| दिंनाक: 12 May 2010 00:00:00 |
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समस्या या समाधान?महाराष्ट्र/ द.वा. आंबुलकरआदर्श सोसाइटी घोटाले के मुद्दे पर राज्य में नेतृत्व परिवर्तन के बाद अशोक चव्हाण के स्थान पर पृथ्वीराज चव्हाण ने मुख्यमंत्री की गद्दी संभाल ली है। एक लम्बे अंतराल के बाद राज्य का मुख्यमंत्री दिल्ली से भेजा जाना, दिल्ली द्वारा तय किया जाना एक नया राजनीतिक संयोग है। महाराष्ट्र का राजनीतिक इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी राज्य का मुख्यमंत्री दिल्ली से भेजा गया, उसे राज्य का अंदरूनी समर्थन नहीं मिला। इसके पहले अब्दुल रहमान अंतुले, बाबासाहब भोसले, शिवाजीराव निलंगेकर जैसे दिल्ली द्वारा भेजे गये मुख्यमंत्री प्रभावहीन ही सिद्ध हुए हैं।दिल्ली से मुम्बई आकर अपना प्रभाव जमाने के अलावा पृथ्वीराज चव्हाण को शुरू में ही कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इनमें पहला है मुख्यमंत्री पद की मंशा लिये गत पांच सालों से इंतजार कर रहे नारायण राणे। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रहे नारायण राणे 2005 में शिवसेना छोड़ अपने दर्जन भर साथी विधायकों के साथ कांग्रेस में शामिल हुए थे, मुख्यमंत्री पद का ही आश्वासन पाकर। विगत पांच वर्षों में पहले विलासराव देशमुख और बाद में अशोक चव्हाण ने नारायण राणे को राजनीतिक मात देते हुए मुख्यमंत्री पद से दूर रखा। अब तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री पद से वंचित रहना नारायण राणे के लिए कठिन हो रहा है। पृथ्वीराज चव्हाण के शुरुआती दिनों में ही राणे एक चुनौती अवश्य बन गए हैं।कांग्रेस के राज्यस्तरीय नेतृत्व में परिवर्तन का मामला भी अधर में ही लटका हुआ है। कांग्रेस द्वारा महात्मा गांधी के सेवाग्राम आश्रम में राज्यस्तरीय कार्यकर्ता रैली के आयोजन के लिए राज्य के मंत्रियों एवं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण द्वारा लाखों से लेकर करोड़ों रु. तक का भुगतान एवं उसमें से आलाकमान (सोनिया गांधी) को दी गयी करोड़ों रु. की राशि के ब्यौरे टीवी चैनलों के माध्यम से राज्य कांग्रेस अध्यक्ष मा#िणकराव ठाकरे द्वारा जिस प्रकार से सार्वजनिक किए गए, उससे राज्य कांग्रेस अध्यक्ष को बदलने की बात भी जोर पकड़ती जा रही है। हालांकि बदले हुए परिदृश्य में राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष का बदला जाना भी सत्ता का संतुलन बिगाड़ सकता है।राज्य में सोनिया कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस की गठबंधन सरकार है। सरकार को स्थिर एवं कारगर बनाए रखने हेतु दोनों दलों का स्थिर रहना जरूरी होता है। राज्य में अशोक चव्हाण के इस्तीफे के बाद उप-मुख्यमंत्री पद पर राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रभावशाली नेता छगन भुजबल को हटाकर शरद पवार के भतीजे अजीत पवार को लाये जाने से राज्य की राजनीतिक स्थिति और बिगड़ गयी है। यह परिवर्तन परिवारवाद को बढ़ावा देने वाला है, इस कारण छगन भुजबल भी नाराज हो गये हैं। छगन भुजबल भी एक जमाने में शिवसेना के शीर्षस्थ नेता रहे हैं। वे मुम्बई से लेकर महाराष्ट्र के अनेक स्थानों पर कई बार अपना शक्ति प्रदर्शन भी कर चुके हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस के विधायकों-कार्यकर्ताओं को भी छगन भुजबल का बदला जाना रास नहीं आ रहा है। गठबंधन सरकार में राष्ट्रवादी कांग्रेस की अंदरूनी उठापटक का असर भी पृथ्वीराज चव्हाण को चिंता में डालेगा।उप मुख्यमंत्री पद पर अजीत पवार का चयन जिस ढंग से हुआ उससे भी कई विवाद खड़े हो गये हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस के विधायक दल की बैठक में 62 में से 50 विधायक तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस के समर्थक 11 निर्दलीय विधायक उपस्थित थे। उनको निर्देश के तौर पर कहा गया कि वे उप मुख्यमंत्री पद हेतु अजीत पवार का ही समर्थन करें। इस सारे मुद्दे पर छगन भुजबल तथा उनके समर्थकों ने अब तक तो चुप्पी साध रखी है, पर निकट भविष्य में यह मुद्दा केवल राष्ट्रवादी कांग्रेस के लिए ही नहीं बल्कि गठबंधन सरकार की स्थिरता एवं कार्य कुशलता के लिए भी सिरदर्द बन सकता है।अशोक चव्हाण को “आदर्श सोसाइटी परियोजना” में किये गए भ्रष्टाचार के कारण हटाकर उनके स्थान पर “मिस्टर क्लीन” पृथ्वीराज चव्हाण को लाया गया है। पर इस परियोजना में हुए घोटाले से पृथ्वीराज चव्हाण भी अलग नहीं हैं, इस बात का भंडाफोड़ भाजपा के प्रदेश महामंत्री एवं विधायक विनोद तावड़े ने किया है। विनोद तावड़े द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार महानगर मुम्बई के बडाला में पिछड़े व दुर्बल तबकों के लिए विशेष रूप से बनाये गये तथा उन्हीं के लिए आरक्षित भवन परियोजना में झूठे हलफनामे के आधार पर पृथ्वीराज चव्हाण ने मुख्यमंत्री के कोटे से फ्लैट प्राप्त किया था, जो गैरकानूनी है एवं यह भ्रष्टाचार का मामला है। जिस भ्रष्टाचार के कारण राजनीतिक उथल-पुथल हुई, उस आदर्श सोसाइटी से संबद्ध भ्रष्टाचार एवं अनियमितताओं से भी पृथ्वीराज चव्हाण पूरी तरह अछूते नहीं हैं। विनोद तावड़े के अनुसार आदर्श सोसायटी का एक फ्लैट संजय रायकर का भी है, जो पृथ्वीराज चव्हाण के कार्यालय में विशेषाधिकारी के रूप में कार्यरत रहे हैं। इन तथ्यों से पृथ्वीराज चव्हाण के मुख्यमंत्री बनते ही यह बात उभरकर सामने आयी है कि वे भी “मिस्टर कांग्रेसी” हैं, “मिस्टर क्लीन” नहीं।एक बात स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर गाजे-बाजे के साथ मुख्यमंत्री के बदलाव के बावजूद कांग्रेस ने कुछ भी नहीं पाया है। अशोक चव्हाण पर मुख्यमंत्री काल के अंतिम सप्ताह में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे, जबकि पृथ्वीराज चव्हाण के मुख्यमंत्री के नाते काम शुरू करने के पहले ही भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं। इसी ने इस प्रश्न को जन्म दिया है कि “महाराष्ट्र में पृथ्वीराज चव्हाण- समस्या हैं या समाधान?”द23