| दिंनाक: 12 Dec 2010 00:00:00 |
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घोषित बंगलादेशी खुलेआम कैसे घूम रहे हैं?गुवाहाटी उच्च न्यायालय बंगलादेशी घुसपैठियों के मामले में राज्य सरकार और केन्द्र सरकार सहित सुरक्षा ऐजेंसियों को लगातार फटकार लगा रहा है, पर ये हैं कि बेशर्मी का लबादा ओढ़े बैठे हैं। बंगलादेशी घुसपैठियों को चिन्हित कर वापस भेजने का निर्देश देने के बावजूद जब राज्य व केन्द्र सरकार ने उसकी अवहेलना की तो गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने गत 26 नवम्बर को 5 सूत्रीय निर्देश भी जारी कर दिए। इसी के साथ सीमा सुरक्षा बल को भी जमकर लड़ाता। चिन्हित किए गए बंगलादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने के अपने निर्देश की अवहेलना पर कड़ा रुख अपनाते हुए गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने कहा कि यह शर्मनाक है, इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.के. शर्मा ने गत 26 नवम्बर को सीमा सुरक्षा बल, राज्य सरकार और केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा- “उच्च न्यायालय द्वारा अधिकृत और मान्यता प्राप्त “फारेनर्स ट्रायब्यूनल” द्वारा बंगलादेशी नागरिक घोषित किए गए अताउरर्हमान को अब तक वापस सीमा पार न भेजा जाना आश्चर्यचकित करने वाला उदाहरण है। असम में बंगलादेशियों का घुसपैठ कर स्थायी रूप से बस जाना एक स्थापित सत्य है। इसके कारण से कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होती है। बावजूद इसके केन्द्र सरकार, राज्य सरकार और सीमा सुरक्षा बल ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। चिन्हित किए गए बंगलादेशियों को सीमापार बंगलादेश भेजने की कोई कारगर व्यवस्था नहीं की। आमतौर पर चिन्हित किए गए बंगलादेशियों को सीमापार भेजने के कुछ दिनों के भीतर ही बंगलादेशी अधिकारी उन्हें वापस भारत में भेज देते हैं।”न्यायमूर्ति बी.के. शर्मा की अध्यक्षता वाली खण्डपीठ ने इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया कि जिन्हें “फारेनर्स ट्रायब्युनल” ने बंगलादेशी घोषित कर दिया है आखिर वे किस अधिकार से न्यायालय का दरवाजा खटखटा रहे हैं, उन्हें तत्काल सीमापार क्यों नहीं भेजा गया? “फारेनर्स ट्रायब्यूनल” द्वारा बंगलादेशी चिन्हित किए जाने के बावजूद भारत सरकार के विरुद्ध न्यायालय में अपील करने वाली आजया खातून, गोपाल चन्द्र दास, अनवत्राखातून, पारुल दास, अताउरर्हमान, उजिदुर रहमान, वहरा खातून और हमीदा खातून आदि की अर्जी खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि इनके बंगलादेशी सिद्ध हो जाने के बाद इन्हें किसी प्रकार का अधिकार नहीं रह जाता कि ये भारतीय न्याय व्यवस्था का प्रयोग करें। इनके साथ उसी प्रकार का व्यवहार करना चाहिए जैसा बिना पासपोर्ट के विदेशी नागरिक से किया जाता है। बावजूद इसके, ये बंगलादेशी खुलेआम घूम रहे हैं और न्यायालय में अपील कर रहे हैं।इसी के साथ गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने 5 सूत्री निर्देश भी जारी किए और राज्य सरकार, केन्द्र सरकार व सम्बंधित सभी विभागों को इनका कड़ाई से पालन करने को कहा। इन निर्देशों के अनुसार- (1) राज्य सरकार को पासपोर्ट कानून-1920 पूरी तरह लागू करना पड़ेगा। उस कानून की धारा 4 के अनुसार कोई भी संदिग्ध विदेशी कानूनी कागजात (पासपोर्ट आदि) के बिना अगर भारत में घुसता है तो वह गैरकानूनी और दण्डनीय है। उसे पुलिस अधिकारी द्वारा अदालत के सुपुर्द किया जायेगा। उसके बाद कानूनी प्रक्रिया चालू रहेगी।(2) राज्य सरकार को केन्द्र सरकार द्वारा प्रदत्त सर्कुलर-16, सितम्बर-1997, 9 सितम्बर-1992 एवं 23 नवम्बरट 2009 को दिये गए संशोधित सर्कुलर को लागू करना पड़ेगा। इस सारे विषय पर 22 नवम्बर, 2010 को केन्द्र सरकार ने एक हलफनामा दाखिल कर सूचित किया है।(3) राज्य सरकार को निष्कासन कानून, 1950 पूरी तरह लागू करना अनिवार्य होगा।(4) राज्य सरकार को राज्य भर में “फारेनर्स ट्रायब्यूनल”- के लिए आधारभूत ढांचा तुरंत खड़ा करना पड़ेगा। इस ट्रायब्यूनल में रिक्त पदों को उन्हीं के बीच से सक्षम अधिकारी चुन कर भरा जाए।(5) “फारेनर्स ट्रायब्युनल” द्वारा किसी को “विदेशी” घोषित किए जाने के तुरंत बाद उसे या उन सभी को हिरासत में लेना पड़ेगा। विदेशी घोषित किये जाने के बाद “भारत छोड़ो”- नोटिस देने की कोई जरूरत नहीं है। उन्हें उसी समय हिरासत में लेकर “बंदी शिविर” में रखना ही पड़ेगा। उसका नाम भी उसी समय मतदाता सूची से हटाना होगा।न्यायालय का अनुभव है कि “भारत छोड़ो” नोटिस देने और मतदाता सूची से नाम हटाने का नोटिस देने के दौरान ही गड़बड़ होती है और बंगलादेशी यहीं रह जाते हैं। खण्डपीठ ने आगे कहा, -“दो महीने के अन्दर राज्य एवं केन्द्र सरकार को विदेशी नागरिक बंदी एवं उन्हें वापस भेजने सम्बंधी सूचना अदालत को देनी होगी।”द19