साहित्यिकी दिंनाक: 09 Jun 2012 14:06:47 दुखी नीम की छांव घमण्डीलाल अग्रवाल कुर्सी का ही हो गया, सकल विश्व में खेल।। कुर्सी को मत छोड़ना, शाला हो या जेल।। करनी हो मध्यस्थता, कीजै तनिक खयाल। बनने पाए ना कभी, यह जी का जंजाल।। जायदाद पर पिता की, जमकर लड़ते पूत। पहले सोचें किस तरह, रिश्ते हों मजबूत।। भाव समर्पण चाहिए, दिल से दिल के बीच। बेल बढ़ेगी मेल की, दूर हटेगी कीच।। कोहरे वाली पर्त में, छिपे ओस के बिन्दु।। काली रजनी में रहे, इसी तरह से इंदु।। कांप रही है जिदंगी, मन में लिए अभाव। बाबा खों-खों खांसते, मां को गठिया बाय।। कौन दशा तेरी हुई, बतला मेरे गांव। पनघट सूने-से पड़े, दुखी नीम की छांव।। हरियाली होगी सब तरफ, वन होंगे जब खूब। पनप न पाएगी कभी, प्रदूषणों की दूब।। शुद्ध वायु गिरवी पड़ी, छांव हुई नीलाम। सुख बाजारों में बिका, औने-पौने दाम।। भूमि अगर बंटती रही, बनते रहे मकान। हमें उगाना पड़ सके, हथेलियों पर धान।।