दृष्टिपात
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*आलोक गोस्वामी
अफगानिस्तानके राष्ट्रपति हामिद करजई की पिछले दिनों भारत यात्रा के दौरान भारत-अफगानिस्तान रणनीतिक करार हुआ था। इसी स्तम्भ में हमने लिखा था कि, पाकिस्तान को ये दोस्ती रास नहीं आएगी और वह हर तरह की कोशिश करेगा कि भारत अफगानिस्तान के बीच नजदीकियां न बढ़ें। इसके प्रमाण अब मिलने लगे हैं। नफरती बयानबाजियों की अगुआई करते हुए पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ ने मंशा साफ कर दी है। उन्होंने कहा कि अगर भारत अफगानिस्तान के करीब होता रहा तो आई.एस.आई. हरकत में आएगी और इस करीबी को घटाने की मुहिम में जुटेगी। अमरीका ने जिस आई.एस.आई. को आतंकवादियों की मददगार बताया है और खुद मुशर्रफ लादेन के मामले में जिसकी कार्रवाइयों से खुद को अनजान बता चुके हैं अब उसी कुख्यात गुप्तचर एजेंसी की भावी रणनीति के बारे में वे इतनी मजबूती से कह रहे हैं! यह कैसे संभव हुआ?
“कारनेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस” (वाशिंगटन) के मंच से 26 अक्तूबर को भाषण देते हुए मुशर्रफ ने खिसियाए स्वर में कहा कि भारत और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों में 1950 के दशक से ही आपसी सहयोग रहा है। मुशर्रफ को दिक्कत है कि अफगानिस्तानी कूटनीतिक, खुफिया अधिकारी, सुरक्षा अधिकारी, सैन्य अधिकारी वगैरह प्रशिक्षण के लिए भारत जाते हैं। उन्हें शिकायत है कि “भारत में उन्हें पाकिस्तान विरोधी पाठ पढ़ाया जाता है।” मुशर्रफ की इस “समझदारी भरी तकरीर” के पीछे, उनके शब्दों में, “उनका भारत-विरोधी होना” नहीं है, बल्कि ये सब उन्हें गुप्तचरी से पता चला है और उनका दावा है कि यही तथ्य है। लादेन-वध के बाद जब आई.एस.आई. पर उसे छुपाए रखने में मदद के आरोप उछले थे तब यही मुशर्रफ थे जो बड़ा मासूम सा चेहरा बनाए टीवी पर इंटरव्यू दे रहे थे कि आई.एस.आई. ने लादेन की मदद की या नहीं, वह नहीं जानते क्योंकि वह तो अरसे से सत्ता से बाहर हैं, उन्हें “नहीं पता भीतरखाने क्या चलता है”। अब वही मुशर्रफ आई.एस.आई. की आगे की संभावित रणनीति पर दमदारी से बोल रहे हैं। सो कैसे? भारत में निर्दोषों की जान ले रहे जिहादियों को “स्वतंत्रता सेनानी” बताने वाले मुशर्रफ ने भारत में नफरती बीज बोने और कश्मीर में जिहादी आग सुलगाए रखने में कितना बढ़-चढ़कर भाग लिया था, इस बाबत शायद ही वह कभी तकरीर करेंगे!थ*
“हमारे अपराधी हमें दो!”
बंगलादेश की शेख हसीना सरकार इन दिनों भारत सरकार से रूठी हुई है। तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे में अड़ंगा पड़ने के साथ ही वह भारत की जमीन से बंगलादेश में अपराध की दुनिया बसाए बैठे नामी अपराधियों को उसे न सौंपे जाने से नाराज है। ध्यान देने की बात है कि यह शेख हसीना सरकार ही थी जिसने अपनी जमीन पर फल-फूल रहे उल्फा विद्रोहियों के बड़े नेताओं पर शिकंजा कसके उन्हें भारत के हवाले किया था। बदले में वह उन बंगलादेशी अपराधियों की मांग कर रही है जो भारत में छुपे हैं और यहीं से बंगलादेश में लूट-खसोट, फिरौती और हत्याओं की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं।
बंगलादेश के “वीकली ब्लिट्ज” की रपट की मानें तो भारत के सुरक्षा अधिकारियों की यह अनमनी बंगलादेश की “भारत- हितैषी” अवामी लीग सरकार की मुश्किलें बढ़ा रही है। इस अखबार के अनुसार, भारत में बसे इन बंगलादेशी आतंकवादियों ने भारत के शेयर बाजारों में अकूत पैसा लगाया हुआ है। बंगलादेशी गुप्तचर सूत्रों के अनुसार, 74 से ज्यादा कुख्यात बंगलादेशी आतंकी सरगना भारत के विभिन्न शहरों में “छुपे” हुए हैं।
इनमें से कुछ हैं-फिरदौस उर्फ काला जहांगीर, जब्बार मुन्ना, मुल्ला मसूद, शमीम अहमद, फतेह अली, उमर फारुक, तनवीरुल इस्लाम, रफीकुल इस्लाम, खुर्शीद आलम वगैरह। इंटरपोल उनमें से ज्यादातर के खिलाफ रेड कार्नर नोटिस जारी कर चुका है। नई दिल्ली को, अखबार के अनुसार, कई बार इनके बारे में कहा जा चुका है, पर यहां के अधिकारी कार्रवाई करने से हिचकिचाते रहे हैं। इनकी करतूतें भारत की गुप्तचर एजेंसियों से छुपी नहीं हैं। पर, सूत्रों के हवाले से अखबार लिखता है कि ये अपराधी “हफ्ता” देकर सीमा पार अपराधी हरकतें जारी रखे हुए हैं। इनमें से कुछ के भारत में बैंक खाते चल रहे हैं, फर्जी या असली नामों से भारत के पासपोर्ट भी बनवा लिए हैं।
लेकिन नई दिल्ली के लिए भारी मुसीबत की बात यह है कि ऐसे कुछ अपराधियों के तार जम्मू-कश्मीर में सक्रिय जिहादी गुटों से जुड़ चुके हैं, जिसके बारे में भारत की गुप्तचर एजेंसियां अनजानी नहीं हैं। जिहादी आतंकवादियों के खिलाफ सख्ती दिखाने से बचने वाली सरकार कहीं इसमें भी तो मुस्लिम वोट की राजनीति नहीं देख रही? थ्
“मैंने मारा तानाशाह”
सिरते के रेगिस्तान में गद्दाफी को पाइप से निकालकर फफेड़े जाने और खून से सराबोर किए जाने के दृश्य टेलीविजन पर कई-कई बार दोहराए गए। तब गद्दाफी जिंदा था, पर पकड़े जाने के कुछ देर बाद मारा गया। बाद में एक जवान लीबियाई विद्रोही ने इंटरनेट पर एक वीडियो “अपलोड” करके दावा किया कि उसी ने गद्दाफी को पकड़ा था और दो गोलियां मारी थीं जिससे वह बुरी तरह घायल हो गया था। गद्दाफी कैसे मारा गया, इस पर दुनियाभर में सवाल उठ ही रहे थे कि उधर उस नौजवान का वीडियो आ गया जिसने बवाल और बढ़ा दिया।
इस शख्स, सनद अल-सादिक अल उरीबी, के वीडियो में कुछ अनजान लोगों, जिनमें से कुछ फौजी वर्दी में थे, को उसका इंटरव्यू लिए जाते दिखाया गया है। वे उसे बधाई देते दिखते हैं। खून से लथपथ एक जैकेट और सोने की अंगूठी दिखाई गई है, जो कथित तौर पर गद्दाफी की थी। अंगूठी पर गद्दाफी की दूसरी बीवी का नाम “सफिया” और उनके निकाह की तारीख “10 सितम्बर, 1970” गुदी हुई थी। वीडियो में उरीबी शेखी बघारते हुए कहता दिखता है, “मैंने उस पर दो गोलियां चलाईं, एक उसकी बगल में, दूसरी सिर पर। वह एकदम से नहीं मरा, बल्कि आधे घंटे बाद मरा।” *











