| दिंनाक: 12 Dec 2010 00:00:00 |
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देश के साथ धोखाथाईलैण्ड और लाओसपिछले दिनों राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल कम्बोडिया और लाओस की यात्रा पर गई थीं। इन दोनों देशों के साथ भारत का प्राचीनकाल से सम्बंध रहा है। लाओस के निवासी लाओस को भगवान राम के पुत्र लव से जोड़ते हैं और लव देश से लाओस कहलाया। थाईलैण्ड में भी भगवान श्रीराम के पुत्र लव के नाम से एक नगर लवपुरी है। एक और बड़े नगर का नाम अयोध्या है, जो पहले थाईलैण्ड की राजधानी हुआ करता था। कम्बोडिया भी “कम्बुज” का अंग्रेजी उच्चारण है। दोनों देशों में रामायण की समृद्ध परम्परा है। कम्बोडिया की रामायण मंडली तो भारत में आकर रामायण का अभिनय भी कर चुकी है। कम्बोडिया के नरेश नरोत्तम सिंहानुक जब यूरोप के दौरे पर जाया करते थे तो कम्बोडिया की गौरवमयी संस्कृति का प्रदर्शन करने के लिए रामायण की मंडली साथ ले जाया करते थे। उनकी पुत्री पुष्पा सीता जी का अभिनय करती थीं। दो दशक पूर्व वहां “खमेर रूज” नामक कम्युनिस्टों के साथ हुए गृहयुद्ध में बहुत कुछ नष्ट हुआ, फिर भी कम्बोडिया में अंकोरवाट के नाम से प्रसिद्ध संसार का सबसे बड़ा विष्णु मंदिर सुरक्षित बना रहा। अंकोरवाट की दीवारों पर सम्पूर्ण रामायण के चित्र बने हुए हैं।कम्बोडिया और लाओस की भाषाओं में संस्कृत शब्दावली प्रचुर मात्रा में हैं। वैज्ञानिक तथा अन्य पारिभाषिक शब्द संस्कृत के ही हैं। वहां की भाषाओं की लिपियां भी भारतीय ही हैं जो भारत की प्राचीन ब्राह्मी लिपि से ही विकसित हुई हैं। कम्बुज में फ्रांस का राज्य रहा, फ्रैंच विद्वानों ने ही अंकोरवाट के विराट मंदिर को खोजा और कम्बोडिया में संस्कृत भाषा के नौ हजार शिलालेखों को इकट्ठा कर पुस्तक रूप में प्रकाशित किया। कम्बोडिया विश्व का एकमात्र ऐसा देश है जिसके राष्ट्रीय ध्वज के मध्य में “अंकोरवाट” के मंदिर का चित्र है। लाओस में भी संस्कृत भाषा के शिलालेख मिलते हैं। कोई 25 वर्ष पूर्व जब लाओस के महाराजा भारत की यात्रा पर आये थे तो उन्होंने बताया कि वे वाल्मीकि रामायण के छंदों में ही लाओ रामायण की दोबारा रचना कर रहे हैं। लाओस एक अत्यधिक धनहीन देश होते हुए भी अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को बनाये रखे हुए है। दोनों देशों में भारत का “शक संवत्” प्रचलित है, महीनों के नाम भी चैत्र, बैसाख, आषाढ़ आदि भारत के समान ही हैं। कम्बुज देश में 800 वर्षों तक संस्कृत ही राजभाषा रही। किन्तु दोनों देशों में बाद में धर्म भाषा के रूप में संस्कृत का स्थान पाली ने ले लिया। इन दोनों देशों के लिए भारत पुण्यभूमि है। दोनों देशों में 6-7 सौ वर्षों से थेरवादी बौद्धमत का प्राबल्य है। लाओस के साथ लगते हुए देश वियतनाम के दक्षिण पूर्वी भाग में चम्पा नाम का हिन्दू राज्य तो तीसरी शताब्दी में ही स्थापित हो चुका था। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी भारत की शिक्षा नीति ऐसी बनाई गई, जिसमें भारत के प्राचीन गौरव और भारत के सांस्कृतिक विस्तार का गौरवपूर्ण इतिहास शिक्षार्थियों को पढ़ाया नहीं जाता रहा। भारतीय संस्कृति को ही साम्प्रदायिकता के साथ जोड़ दिया गया। आज भारत अंग्रेजों के प्रभाव वाली “कॉमनवेल्थ” का सदस्य है, जबकि एशिया के समान-संस्कृति वाले देश तो भारत के साथ मिलकर हिन्दू-बौद्ध राष्ट्रकुल बनाना अधिक पसंद करेंगे।-डा. कैलाश चन्द्र333, सुनहरी बाग अपार्टमेंट, सेक्टर-13 रोहिणी, दिल्ली-110085श्री देवेन्द्र स्वरूप का लेख “देशद्रोहियों की पूजा, देशभक्तों पर पत्थर” अच्छा लगा। ऐसा लगता है कि सोनिया पार्टी देश के साथ धोखा कर रही है। यह पार्टी अपने दोषों को छिपाने के लिए नित्य नया नाटक कर रही है। इसका पर्दाफाश करना जरूरी है। मीडिया को अपना दायित्व बोध समझना चाहिए।-मनीष जैन100, मण्डी की नाल, उदयपुर (राजस्थान)थ् यह देश का दुर्भाग्य है कि समस्त सत्ता सूत्र एक वंश में केन्द्रित हो गए हैं और यह वंश इस देश में वंशवादी राजनीति को टिकाए रखना चाहता है। इसलिए पूरे देश में पृथकतावाद, भ्रष्टाचार और विखण्डन को प्रोत्साहन दे रहा है, क्योंकि विखण्डन की राजनीति में ही वंशवादी राजनीति फल-फूल सकती है।-गणेश कुमार21, पाटलिपुत्र पथ, राजेन्द्र नगर, पटना (बिहार)थ् कांग्रेस ने जो नीति अपनायी है वह देशघातक है। संघ का स्वयंसेवक कभी देश-विरोधी काम नहीं कर सकता है। जो लोग जातिवादी राजनीति करते हैं, मुस्लिम तुष्टीकरण करते हैं, उन्हीं की नजरों में संघ अच्छा संगठन नहीं है। देश की जनता सबको देख रही है कि कौन देश के साथ छल कर रहा है। जनता ही जवाब देगी।-बीर बहादुर सिंह चौहान6, राजा ए.सी. मल्लिक रोड, जादवपुर कोलकाता (प. बंगाल)थ् सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का उद्बोधन प्रेरक है। हिन्दुत्व सर्वकल्याणकारी है इसलिए उसकी विजय निश्चित है। हिन्दुत्व से जुड़े कई धार्मिक एवं सामाजिक संगठन बढ़िया काम कर रहे हैं, उन्हें सफलता भी मिल रही है। सफलता का प्रतिशत तब और बढ़ेगा जब हिन्दू अपने मूल्यों और सिद्धान्तों पर अडिग रहें। अपनी जीवन-पद्धति में सुधार लाएं।-बी.आर. ठाकुरसी-115, संगम नगर, इन्दौर (म.प्र.)थ् देशभक्तों पर पत्थर मारना तो कांग्रेस की आदत रही है। कांग्रेस अभी भी वीर सावरकर को पसन्द नहीं करती है। संसद के केन्द्रीय कक्ष में जब वीर सावरकर का चित्र लगाया जा रहा था तो कांग्रेस ने खुलकर उसका विरोध किया था। कांग्रेस को औरंगजेब रोड पर अपना दफ्तर खोलना स्वीकार है, पर पं. दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर नहीं। ऐसी पार्टी को क्या कहेंगे, और इससे अपेक्षा क्या रखेंगे?-लम्बोदरजलालगढ़, पूर्णिया (बिहार)थ् पंथनिरपेक्षता के छद्म आवरण में राष्ट्रभक्तों की आवाज दबा दी जाती है, जबकि देशद्रोहियों को आजाद कश्मीर की घोषणा करने का अवसर प्रदान किया जाता है। दुर्भाग्यवश, मीडिया भी पूर्वाग्रस्त होकर कांग्रेसनीत केन्द्र सरकार के गुप्त एजेंडे में सहयोगी एवं कश्मीर की आजादी की मांग करने वाले अलगाववादी तत्वों के हित पोषण में लगा हुआ है। देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को उद्यत रहने वाले स्वयंसेवक आतंकवादी कैसे हो सकते हैं? वास्तव में मुस्लिम वोटों के सौदागर कुछ राजनीतिक दल सत्ता प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की निस्वार्थ राष्ट्रभक्ति पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं।-विक्रम सिंह15/92, मोहल्ला जोगियों वाला, घरौंडा करनाल (हरियाणा)थ् सम्पादकीय “कांग्रेस की कुटिलता का जवाब देंगे राष्ट्रभक्त” संकेत करता है कि कांग्रेस के सत्तास्वार्थ सीमा पार कर चुके हैं। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कांग्रेस राष्ट्रवादी ताकतों को फर्जी मुकदमों में फंसाना चाहती है। कांग्रेस ने सदैव राष्ट्र के साथ धोखा किया है। भ्रष्टाचार की गंगोत्री भी कांग्रेस ने ही बहाई है। कांग्रेसियों ने सत्ता का दुरुपयोग जम कर किया है।-प्रदीप सिंह राठौरमेडिकल कालेज, कानपुर (उ.प्र.)विचित्र एवं दुर्भाग्यपूर्णप्राचीन काल से लेकर आज तक भारत का अभिन्न अंग रहा है “कश्यप निर्मित कश्मीर” के अन्तर्गत श्री नरेन्द्र सहगल ने यह सिद्ध कर दिया है कि कश्मीर की राजव्यवस्था सदैव भारतीय सƒााटों की राजव्यवस्था के अन्तर्गत रही है। इस तथ्य से अरुंधति जैसे कुंठित बुद्धिजीवियों को कुछ सीखना चाहिए, जो यह कहने में गर्व का अनुभव करते हैं कि भारत में कभी केन्द्रीय सत्ता नहीं रही और कश्मीर कभी भी भारत का भाग नहीं रहा। अलगाववादी तत्व भारत के साथ खुले द्रोह पर उतर आए हैं और भारतीय सेना, राष्ट्रध्वज और संविधान का अपमान खुलेआम जारी है। बावजूद इसके दिल्ली की कायर सरकार कोई प्रभावशाली कदम उठाने की बजाय कश्मीर में पाकिस्तानपरस्त अलगाववादियों के एजेंडे पर ही चलती दिखाई दे रही है, जो विचित्र ही नहीं बल्कि दुर्भाग्यपूर्ण भी है।-आर.सी. गुप्ता201, द्वितीय ए, नेहरू नगरगाजियाबाद (उ.प्र.)थ् यह शाश्वत सत्य है कि कांग्रेस कभी भी कश्मीर के प्रति न गंभीर हुई है, और न होगी। यही कारण है कि ऐसे लोगों को वार्ताकार के रूप में भेजा गया, जो कांग्रेस की विचारधारा पर ही काम करें। वार्ताकारों को अलगाववादियों के प्रति हमदर्दी तो है, पर उन लाखों हिन्दुओं के प्रति नहीं, जो अपने ही देश में विस्थापित का जीवन जी रहे हैं। कश्मीर घाटी पर अरबों रु. खर्च किए जा रहे हैं, फिर भी आतंकवादी गुरर्#ाते हैं, और भारत सरकार सब कुछ देखकर भी चुप है।-वंशीधर चतुर्वेदीएल.2, 1506, शास्त्री नगर, मेरठ (उ.प्र.)थ् यदि कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टीकरण का नशा न चढ़ता तो मजहब के आधार पर भारत का विभाजन भी न होता। पहले कांग्रेसी मंचों से ही अलगाववादी बातें उठती हैं, फिर वही अन्य लोग दुहराते हैं। 1921 में काकीनाड (आं.प्र.) में कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ था। मोहम्मद अली ने अध्यक्षता करते हुए दो अलगाववादी बातें कहीं- एक, “वन्देमातरम्” का गान न हो, दूसरी, मुस्लिमों को विशेषाधिकार दिए जाएं। गांधी जी और नेहरू ने इन बातों का समर्थन किया था। वही परम्परा आज भी कांग्रेस में है।-डा. कृ.पु. हरदास7, समर्थ नगर पश्चिम, वर्धा मार्गनागपुर (महाराष्ट्र)अलगाववादियों की करतूतराजधानी दिल्ली में कश्मीरी अलगाववादियों ने देश-विरोधी बातें करके सरकार को सीधी चुनौती दी है। मीडिया ने भी उनकी करतूतों को सही ढंग से नहीं रखा। देशवासियों को अलगाववादियों की हर करतूत की जानकारी देना मीडिया का कर्तव्य है। ये अलगाववादी देश के विरुद्ध जहर उगलते हैं, फिर कुछ समय चुप रहने के बाद सरकार से आर्थिक “पैकेज” प्राप्त करते हैं। हमारी सरकार भी इतनी भोली है कि वह उनकी हर बात मान लेती है।-अनिता मिश्र207/4, मानस इन्कलेव, पिकनिक स्पाट रोड लखनऊ (उ.प्र.)अरुन्धति का अक्षम्य अपराधलेखिका अरुन्धति राय कहती हैं, “कश्मीर कभी भारत का अंग था ही नहीं…” यह बयान देशद्रोही है और कश्मीरी अलगाववादियों को प्रोत्साहित करने वाला है। इससे पूर्व अरुन्धति ने कहा था, “नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में जो कुछ किया वह उचित है और नक्सलियों को भारतीय सुरक्षाबलों के साथ यही करना चाहिए था।” फिर भी अरुन्धति पर सरकार हाथ नहीं डाल रही है।-दिलीप कुमार मिश्रदौलतगंज, लश्कर, ग्वालियर (म.प्र.)पञ्चांग वि.सं.2067तिथि वार ई. सन् 2010मार्गशीर्ष शुक्ल 7 रवि 12 दिसम्बर, 2010″ ” 8 सोम 13 ” “” “(तिथि वृद्धि) 8 मंगल 14 ” “” ” 9 बुध 15 ” “” ” 10 गुरु 16 ” “” ” 11 शुक्र 17 ” “” ” 12 शनि 18 ” “15