महामना के सपनों से खिलवाड़
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महामना के सपनों से खिलवाड़

Written byArchiveArchive
May 12, 2012, 12:00 am IST
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आवरण कथा

दिंनाक: 12 May 2012 17:02:14

आवरण कथा

 

सोनिया सरकार के नये फरमान ने 

'आईटी' को 'बीएचयू' से अलग किया

प्रतिनिधि

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय अब पहले जैसा नहीं रहेगा। परिसर में 'मधुर मनोहर अतीव सुंदर/ यह सर्वविद्या की राजधानी' की स्वर लहरियां तो गूंजेंगी, किन्तु उनकी लय बिगड़ चुकी होगी। विश्वविख्यात वैज्ञानिक शांति स्वरूप भटनागर द्वारा रचित इस कुलगीत की कर्णप्रिय पंक्तियां 'विविध कला अर्थशास्त्र गायन/ गणित खनिज औषधि रसायन' खनिज अभियांत्रिकी विभाग के अलग होने के बाद अपनी सत्यता खो चुकी होंगी। इन सब त्रासदियों की शुरुआत की गई है विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी के 150वें जयंती वर्ष के अवसर पर। इस पुण्य अवसर पर महामना की इस विरासत को और समृद्ध किए जाने की आवश्यकता थी, तब कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने महामना मालवीय के सपनों पर निर्मम चोट की है। केंद्र की कांग्रेस सरकार ने आईआईटी बनाने के नाम पर 'आईटी-बीएचयू' को 'बीएचयू' से खत्म कर दिया। इतना ही नहीं, महामना द्वारा जुटाई गई संपत्तियों, भवनों को भी इस विश्वविद्यालय से छीनकर नई स्वायत्तशासी संस्था को सौंप दिया।

भारत निर्माण की तैयारियों में लगे महामना ने जब विश्वविद्यालय में बनारस इंजीनियरिंग कालेज (बेंको) की स्थापना की थी, उस समय देश में अभियांत्रिकी संस्थान के नाम पर कानपुर में एचबीटीआई और रुड़की में थाम्पसन कालेज भर हुआ करते थे। बीएचयू के छात्र अत्यंत मेधावी थे। जब वाराणसी में राजघाट पर गंगा पर निर्मित डफरिन पुल पर दोहरी रेल लाइन बनाने की बात हुई और आवागमन रोके बगैर दूसरी लाइन बनाने में ब्रिटिश इंजीनियरों ने हाथ खड़े कर दिए, तब 'बेंको' से आए दो इंजीनियरों ने बिना काम रुकवाये दूसरी लाइन का निर्माण कराया। इसी के बाद उस पुल का नाम 'डफरिन ब्रिज' से बदलकर मालवीय सेतु कर दिया गया।

सोची–समझी साजिश

केंद्र की सत्ता पर काबिज कांग्रेस सरकार ने बीएचयू का बंटवारा सोची-समझी साजिश के तहत किया है। देश के हिन्दू गौरव संस्थानों व धरोहरों को नष्ट करके अल्पसंख्यकों को खुश करने की नीति ने यह अनीति करवाई है। जिस गोपालकृष्णन रपट को आधार बनाकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को बांटा गया है उसी रपट में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट को भी आईआईटी बनाने की सिफारिश की गई है। लेकिन एएमयूईआई को नहीं छुआ गया। कांग्रेस की वोट लोभी सोच इतनी आम हो चुकी है कि उसके अपने भी हतप्रभ हैं। कांग्रेस की छात्रशाखा एनएसयूआई के राष्ट्रीय पदाधिकारी व बीएचयू के पूर्व छात्रनेता रत्नाकर त्रिपाठी ने तो सार्वजनिक बयान दे डाला कि बीएचयू को अल्पसंख्यक संस्थान न होने का खामियाजा भुगतना पड़ा है। यदि कपिल सिब्बल में हिम्मत हो तो यही प्रयोग अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में करके दिखाएं। सिब्बल की विध्वंसक शैक्षिक नीतियों का नतीजा कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा। 

संसद से सड़क तक पुरजोर विरोध के बावजूद केंद्र सरकार की हठधर्मिता ने एक प्राचीन शिक्षण संस्थान को खंडित कर दिया। गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ ने लोकसभा में यह सिद्ध कर दिया था कि यह चंद लोगों की स्वार्थी साजिशों का नतीजा है और अगर सरकार वास्तव में आईटी-बीएचयू का भला चाहती है तो उसे और ऊपर करके आईआईटी का दर्जा दिया जाए, परंतु उसे बीएचयू से अलग न किया जाए। राज्यसभा में भाजपा के सांसदों के तीखे प्रश्नों से बेचैन सिब्बल बचते नजर आए। सिब्बल ने आईटी-बीएचयू को आईआईटी बनाए जाने संबंधी विधेयक को तीन साल के लिए किया जा रहा प्रयोग बताते हुए पारित किए जाने का अनुरोध किया। परंतु यक्ष प्रश्न यह है कि क्या बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय केंद्र सरकार की प्रयोगशाला है? ऐसा प्रयोग अन्य संस्थानों में क्यों नहीं किया जाता? देखा जाए तो पहले भी कांग्रेसी 'युवराज' के निर्देश पर सिब्बल ने अमुवि में तो छात्रसंघ का प्रत्यक्ष चुनाव करवाया, किंतु बीएचयू व इलाहाबाद विश्वविद्यालय को उनके हाल पर छोड़ दिया।

एक अकेले व्यक्ति द्वारा अपने प्रयासों से एक विश्वस्तरीय शिक्षा संस्थान बनाने का उदाहरण पूरे विश्व में दूसरा नहीं मिलता। महामना ने पैदल चलकर, लोगों से चंदा इकट्ठा करके जिस संपत्ति से विश्वविद्यालय बनाया उस संपत्ति को छीनकर दूसरे संस्थान को देने का अधिकार आखिरकार केंद्र सरकार को किसने दे दिया? दरअसल एएमयू को छोड़कर तथा बीएचयू को तोड़कर कांग्रेस ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं। पहला तीर चलाकर वह अल्पसंख्यकों की हितैषी बनी और दूसरे से हिन्दू विश्वविद्यालय के लोगों को आपस में लड़ा दिया।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की अक्षुण्णता बरकरार रखने के लिए संघर्ष शुरू हो गया है। विश्व हिन्दू परिषद के संरक्षक श्री अशोक सिंहल और जनता पार्टी के अध्यक्ष डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस विखंडन का पुरजोर विरोध किया है। भारतीय जनमानस भी हिन्दू गौरव मुकुट की इस मणिमाला को तोड़े जाने से उद्वेलित है। इटली की सोनिया की सरपरस्ती वाली सरकार को एक बार फिर उस आग की तपिश महसूस कराने की तैयारी चल रही है जो बीएचयू से 'हिन्दू' शब्द हटाने के कुत्सित विचार पर भड़की थी। आज लोग यह प्रश्न पूछ रहे हैं कि जब कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया जा सकता है तो आईटी-बीएचयू को बीएचयू में रहते हुए आईआईटी के रूप में उच्चीकृत क्यों नहीं किया जा सकता?

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को खण्ड–खण्ड करने पर तुली केन्द्र सरकार

–अशोक सिंहल, संरक्षक, विहिप

पिछले दिनों विश्व हिन्दू परिषद के संरक्षक श्री अशोक सिंहल ने  एक वक्तव्य जारी करके बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संदर्भ में कहा कि केन्द्र सरकार की नीतियां बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की गौरवमयी परंपराओं और उपलब्धियों को ध्वस्त कर रही हैं। केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने इस दुस्साहसी कृत्य में अपने से पहले के सभी मंत्रियों को पीछे छोड़ दिया है। विश्वविद्यालय को इतना अनदेखा किया गया है कि छात्र और अध्यापक दोनों अब मजबूरन बीएचयू–आईटी को आईआईटी में रूपांतरित करने की मांग कर रहे हैं। विश्वविद्यालय के नाम में 'हिन्दू' शब्द होने के चलते न केवल इसकी हिन्दू पहचान को ध्वस्त किया जा रहा है, बल्कि इसमें दी जाने वाली शिक्षा, खासकर तकनोलॉजी की शिक्षा को साजिश के तहत चोट पहुंचाई जा रही है। मालवीय जी की 150वीं जयंती के मौके पर इसमें सर्व प्रकार की शिक्षा देने के उनके व्यापक विचार को मिटा देने की कोशिशें चल रही हैं।

श्री सिंहल ने कहा कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का 'समग्र शिक्षा केन्द्र' का वैभवशाली दर्जा कायम रहना चाहिए। प्रस्तावित आईआईटी पूरी तरह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रशासन और न्यायक्षेत्र के अंतर्गत रहनी चाहिए।प्रतिनिधि

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