सरोकार
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सरोकार
मृदुला सिन्हा
पिछले दिनों बिहार जाना हुआ। पांच दिनों में करीब 500 कि.मी. की यात्रा के दौरान पचासों गांव तीन-चार शहर देखने का अवसर मिला। परिवर्तन ही परिवर्तन। गांव-गांव में काली-काली सड़कें, चौड़े-चौड़े राज मार्ग, झोपड़ियों और मिट्टी की दीवारों वाले मकानों की जगह ईंट के छतदार मकान, सड़कों पर गांवों की लड़कियों का साइकिल पर चलता झुंड। यह सब हमारे जमाने में नहीं था। एक और परिवर्तन दिखा। छतों पर गोइठा (बिठौला) का सूखना। एक पर एक रखकर एक विशेष आकृति में गोइठा सुखाए जाते हमने बचपन से देखीं है। वे जमीन पर सुखाए जाते थे। लेकिन इस बार छतों पर गोइठा सूखते और अन्न रखने की बखारियां भी छत पर देखीं। मैंने सोचा- हमारे जमाने में तो छतें थी ही नहीं। ईंट या मिट्टी की दीवारों पर भी छप्पर ही होते थे। घास-फूस के या फिर खपड़े के। अब छत है तो छत का भी इस्तेमाल होने लगा। कपड़े और अनाज सुखाए जाते हैं तो बिठौले क्यों नहीं?
ट्रेन से दिल्ली लौटते हुए देखा रेलवे लाइन के किनारे गांवों में बिठौले (बिटौरा) रखने के अपने तरीके हैं। मनुष्य ने भी क्या-क्या आविष्कार कर लिए। बिठौलों से महिलाओं का सीधा संबंध है। वे ही बनाती हैं। वे ही साज-संवार और बिठौले का भंडारण करती हैं। बरसात के दिनों में खुले आकाश में खड़े इन बिठौले भंडारों की बारिश से सुरक्षा के लिए गोबर और भूसा मिलाकर ऐसा आवरण चढ़ा देती है कि मूसलाधार बारिश में एक बूंद भी पानी अंदर न जाए। इन भंडारों से बिठौले निकालना भी एक कला है। जिस प्रकार इसके अंदर उपले (कंडे) भरना एक कला है उसी प्रकार निकालना भी।
गोबर है ही बड़ी उपयोगी वस्तु। खाद के काम आए। आंगन दरवाजे इससे लीपे जाते हैं। जलावन के लिए उपले बनाए जाते हैं। आज गांवों में भी रसोई गैस पहुंच रही है, लेकिन यह हमारी आबादी की इंधन की जरूरतों को पूरी करने के लिए यथेष्ट नहीं है। तभी तो आज भी पारंपरिक जलावन लकड़ी, उपले और फसलों के डंठल तक जलावन के काम आते हैं।
बरसात प्रारंभ होने के पूर्व मेरी दादी गोठुला में जलावन (सूखी लकड़ियां और गोइठे) रखवाने के लिए बहुत सजग रहती थीं। गोइठा ठोकने वाली विशेष मजदूर महिला होती थी। उसे बार-बार कहतीं- बारिश का कोई ठिकाना नहीं। गोइठे ठोको और सुखाकर अंदर भरती जाओ।
गोठुले में जलावन भरे जाते समय दादी स्वयं खड़ी रहती थीं। दादी अग्रसोची थीं। बरसात और बाढ़ के दिनों में भी घर में चूल्हा जलता रहे, यह उनकी चिंता रहती थी। एक बार मैंने कहा था-'दादी! गाय के गोबर से जलावन क्यों बनवाती हैं? यह तो गंदी चीज है।'
दादी ठहाका लगाकर हंसी थी। बोलीं-'गोबर और खासकर गाय का गोबर तो बहुत पवित्र है। इसके जलावन पर पका भोजन भी पवित्र, स्वादिष्ट और स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त होता है।” गोइठा ठोकवाते समय दादी को गोइठा संबंधित अनेक कथाएं स्मरण हो आती थीं। वे कथा सुनाती जातीं और गोबर ठोकनी (उपले ठोकने वाली) गोइठा ठोकती।
एक बार गोबर ठोकनी गोइठा ठोक रही थी। गोबर को हाथों से मिलाते हुए वह भूसा मिलाना भूल गईं। दादी ने डांटा-'फिर तो बन गए तुम्हारे उपले। इसमें बंधन ही नहीं बनेगा। भूसा मिलाओ।'
उन्हें एक कथा स्मरण हो आई। बोलीं-'सुनो यह उपले कितने उपयोगी होते हैं। एक राजा था। अपनी दो पत्नियों और बच्चों के साथ हंसी-खुशी से राजमहल में रहता था। उसकी संपन्नता और प्रजा प्रेम देखकर पड़ोसी राजा जलने लगे। उस पर हमला कर दिया। राजा हार गया। उसे देश निकाला कर दिया। राजा बहुत दु:खी हुए। उन्हें रानी ने ढांढस बंधाया। कहा-'आप इस राजा से कहिए कि माह दो माह के लिए राशन-पानी ले जाने की अनुमति दे दें। एक-दो महीने में हम जहां जाएंगे वहां अपना इंतजाम कर लेंगे।'
राजा मान गया। उसने दूसरे राजा के सामने अपनी रानी द्वारा सिखाई मांग रखी। राजा ने उसकी मांग मान ली। राजा ने अपने परिवार सहित राज से बाहर निकलने का कार्यक्रम बना लिया। रानी द्वारा स्वयं खड़ी होकर बैलगाड़ियों पर उपले लदवाते देख उसे बहुत आश्चर्य और दु:ख भी हुआ। राजा ने पूछा-'आपने तो राशन-पानी ले जाने की बात कही थी। ये उपले क्यों?'
रानी हंसने लगी। कहा-'राजा! आपने भी कितने भोले हैं। राशन पानी चाहिए। पर बिना उपले के हम खाना कैसे बनाएंगे?'
राजा समझ गया। बोला-'आप बहुत बुद्धिमती हैं। व्यावहारिक भी।'
राजा-रानी पालकी में और उनके पीछे बैल गाड़ियां चलीं। उपले ले जाते देख प्रजा भी हैरत में थी। एक गांव के बाहर राजा ने पड़ाव डाला। रानी का ध्यान उपलों की गाड़ियों पर था। उसने अपने टेंट में उपले मंगवाए। उन्हें तोड़ना प्रारंभ किया। राजा देखकर अवाक। उनमें से तो हीरे-मोती गिर रहे थे। राज बोला-'रानी! यह क्या है?' रानी बोली-'महाराज इन उपलों में वह ताकत है जिससे आप रंक से फिर राजा (धनवान) बन सकते हैं। ये हीरे-मोती हैं। जब दूसरे राजा ने हमारे राज पर हमला किया, आप रणक्षेत्र में गए तो मैं अपने खजाने से हीरे-मोतियों को निकालकर राजमहल में ही उपले बनवाने और सुखवाने लगी। ये वही उपले हैं। आप इनसे व्यापार प्रारंभ करें। देखते-देखते हमारा सब लौट आएगा।
राजा अपनी रानी की बुद्धि पर भौचक था, आनंदित भी। राजा बुदबुदाया-'तभी तो ये लक्ष्मी कहलाती हैं।'
गोबर में धन मिलने की अनेक कथाएं हैं। सबसे बड़ा गुण तो गोबर का जलावन बनना है। यह भी सच है कि किसान परिवारों में गोबर में भी हिस्सा लग जाता था। एक हिस्सा खाद के लिए रखा जाता था। दूसरा हिस्सा उपलों के लिए। उपलों वाले हिस्से पर घर की महिलाओं का ही पूरा अधिकार होता आया है। वे उपले पाथती हैं अपने घर के लिए जलावन के रूप में इस्तेमाल करती हैं और समय पड़ने पर बेचती भी हैं।
उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में घर के आसपास खेतों में बिठौले बनाए जाते हैं। उसके ऊपर कशीदाकारी होती है। महिलाएं कलाकार के साथ-साथ वैज्ञानिक भी होती हैं। इसलिए गोबर में भी चित्र उकेरने से वंचित नहीं रहतीं। सुन्दर-सुन्दर चित्र। उपलों पर भी चित्र। आकाश में काले बादल घुमड़ते देख उनका ध्यान बिठौले पर जाता है। उनकी संपत्ति होते हैं बिठौले। वे उनको सजाती तो हैं पर अपनी पड़ोसिनों की नजर से भी बचाती हैं। इसलिए टोने-टोटके भी करती हैं। किसी की बुरी नजर न लगे। गोबर जैसी चीज को भी सोना बना लेना, महिलाओं की खूबी होती है।
दादी कहती थीं-'फूहड़ और सुघड़ महिला की पहचान उसके गोबर सहेजने की कला से हो जाता है।' दादी तो स्वयं एक बड़ी कलाकार थीं।










