चर्चा सत्र
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चर्चा सत्र
डा.कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
पिछले दिनों चीन के राष्ट्रपति हू जिन ताओ 'ब्रिक्स' सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत की यात्रा पर आए थे। यह गुट ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका को मिलाकर बना है। इसकी मूल भावना यही है कि विकास में आपसी सहभागिता को सुदृढ़ किया जाए। लेकिन चीन के साथ भारत का रिश्ता केवल विकास की समस्याओं को सुलझाने तक का ही नहीं है बल्कि 1950 में बने नये पड़ोसी देश का रिश्ता भी है। 1950 से पहले तक चीन भारत का पड़ोसी देश नहीं था। भारत की उत्तरी सीमा-लद्दाख से लेकर तवांग तक-तिब्बत के साथ लगती थी। 1950 में तिब्बत पर कब्जा करने के बाद वह भारत का नया पड़ोसी देश बन बैठा।
मत भूलो इतिहास
इतिहास गवाह है कि तिब्बत और भारत, दोनों ने ही चीन की नई भूमिका के साथ संबंध निभाने का बहुत प्रयास किया। तिब्बत के शासकों ने 6 साल तक नये मालिक चीन के साथ किसी ढंग से तालमेल बिठाने का प्रयास किया। लेकिन अंतत: दलाई लामा को तिब्बत छोड़कर हिन्दुस्थान ही आना पड़ा। भारत का अनुभव भी कोई बहुत ज्यादा अच्छा नहीं रहा। चीन को प्रसन्न करने के लिए ही भारत सरकार ने एक प्रकार से तिब्बत की बलि दी थी। यह भारत ही था जिसने सबसे पहले स्वीकार किया था कि 'तिब्बत चीन का हिस्सा है।' गृहयुद्ध के बाद चीन में माओ की नई सरकार को मान्यता देने वालों में भारत रूस के बाद का दूसरा देश था। चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनवाने में जितना जोर जवाहर लाल नेहरू ने लगाया, उतना शायद चीन ने खुद भी नहीं लगाया होगा। उन दिनों अमरीका ने, कहा जाता है, भारत के सामने यह प्रस्ताव रखा था कि यदि वह चीन की तरफदारी करना बंद कर दे तो उसे सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनाया जा सकता है। परंतु नेहरू ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। हिन्दी चीनी-भाई भाई और पंचशील के अनेक गीत भारत सरकार ने चीन के साथ मिलकर ही गाए थे। परंतु चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण किया, जिसमें भारत को अपमान तो सहना ही पड़ा, साथ ही चीन के हाथों अपनी हजारों वर्गमील जमीन भी गंवानी पड़ी जो अभी तक चीन के कब्जे में ही है।
1975 के आसपास भारत सरकार ने एक बार फिर चीन के साथ नये संबंधों की शुरुआत की। लेकिन चीन ने तुरंत अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा जड़ दिया। शुरू में तो यह केवल बयानों तक ही सीमित था, लेकिन चीन की सेना ने अरुणाचल प्रदेश में घुसपैठ करनी शुरू कर दी। सब जानते हैं कि पाकिस्तान को परमाणु शक्ति सम्पन्न बनाने में सबसे बड़ा योगदान चीन का ही रहा है और अब उसने सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण गिलगित और बाल्टिस्तान का कुछ हिस्सा पाकिस्तान से 50 वर्ष की लीज पर ले लिया है और वहां अपने सैनिक भेज दिए हैं। ध्यान रहे, भारत का यह हिस्सा 1947 से पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है और अब चीन यहां अपनी सेना भेजकर लद्दाख सीमा की ओर से भारत की घेराबंदी कर रहा है।
मुद्दे की बात
इस पृष्ठभूमि में चीनी राष्ट्रपति का भारत आगमन विशेष ध्यान खींचता है। लगता था भारत सरकार चीनी राष्ट्रपति के सामने कई संवेदनशील मुद्दों पर अपनी चिंता प्रकट करेगी। लेकिन अंग्रेजी मीडिया अपनी पुरानी फितरत के अनुसार ही, चीनी राष्ट्रपति को महिमामंडित करने में जुटा रहा और साथ ही भारतीयों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करता रहा कि बढ़ रही चीनी ताकत से भारत को कोई खतरा नहीं है! भारत की अर्थनीति के विशेषज्ञ अच्छी तरह से जानते हैं कि चीन से अवैध रूप से जो घटिया माल हिन्दुस्थान में आ रहा है उससे देश भर के लघु उद्योग लगभग ठप होने के कगार पर पहुंच गए, इससे लाखों लोग बेरोजगार हो रहे हैं। चीन की प्रशंसा में गीत गाने वालों को शायद समझ नहीं आता कि मुद्दे की बात यह है कि चीन सीमा विवाद पर अपने रुख से एक इंच भी नहीं डिगा है।
अलबत्ता भारत सरकार की इस बात के लिए 'दाद' देनी होगी कि चीनी राष्ट्रपति हू जिन ताओ की यात्रा के ऐन वक्त पर सेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह का प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखा गया वह गोपनीय पत्र 'लीक' हो गया जिसमें भारतीय सेना की तैयारी और हथियारों की कमी पर चिंता प्रकट की गई थी। चीन के मुकाबले में हम कितना पीछे हैं इसका खुलासा उस पत्र से हुआ। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह पत्र हू जिन ताओ को खुश करने के लिए ही 'लीक' किया गया हो?
राजधानी में एक और दुखद प्रकरण हुआ। चीनी राष्ट्रपति के समक्ष तिब्बत की स्वतंत्रता को लेकर प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों को पीटने और उन्हें जेल में ठूंसने के लिए भारत सरकार इतनी जोश में दिखी कि पुलिस ने दिल्ली में रह रहे लद्दाखियों, अरुणाचलियों और पूर्वोत्तर के दूसरे लोगों को भी पकड़ना शुरू कर दिया। मामला इतना आगे बढ़ा कि आखिरकार दिल्ली उच्च न्यायालय को दखल देनी पड़ी। हू जिन ताओ की यह यात्रा इसलिए भी याद रहेगी कि इस अवसर पर तिब्बत के स्वतंत्रता-प्रेमियों ने देश की स्वतंत्रता की बलिबेदी पर एक और बलिदान दिया। दुर्भाग्य से भारत सरकार इस बार भी बलिदान देने वाले के साथ नहीं, बल्कि तिब्बत को दबोच लेने वाले हू के साथ खड़ी दिखाई nùÒ*n











