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केन्द्र की लापरवाही से

Written byArchiveArchive
Nov 5, 2011, 12:00 am IST
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आवरण कथा

दिंनाक: 05 Nov 2011 16:18:15

आवरण कथा

 

मणिपुर में उबाल

बासुदेब पाल

31 अक्तूबर की आधी रात को मणिपुर सरकार और 92 दिनों तक मणिपुर की आर्थिक नाकेबंदी जारी रखने वाली “सदर हिल्स डिस्ट्रिक्ट डिमांड कमेटी” के बीच समझौता पत्र पर हस्ताक्षर होने के बाद मणिपुर की जनता ने राहत की सांस ली है। पिछले 92 दिन से इस पर्वतीय राज्य में दैनिक जरूरतों की चीजों के अलावा जीवन रक्षक दवाओं तथा अन्य सभी प्रकार की चीजों की आपूर्ति के रास्ते बंद थे। मणिपुरवासियों को इस हद तक परेशानी का सामना करना पड़ा कि जो गैस सिलेंडर 400 रुपये का है वह 1500 से 2000 रुपये में तथा जो एक लीटर पेट्रोल 67 रुपये में मिलता है वह 150 से 200 रुपये में मिल रहा था। आवश्यक चीजों की कमी इसलिए हुई क्योंकि राजधानी इम्फाल की जीवनरेखा कहे जाने वाले सिल्चर-इम्फाल और इम्फाल-दीमापुर राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक क्रमश: 53 और 39 लगभग तीन महीने से बंद थे। “सदर हिल्स डिस्ट्रिक्ट डिमांड कमेटी” ने एक नया जिला बनाने की मांग को लेकर इन राजमार्गों पर आवाजाही रोक रखी थी। तीन दौर की वार्ता के बाद कमेटी के अध्यक्ष नगामखोहाओ हॉकिप ने संतोष जताते हुए कहा कि लगता है उनकी मांग को लेकर केन्द्र और राज्य सरकार गंभीर हैं। राज्य सरकार ने सिद्धांत रूप में एक अलग सदर हिल्स जिला घोषित करने का समझौता किया है। इस समझौते के बाद हालांकि तनावग्रस्त मणिपुर में धीरे-धीरे शांति बहाली के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन मणिपुर के मौजूदा उबाल के पीछे अनेक घटनाओं का हाथ रहा है। वहां तनाव की स्थिति यह है कि अब उसे अशांत राज्यों की श्रेणी में गिना जाने लगा है। क्योंकि मणिपुर में यूनाइटेड नागा काउंसिल ने भी पिछले 74 दिनों से दो राष्ट्रीय राजमार्गों पर आर्थिक नाकेबंदी की हुई है, जो इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जारी है।

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हिंसक राजनीति

मोटे तौर पर सन् 1950 के दशक से मणिपुर में उपद्रव और अशांति का वातावरण उभरने लगा था। हिंसक राजनीति के चलते इस खूबसूरत पर्वतीय राज्य की तस्वीर बिगाड़ी जाने लगी। वह रवैया आज भी जारी है। बीच-बीच में कुछ समय के लिए हिंसक वातावरण में कमी भले ही आ जाती हो, लेकिन कोई न कोई गुट माहौल बिगाड़ने में देर नहीं लगाता। 1978 के बाद से तो इसमें कमी आती नहीं दिखी है। पिछले चार-पांच साल से वहां जैसे हालात बनाए गए वह किसी सभ्य देश के राज्य की ओर संकेत नहीं करते। इम्फाल घाटी के निवासी तो रोज-रोज के बंद और आर्थिक नाकेबंदी से बेहद त्रस्त हैं। इस पर दुर्भाग्य यह कि न राज्य सरकार को इसकी खास चिंता है, न केन्द्र की संप्रग सरकार इस ओर ध्यान देती है।  राज्य सरकार की उदासीनता और लापरवाही को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने तो पिछले दिनों प्रधानमंत्री से मिलकर सरकार को बर्खास्त करने की भी मांग की थी।

आज से लगभग 40 साल पहले तत्कालीन राजनीतिक नेताओं ने कहा था कि नागा क्षेत्र में कूकी बहुल इलाके को एक अलग जिला बनाया जाएगा। उसी वायदे को क्रियान्वित करने के प्रयास से मौजूदा असंतोष शुरू हुआ था। “सदर हिल्स डिस्ट्रिक्ट डिमांड कमेटी” उसी नये जिले की मांग को लेकर आंदोलनरत थी। इसके अलावा मणिपुर के छात्र संगठनों, राजनीतिक दलों, सामाजिक संस्थाओं तथा कुछ विद्रोही गुटों ने इतना प्रभाव जमा लिया है कि यहां गृह युद्ध जैसी स्थितियां पैदा कर दी जाती हैं। आपस में टकराव चरम पर है। टकराव भी कई प्रकार के हैं-सरकार बनाम विद्रोही गुट, मणिपुरी बनाम गैर मणिपुरी, नागा बनाम कूकी और विद्रोही गुटों की आपसी रंजिश। पिछले तीन महीने से सुलग रही आग यानी आर्थिक नाकेबंदी के पीछे मूलत: मणिपुरी बनाम नागा तनाव था।

पर्वतीय और मैदानी अंतर

भौगोलिक दृष्टि से मणिपुर मुख्यत: दो भागों में बंटा हुआ है। एक हिस्सा अपेक्षाकृत मैदानी है जिसे इम्फाल घाटी कहते हैं तो दूसरा पर्वतीय क्षेत्र है। इम्फाल घाटी में मणिपुरी (मैतेयी) बहुसंख्या में हैं जबकि पर्वतीय क्षेत्र में जनजातियां बहुसंख्यक हैं। मणिपुर के स्थाई निवासियों में प्रमुख रूप से तीन वर्ग हैं-मणिपुरी या मैतेयी, नागा और कूकी। इनके अलावा यहां प. बंगाल, बिहार, उ.प्र., पंजाब, हरियाणा, राजस्थान से आए लोग भी निवास करते हैं। कुछ संख्या में दक्षिण भारतीय एवं नेपाली भी यहां रहते हैं। नागा और कूकी में फिर आगे उपजातियां हैं।

1947 में आजादी के बाद मणिपुर में विभिन्न जनजातियों और वर्गों के बीच किसी न किसी वजह से कभी मनमुटाव तो कभी हिंसक झगड़ा देखने में आया। इसमें भारत सरकार की नीति ही दोषी मानी जाती है। इसके तहत नागा जनजातीय समाज के लोग इम्फाल घाटी में आकर नौकरी-व्यवसाय कर सकते हैं, लेकिन मणिपुरी समाज के लोग पर्वतीय क्षेत्र में उन सब चीजों से आम तौर पर वंचित हैं। स्थानीय मणिपुरवासियों की यही मान्यता है। कुछ तो आरक्षण और ज्यादा मात्रा में संवैधानिक प्रावधानों के चलते नागा समाज के लोग स्थानीय प्रशासन में अपना प्रभाव बढ़ाते जा रहे हैं। लेकिन, जैसा पहले कहा, पर्वतीय क्षेत्र में मैतेई लोगों को कोई विशेषाधिकार नहीं हैं। उनको लगता है कि वे अपनी धरती पर प्रवासी होते जा रहे हैं और इसमें केन्द्र सरकार की गलत नीतियां ही जिम्मेदार हैं। उनका मानना है कि उनके ऊपर नागाओं का वर्चस्व थोपा जा रहा है। इससे नागाओं का बोलबाला हो रहा है और मणिपुरी समाज सिमटता जा रहा है। मणिपुर के नौ जिलों-इम्फाल पूर्व, इम्फाल पश्चिम, विष्णुपुर, चंदेल, चूड़ाचांदपुर, सेनापति, तामेंगलोंग, थाउबल, उखरूल में से इम्फाल पूर्व, इम्फाल पश्चिम, विष्णुपुर और थाउबल जिलों में मणिपुरी अधिक संख्या में हैं जबकि अन्य पांच जिलों में नागा जनजाति की संख्या अधिक है। इन पांच में से जिन चार जिलों में नागाओं का वर्चस्व है उनमें मैतेई का नौकरी या व्यवसाय करना तो दूर, स्थाई तौर पर रहना भी संभव नहीं है। इन जिलों में उनके मनों में नागाओं को लेकर एक हौवा सा बैठा हुआ है। इस स्थिति के पीछे नागा विद्रोही गुट एनएससीएन (आई-एम) और केन्द्र सरकार के बीच लम्बे समय से चला आ रहा संघर्षविराम भी एक बड़ा कारण रहा है। इस गुट के दो बड़े नेताओं-इसाक और मुइवा-को केन्द्र सरकार राजकीय अतिथि की मान्यता देती है।

एनएससीएन का राष्ट्र विरोधी प्रस्ताव

अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि शांति वार्ता के बहाने नागा अपने असली मकसद यानी वृहत्तर नागालैंड यानी नागालिम की जमीन तैयार कर रहे हैं। इस कल्पित नागालिम के क्षेत्र में उन्होंने नागालैंड से सटे अरुणाचल, मणिपुर, असम के नागा आबादी वाले जिलों को भी शामिल किया हुआ है। दोनों नागा विद्रोही गुटों एनएससीएन (आई-एम) और एनएससीएन (खापलांग) की यही मंशा है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भीतर ही भीतर केन्द्र सरकार भी उनके उस राष्ट्रविरोधी प्रस्ताव का समर्थन करती दिखती है। उसे लगता है कि इन विद्रोही गुटों की बात मानने से नागालैंड में शांति स्थापित हो जाएगी। केन्द्र सरकार के इस रवैये से मणिपुर के गैर नागा निवासियों में बेहद बेचैनी है। इस वजह से रह-रहकर तनाव दिखाई देता है। मणिपुरवासियों को डर है कि कहीं केन्द्र सरकार “वृहत्तर नागालैंड” के राष्ट्रविरोधी प्रस्ताव पर गुपचुप कोई समझौता न कर ले। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि 1972 में नागालैंड के गठन के समय भी नागा नेताओं ने मणिपुर के नागा आबादी वाले उखरुल और सेनापति जिलों को नवगठित नागालैंड में शामिल करने की इच्छा जताई थी। लेकिन मणिपुर के नागा नेताओं ने उस पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी इसलिए ऐसा नहीं हो पाया था।

बना हुआ है तनाव

1980 के बाद से मणिपुर में “वृहत्तर नागालैंड” के संदर्भ में हिंसक-अहिंसक राजनीतिक आंदोलन चलाया जाता रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि नागालैंड में निवास कर रहे नागाओं और मणिपुर के नागाओं के बीच अनेक अंतर्विरोधों के चलते दूरियां हैं, लेकिन बदलते वक्त के साथ सेनापति और उखरुल जिलों में बसे नागा मुइवा के पाले में जाते दिखते हैं। उस तरफ से भी केन्द्र सरकार पर रह-रहकर दबाव डाला जाता रहा है।

प्रस्तावित सदर हिल्स जिले में मणिपुरी एवं कूकी जनजाति बहुसंख्या में है। हालांकि 1974 में नयाल आयोग ने सदर हिल्स जिला बनाने की सिफारिश कर दी थी, लेकिन तत्कालीन सरकार ने उसको इसलिए क्रियान्वित नहीं किया था कि कहीं नागा समुदाय इससे नाराज न हो जाए। फिर 1982 में मणिपुर के तत्कालीन मुख्यमंत्री रिशांग कीशिंग ने सदर हिल्स जिला बनाने की पहल की मगर मणिपुर नागा काउंसिल के तीखे विरोध से ऐसा करना संभव नहीं हुआ। फिर 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रणबीर सिंह और 1998 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लिपामाचा सिंह ने भी ऐसे प्रयास किए, मगर वे भी सफल नहीं हो पाए। वर्तमान मुख्यमंत्री इबोबी सिंह ने भी प्रयास किया और इसका नतीजा समझौता पत्र पर हस्ताक्षर के रूप में सामने आया। सैकुल, सैएतू और कांग-कूकी ब्लाक के 54 गांवों को मिलाकर नया सदर हिल्स जिला बनाने का प्रस्ताव है। इन गांवों में से कुछ में नागा आबादी है जिस वजह से बात बन नहीं पा रही थी। हालांकि वह केवल एक दिखावा था, क्योंकि नागाओं के मन में कहीं न कहीं नागालिम को लेकर एक कल्पना उभर रही है, जिसे वे पूरा करना चाहते हैं।

इस बीच पिछले दिनों भाजपा प्रतिनिधिमंडल ने लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज के नेतृत्व में प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंप कर मणिपुर की समस्या तुरंत सुलझाने की मांग की थी। अब सदर हिल्स जिला बनाने पर सहमति के बाद 92 दिन पुरानी आर्थिक नाकाबंदी हटने से मणिपुर में जनजीवन धीरे-धीरे सामान्य होने की उम्मीद की जानी चाहिए। उम्मीद यह भी की जानी चाहिए सभी प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक दल, केन्द्र सरकार, राज्य सरकार और अन्य संबंधित पक्ष इस विषय पर गंभीरता से सोचेंगे और उसका राष्ट्र हित में समाधान खोजेंगे।द

पर्वतीय क्षेत्र में मैतेई लोगों को कोई विशेषाधिकार नहीं हैं। उनको लगता है कि वे अपनी धरती पर प्रवासी होते जा रहे हैं और इसमें केन्द्र सरकार की गलत नीतियां ही जिम्मेदार हैं। उनका मानना है कि उनके ऊपर नागाओं का वर्चस्व थोपा जा रहा है।

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