चर्चा सत्र
| दिंनाक: 05 Nov 2011 16:06:27 |
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चर्चा सत्र
षड्यंत्र से सावधान!
राजनाथ सिंह “सूर्य”
कांग्रेस बरास्ते बड़बोले दिग्विजय सिंह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देश में आतंक और घृणा बढ़ाने के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए बाबा रामदेव तथा अण्णा हजारे के बाद अब श्री श्री रविशंकर को संघ का मुखौटा साबित करने का अभियान चलाए हुए है। देश को कुशासन के गर्त में ढकेल देने के बाद कांग्रेस को अपनी गिरी साख से उबरने का यही एकमात्र उपाय सूझ रहा है। राष्ट्र और राज्य एक ही है, इस यूरोपीय अवधारणा को रा.स्व. संघ नकारता रहा है। उसका मानना है कि अतीत में भारत में अनेक राज्य होने को बावजूद वह एक राष्ट्र रहा है और यही कारण है कि भिन्न उपासना पद्धति को लेकर भारत में कभी भी वैमनस्य नहीं रहा है। भारत में जो दो उपासना पद्धतियां-ईसाइयत और इस्लाम-बाहर से आई हैं वे भी पहले से मौजूद अनेक उपासना पद्धतियों के समान ही अपनी उपासना पद्धति की विशिष्टता बनाये रखें। दूसरी ओर कांग्रेस है जो अल्पसंख्यक अर्थात मुस्लिम समुदाय को यह समझाने के लिए कि, वे भिन्न हैं, राष्ट्र की मुख्यधारा में उनको शामिल करने के अभियान को उनका अस्तित्व मिटाने की कोशिशें बताती है। कांग्रेस का दुष्प्रयास जहां दुनिया के तमाम इस्लामी और ईसाई देशों के निवासी अपने पूर्वजों पर गर्व करते हैं, वहीं भारत का मुसलमान अपना इतिहास इस्लाम स्वीकार करने के बाद से शुरू करता है। इसके लिए जो प्रयास अंग्रेजी हुकूमत ने इतिहास को विकृत करके किया था कुछ वैसा ही प्रयास कांग्रेस भी कर रही है। कांग्रेस राजनीतिक कारणों से अपनी सरकारों द्वारा मुसलमानों में पृथकता की भावना को बनाये रखने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देती। वास्तव में यदि कांग्रेस को केवल वोट बैंक की ही चिंता है तो उसे पचासी प्रतिशत हिंदुओं की चिंता करनी चाहिए न कि 15 प्रतिशत अल्पसंख्यकों की, लेकिन हिन्दुओं का थोक वोट न होने के कारण वह सत्ता के लिए अल्पसंख्यकवाद यानी मुस्लिम तुष्टीकरण को महत्व देती है। जबकि संघ तो अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक की अवधारणा से ऊपर उठकर पूरे समाज को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर ले जाने का प्रयास कर रहा है। भारत एकमात्र देश है जिसने अपने नागरिकों को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की अवधारणा पर आधारित संविधान प्रदान किया है। यह आश्चर्य की बात है कि संविधान सभा में जो समझदार लोग थे उन्होंने इसके परिणाम का उसी प्रकार आकलन नहीं किया था जिस प्रकार वंदेमातरम् के स्थान पर “जन-गण-मन” को राष्ट्रगान स्वीकार करने पर नहीं किया गया था। फलत: द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत की जिस मान्यता के आधार पर भारत का विभाजन हुआ वह भावना मिटने के बजाय बलवती होती जा रही है। यद्यपि इन दिनों अनेक समझदार मुसलमानों ने यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं दिखाई है कि समाज की मुख्यधारा से जुड़े बिना उनका विकास नहीं हो सकता, चाहे सरकार सच्चर या रंगनाथ मिश्र जैसी कमेटियों के सभी सुझाव यथावत ही क्यों न स्वीकार कर ले, उन्हें वोट बैंक के रूप में कभी एक दल तो कभी दूसरा दल ठगता रहेगा। अमरीका में मार्टिन लूथर किंग के नेतृत्व में श्वेत एकाधिकार के खिलाफ अभियान अल्पसंख्यक लोगों के लिए अलग से कानून व्यवस्था की मांग को लेकर नहीं खड़ा हुआ था। उन्होंने समान नागरिक अधिकारों की मांग की थी। उसी का परिणाम है कि श्वेतों के बहुमत वाले देश में एक अश्वेत व्यक्ति राष्ट्रपति बना। भारत में तीन-तीन मुस्लिम राष्ट्रपति हो चुके हैं, कैबिनेट सचिव तक मुसलमान हुए हैं, सेना के तीनों अंगों में मुस्लिम महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। ये सभी किसी आरक्षण के तहत नहीं बल्कि समान नागरिक अधिकार की मान्यता के कारण ही उच्च पदों पर पहुंचे। जबकि कांग्रेस जातीय और क्षेत्रीय हित अथवा सिर्फ परिवार के कल्याण तक सीमित राजनीतिक दल है, जो सेकुलर का तमगा लटकाकर क्रियाशील है। वह मुसलमानों को “पृथक राष्ट्र” के रूप में बने रहने के लिए चुनाव आते ही प्रलोभनों के टुकड़े फेंकना शुरू कर देती है जैसा कि आजकल चल रहा है। राजनीतिक दलों को इससे वोट का लाभ भले ही मिलता रहा हो, लेकिन मुस्लिम समुदाय मुख्यधारा से निरंतर कटता जा रहा है। यहां तक कि अब अपने पिछड़े होने का कारण उचित स्थान न मिलना मानते हुए कुछ मुस्लिम नेता आरक्षण की मांग को संसद और विधानमंडलों में भी लाये जाने की अभिव्यक्ति करने लगे हैं। जरूरी है कि अरब संस्कृति को छोड़कर उसे अपने देश की संस्कृति को अपनाना चाहिए, जैसा इंडोनेशिया या मलेशिया में है। गर्त की ओर जैसे अंग्रेजों ने जातीय और क्षेत्रीय पक्ष को अभिव्यक्त करने वाले संगठनों को शह देकर कांग्रेस के तत्कालीन सर्वसमाज अभियान को बिगाड़ने का प्रयास करने में कल्पित प्रचार का सहारा लिया था, वही स्थिति आज की सोनिया पार्टी की भी है। वह भ्रष्टाचार, महंगाई, प्रशासनिक अराजकता के खिलाफ मुखरित समाज को संज्ञा शून्य करने के लिए बाबा रामदेव, अण्णा और श्री श्री रविशंकर को संघ का मुखौटा करार देकर उनकी छवि को बिगाड़ने का काम कर रही है। उन पर प्रत्यक्ष या परोक्ष अनर्गल आरोप लगाकर जहां एक ओर वह देश के सामने मुंहबाए खड़ीं समस्याओं से ध्यान बंटाने की कोशिश कर रही है, वहीं संघ का भय दिखाकर मुस्लिम मतों को अपने पक्ष में एकजुट करना चाहती है, क्योंकि अखिल भारतीय स्तर पर अब भारतीय जनता पार्टी ही एकमेव पार्टी है जो उसे गंभीर चुनौती दे रही है। संभव है भयादोहन से सम्मोहित मुस्लिम समाज को संघ के प्रयास की सार्थकता समझने में अभी कुछ समय और लग जाय, लेकिन हिंदू समाज को तो इस दुरभिसंधि को समझना चाहिए और जैसे विभाजन के पूर्व अंग्रेजों के नेतृत्व को नकारते हुए उसने आस्था को डिगने नहीं दिया, उसी प्रकार उसे बाबा रामदेव, अण्णा हजारे और श्री श्री रविशंकर की त्रिमूर्ति द्वारा स्वशासन को सुशासन में बदलने के अभियान के मूलमंत्र को समझकर अडिग रहना चाहिए। समाज को भ्रमित करने के अनेक उपाय कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हो रहे हैं, वह अदूरदर्शी और अनुभवहीन नेतृत्व के संचालन के कारण वह स्वयं गर्त में गिरती जा रही है। एक राष्ट्र-एक समाज- एक जन का नारा लगाते हुए जिस ईमानदार तथा पारदर्शी जीवनशैली ने भारत के लिए “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी”की अभिव्यक्ति करायी थी, उस की सार्थकता बनाए रखने की जरूरत है।द