| दिंनाक: 12 Dec 2010 00:00:00 |
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श्रीमती मीना पाण्डे के सम्पादन में “सृजन से” नामक एक साहित्यिक त्रैमासिकी (एम-3, एम.आई.जी. फ्लैट, सी-61, वैष्णव अपार्टमेन्ट, शालीमार गार्डन-द्वितीय, साहिबाबाद, गाजियाबाद उ.प्र. से प्रकाशित मूल्य 30/- रु. प्रति) ने अपने सुरुचिपूर्ण सम्पादन, कलात्मक नयनाभिराम प्रस्तुतीकरण और एक नैष्ठिक समर्पण के कारण प्रथम अंक से ही सह्मदयों के चित्र का संस्पर्श किया। इस समय इसका तीसरा अंक “स्मृति अंक” के रूप में सामने आया है जो विशेष स्नेह प्राप्त करने का अधिकारी है। सम्पादकीय में स्पष्ट किया गया है कि “स्मृति अंक की सामग्री पर चर्चा करें तो हमारा उद्देश्य अधिक से अधिक दिवंगत शाख्सियतों का उल्लेख कर फेहरिस्त बनाना नहीं वरन् उससे महत्वपूर्ण कुछ जानी-अनजानी शख्सियतों के बहाने उस अतीत के कुछ सुनहरे पन्ने पलटना भर है, जिसने हमें स्मरणीय कृतियां तथा रचनाकार दिए।” सम्पादकीय के समापन की कविता पंक्तियां भी अपनी ईमानदार कहन के कारण लुभाती हैं और पत्रिका पढ़ने का आमंत्रण देती हैं-चुराई हुई एक बातअतीत की लम्बी चिट्ठी सेलजक भरा वो स्वादयादों की खट्टी चटनी सेभावना के कुछ अंकुरशब्दों की गीली मिट्टी सेसृजन से लेकर आया हैये अंक तुम्हारी स्मृति में।मुख्यत: नौ रचनाकारों का इस अंक में पुण्य-स्मरण हुआ है जिनके शोभन चित्रों का सौष्ठवपूर्ण संयोजन भी ध्यान आकृष्ट करता है। रचनाकार इस प्रकार हैं, सर्वश्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर (1861-1941), कन्हैयालाल नंदन (1933-2010), मनोहर श्याम जोशी (1933-2006), सुमित्रानंदन पंत (1900-1977), मौलाराम तोमर (1740-1833), गिरीश तिवारी गिर्दा (1945-2010), इफ्तिखार खां (1926-1969), दुष्यन्त कुमार (1933-1975) तथा शेक्सपियर (1564-1616)। विभिन्न कालखण्डों और साहित्यिक विधाओं से सम्बद्ध ये हस्ताक्षर एक अंक में समाविष्ट हो कविता-कहानी-चित्रकला-लोकगाथा-गजल और रंगमंच का एक संकर्षक कोलाज निर्मित करते हैं। अविस्मरणीय इन चरित्रों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधृत विविध विद्वानों के संस्मरणात्मक तथा समीक्षात्मक आलेख हमारी साहित्य-तृषा को तृप्त करने में सक्षम हैं। पत्रिका में पाठकीय प्रतिक्रियाओं को भी पर्याप्त स्थान मिला है और पत्र-लेखकों की विचारपूर्ण टिप्पणियों, सुझावों तथा आशंसा-प्रशंसा से अनुभव होता है कि पत्रिका दूर तक और सही हाथों में जा रही है। किन्तु इसका समग्र प्रभाव एकदेशीय पत्रिका का नहीं अपितु समग्र हिन्दी क्षेत्र के भावों की संवाहिका पत्रिका का ही है। सुप्रसिद्ध महिला कथाकार मृदुला गर्ग का साक्षात्कार जहां अत्यन्त आत्मविश्वासपूर्ण टिप्पणियों से समृद्ध है वहीं वंचित वर्ग की चिंताओं को सामने लाने वाला “दलित लेखन की आधुनिकता और सांस्कृतिक विरासत” शीर्षक वाला श्री ओमप्रकाश वाल्मीकि का लेख कुछ खुरदरे तथा असहज कर देने वाले सवाल उठाकर ठहरी झील में कंकड़ फेंकता है। मुखपृष्ठ से ही सज्जा आकृष्ट करने वाली है जो अन्तिम पृष्ठ तक कायम रहती है। साहित्य जगत में अभिनव पत्रिका के इस उद्भव और विभव का हार्दिक स्वागत है। दअभिव्यक्ति मुद्राएंघर में धेला एक नहीं हैखर्च अठन्नी का,विद्यालय से नाम कटा हैछुटकी मुन्नी का,चिढ़ा रहा मुंह बस्ता कल सेबंधा अलगनी है-बापू बेबस हैं, अम्मा केहाथ सुमरनी है।-देवेन्द्र सफलमैना पिंजरे में फिरे विकल-विकल हो रोय,विधना सबसे बेखबर चादर ताने सोय।-(स्व.) सुमन सरीन्17