तलाक और तबाही
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तलाक और तबाही

Written byArchiveArchive
Sep 28, 2011, 12:00 am IST
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आंगन की तुलसी

दिंनाक: 28 Sep 2011 15:18:09

सरिता राठौर

 हमारे शास्त्रों में तलाक जैसा कोई शब्द नहीं मिलता है। इसका अर्थ यह है कि हमारे यहां तलाक का कोई प्रावधान ही नहीं है। किन्तु कुछ वर्षों से तलाक के इतने मामले सामने आ रहे हैं कि भारतीय समाज अचंभित है। लोग सवाल कर रहे हैं कि जिस देश में सीता, सावित्री, अनुसुइया जैसी पतिव्रताएं हुई हों, उस देश में तलाक की घटनाएं बढ़ती क्यों जा रही हैं? छोटी-छोटी बातों पर पति-पत्नी के बीच इतना मनमुटाव हो रहा है कि महीनों तक एक ही छत के नीचे रहते हुए भी दोनों में बातचीत तक नहीं होती है। फिर दोनों एक-दूसरे से अलग रहने लगते हैं। और एक दिन सुनने में आता है कि दोनों में तलाक हो गया। तलाक के बाद कोई पत्नी या पति कितना सुखी रहता है, यह तो वही बता सकता है। किन्तु पति-पत्नी के बीच की इस लड़ाई से बच्चे बड़े दु:खी होते हैं। बच्चे मां के साथ रहें या पिता के साथ इसके लिए भी मुकदमेबाजी शुरू हो जाती है। इस कारण ऐसे बच्चों की शिक्षा आदि प्रभावित हो जाती है। कुछ पति-पत्नी तो तलाक के बाद भी बहुत परेशान रहते हैं। किन्तु अहं के कारण एक नहीं हो पाते हैं और जीवन बोझ लगने लगता है, नीरस होता जाता है।

 

दिल्ली के एक विद्यालय में पढ़ाने वाली सीमा तलाकशुदा जीवन बिता रही हैं। सीमा कहती हैं, व्यदि वैवाहिक जीवन ठीक रहता तो आज वह भी मातृत्व सुख महसूस करतीं। बार-बार दहेज की मांग करने से हम दोनों में दूरी बढ़ती गई। इसमें सास की भी अहम भूमिका रही। सामाजिक संस्था व्नवज्योतिव् की पहल से हम दोनों एक बार साथ भी रहने लगे। पर ससुराल वालों की वजह से फिर परेशानी हुई। 2006 में मुकदमेबाजी शुरू हो गई और अब कुछ दिन पहले ही तलाक हुआ है। मुआवजे के रूप में मुझे तीन लाख रु. मिले हैं। पैसे का क्या करेंगे, जीवन तो बाधित है। तरह-तरह की परेशानियां उठानी पड़ती हैं।व्

 

मेरे पड़ोस की एक लड़की रेणुबाला का विवाह कुछ दिन पहले हुआ था। दुर्भाग्य से 1 वर्ष के अन्दर उसके पति का निधन हो गया। जब उसके पति का निधन हुआ उस समय उसके गर्भ में एक बच्चा पल रहा था। पति के न रहने पर ससुराल वालों ने उसे प्रताड़ित करना शुरू किया। थक-हार कर वह अपने छोटे बच्चे को लेकर मायके आ गई। वह अभी 20-21 साल की ही थी। माता-पिता बहुत परेशान होने लगे। मुश्किल से एक लड़का मिला और उसके साथ उसका विवाह कर दिया गया। किन्तु वह नशेबाज निकला। दारू पीकर मार-पीट करना आम बात हो गई। बेचारी क्या करे, कुछ दिन बाद फिर से मायके आ गई और तलाक ले लिया। कहती है कि अब क्या होगा? यदि दूसरा विवाह न करूं तो समाज के लोग ताने मार-मार कर जीना मुश्किल कर देंगे। और विवाह की बात करती भी हूं तो कोई लड़का मुझसे विवाह नहीं करना चाहता है।

 

सौन्दर्य विशेषज्ञा शालिनी बताती हैं, व्2001 में विवाह हुआ लेकिन आपसी सामंजस्य का अभाव रहा। हम लोग कई बार साथ रहे और अलग हुए। हम पति-पत्नी के बीच दरार उत्पन्न कराने में आधुनिक व पारंपरिक विचारों और सास का हाथ रहा। समझाने बुझाने के बाद भी बात जमी नहीं। सात वर्ष तक सिर्फ मैं ही समझौता करती रही। अंतत: महिला शाखा में जाना पड़ा। वहां से तलाक मिल गया और मुआवजे के रूप में ससुराल से 2 लाख रु. भी मिले। अब मैं दूसरी शादी करना चाहती हूं, क्योंकि मेरे दो बच्चे पिता का प्यार पाने के लिए बेचैन रहते हैं। फिर समाज में प्रतिष्ठित जीवन जीने के लिए संरक्षण भी चाहिए।व्

 

तलाकशुदा जीवन जी रहीं शाल्वी अपनी अन्तर्वेदना व्यक्त करते हुए कहती हैं, व्अपने भावी पति को पहली बार देखने के बाद ही मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा। मैं शिक्षित थी और वह अशिक्षित। सास द्वारा अलग कर देने के बाद वह अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रहे। अंतत: पंचायत द्वारा हम अलग हो गए। अब मैं पूर्णत: अपने भविष्य को ठीक करने में लगी हूं। इसके बाद दूसरी शादी पर विचार करूंगी।व्

 

43 वर्षीय रचना एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में शिक्षिका हैं। 1984 में इनका विवाह हुआ था। दहेज की मांग के कारण ही इनका ससुराल में रहना कठिन हो गया। इनके साथ अक्सर मार-पीट होती रहती थी। एक दिन वह मायके लौट आईं। 1999 में इनके पति ने दूसरा विवाह कर लिया। फिर इनके सब्रा का बांध टूटा और मामला न्यायालय तक पहुंच गया। अभी तक कोई निर्णय नहीं हुआ है।

 

तलाक के कई मामलों को देख रहीं अधिवक्ता कुसुम रोहेला बताती हैं, व्आज की पढ़ी-लिखी लड़कियां नौकरी के कारण घर से बाहर रहती हैं। यदि उनका विवाह किसी परम्परावादी परिवार में हो जाता है तो समस्या खड़ी हो जाती है। लड़की बिन्दाश रहना चाहती है, जो परिवार वालों को पसन्द नहीं होता। ऐसे बहुत मामले न्यायालय में आते रहते हैं, और दोनों पक्ष तलाक की अर्जी लगाते हैं।व्

 

दिल्ली उच्च न्यायालय में तलाक के अनेक मुकदमों को निपटाने वाले वकील विवेकानन्द झा मानते हैं कि पति-पत्नी में सहनशीलता की कमी होने के कारण तलाक ज्यादा हो रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि माता-पिता अपने बच्चों का सही मार्गदर्शन नहीं कर पा रहे हैं। इस कारण बच्चों में उच्श्रृंखला बढ़ रही है। यही बाद में अनेक समस्याओं का कारण बनती है। संस्कृतज्ञ डा. व्यासनन्दन शास्त्री मानते हैं कि यदि बच्चों को प्रारंभ से पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों से जोड़ा जाए तो तलाक की घटनाएं कम हो सकती हैं।

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