखनऊ में उनके नाम का कोई पोस्टर या प्रचार सामग्री नहीं देखी गई। उनका सबसे ज्यादा जोर जनसंपर्क पर रहा। प्रचार सामग्री के नाम पर केवल कुछ पर्चे देखने को मिले। जीत का श्रेय उन्होंने कार्यकर्ताओं को दिया और कहा कि वही हमारी पूंजी हैं। उन्होंने घर-घर जाकर प्रचार किया।

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