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बच्चों को समाज में घुलने-मिलने दें

Written byArchiveArchive
Sep 28, 2011, 12:00 am IST
inArchive

बाल मन

दिंनाक: 28 Sep 2011 19:55:21

मायाराम पतंग 

 बच्चे सदैव स्वयं कुछ करके देखना चाहते हैं। किन्तु माता-पिता प्राय: उन्हें स्वयं सोचने या करने का अवसर नहीं देना चाहते। इस संबंध में अनेक पक्ष विचारणीय हैं। कार्य कैसा है, परिस्थिति कैसी है? बच्चे का स्वभाव कैसा है? यदि कार्य तुरन्त करणीय है और उसे शीघ्र न किया तो बच्चे की बड़ी हानि हो सकती है तो आदेश देना आवश्यक है। यदि परिस्थिति ऐसी है कि बच्चा कई उलझनों से घिरा हुआ है, उसका मन-मस्तिष्क भ्रमित है। वह निर्णय लेने में असमर्थ लग रहा है। उसकी घबराहट स्पष्ट दिखाई पड़ रही है तो भी आदेश देना उचित रहता है। स्वभाव से मेरा अभिप्राय है कि यदि आपको मालूम है कि वह अपने मन से कुछ करता ही नहीं है। आदेश मानकर वह पूरे जी जान से कार्य करता है तब तो आदेश देना ही श्रेयस्कर है।

अधिकांश बच्चे अपने मस्तिष्क से स्वयं सोचना और स्वयं करना पसंद करते हैं। ऐसे बच्चे आदेश पाकर उस कार्य को रुचिपूर्वक नहीं करते। प्राय: बच्चे अपने खिलौनों को खोलकर देखना चाहते हैं। उसके अंदर की तकनीक समझना चाहते हैं अत: खिलौना टूट जाता है। माता-पिता और अभिभावक उस पर कुपित होते हैं, डांटते हैं, कभी-कभी पिटाई भी कर देते हैं। इससे बच्चे जिद्दी, चिड़चिड़े और मन से विद्रोही हो जाते हैं।

कभी-कभी हम बच्चों के मन में उठे भावों का उचित सम्मान नहीं करते। वह कुछ प्रश्न करता है तो हम उसको डांट कर चुप कर देते हैं। यह पद्धति ठीक नहीं है। बच्चों के प्रश्नों को ध्यानपूर्वक सुनें, समझें तथा समझदारी से उनको उत्तर दें। यदि आप उन प्रश्नों का सही उत्तर नहीं जानते तो झूठ या बेतुका उत्तर देकर बहकाएं नहीं। उन्हें या तो किसी अन्य अनुभवी व्यक्ति से पूछने का सुझाव या स्वयं सही उत्तर खोजकर ही बताएं। वास्तव में वह आप पर भरोसा करके पूछता है। आपके दिए हुए उत्तर को वह सही मानकर चलता है। अत: गलत या बहकावे का उत्तर उसे गलत दिशा दे सकता है।

बच्चों के मन में किसी भी वर्ग या समुदाय के प्रति घृणा का भाव नहीं पनपना चाहिए। ऐसा हुआ तो वह बड़ा होकर भी कभी अपनी धारणा नहीं बदल सकेगा, जिससे जीवन में अनेक बार गलत निर्णय लेकर हानि भी उठा सकता है। इसी प्रकार किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान से भय न दिखाएं। यदि बचपन से ही वह किसी वस्तु विशेष से डरने लगा तो बड़े होने पर भी वह इस भय से मुक्त नहीं हो पाएगा। प्राय: माताएं बच्चों को व्हौव्वा आयाव् कह कर डराती हैं। कभी व्बुड्ढा बाबा पकड़ कर ले जाएगाव् कहती हैं। उदाहरण दिया जाता है कि एक पहलवान को दंगल में उतरना था। बड़े नामी पहलवान से उसका मुकाबला होना था। वह बड़े जोश में था तभी कहीं से बिल्ली आ गई तो वह डर कर अखाड़े से बाहर भागा। पूछने पर पता चला कि बचपन से ही उसे कहानी सुनाई गई थी। बिल्ली आंखें निकाल लेती है और खून पी जाती है। तभी वह बिल्ली से बहुत डरता था। कहने का अभिप्राय है कि कभी भी बच्चों के मन में किसी वस्तु विशेष का भय न बैठाएं। भय से उसका मन दुर्बल हो जाता है।

बच्चों को जीवन की वास्तविकता से सामना करने दीजिए। उन्हें अपना अनुभव और विचार बनाने दीजिए। किसी परिस्थिति में कुछ कहना आवश्यक समझें तो केवल सुझाव ही दें, आदेश नहीं। सुझाव भी यदि प्रत्यक्ष न देकर किसी घटना, कहानी या अनुभव कथन से दिए जाएं तो अधिक प्रभावी और कारगर होंगे। इसका अभिप्राय यह भी नहीं कि बच्चों को बुरी आदतों से, बुराइयों से आगाह न करें। बुराइयों से बचाना अभिभावकों का दायित्व है। अत: इस तथ्य को ठीक से समझें।

बच्चों को यह स्पष्ट समझाएं कि उक्त बुराई का परिणाम भावी जीवन में क्या निकलेगा? अपने कथन का प्रमाण प्रस्तुत करें तो वह स्वयं विचारपूर्वक निर्णय कर लेगा और वांछित सफलता प्राप्त करेगा। यदि आप केवल आदेश के स्वर में भय दिखाकर मना करेंगे तो वह जिज्ञासा वश उसी गन्दगी में जा फंसेगा जिससे आप बचाना चाहते हैं।

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