| दिंनाक: 07 Apr 2010 00:00:00 |
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शिवओम अम्बरमैंरे सामने समकालीन हिन्दी साहित्य की एक सुप्रसिद्ध पत्रिका है जिसमें प्रगतिशील कहे जाने वाले शिविर के एक चर्चित कवि की कविता प्रकाशित हुई है- “क्योंकि मैं एक मुसलमान हूं।” स्वयं को भारत के अल्पसंख्यक समूह की तरफ से प्रस्तुत करते हुए इस कवि ने अपनी अभिव्यक्ति में ऐसा दिखाया है कि इस देश में हर मुसलमान को राक्षस माना जाता है और उसे किसी भी वक्त जमींदोज किया जा सकता है! कविता की कुछ पंक्तियां उद्धृत कर रहा हूं-मेरे दस सिर हैंक्योंकि मैं एक मुसलमान हूंमेरे बीस हाथ हैंक्योंकि मैं एक मुसलमान हूंमैंने सीता का अपहरण किया हैक्योंकि मैं एक मुसलमान हूंसोने की लंका मेरी राजधानी हैक्योंकि मैं एक मुसलमान हूंमुझे खाक में मिला दिया जाएगाक्योंकि मैं एक मुसलमान हूंमैं इस कविता को पढ़कर हैरान हूं। क्या सचमुच इस देश में ऐसा हो रहा है? स्थितियां तो इस वर्णन के विपरीत दिखाई देती हैं। जिस देश का प्रधानमंत्री पूरी बेशर्मी के साथ उद्घोषणा करे कि इस देश के समस्त संसाधनों पर पहला हक तथाकथित अल्पसंख्यक समुदाय का है, जहां कमोबेश हर राजनीति दल इसी समुदाय को रिझाने की चेष्टा में संलग्न है, जहां खूंखार उग्रवादियों की सजाएं भी स्थगित होती रहती हैं क्योंकि इस समुदाय के नाराज हो उठने का खतरा है, वहां यह कविता यथार्थ का चित्रण नहीं अपितु अपने को प्रगतिशील सिद्ध करने के लिए बेवजह एक समुदाय को पीड़ित दिखाने का नाटकीय उपक्रम मात्र प्रतीत होती है। इस कविता के परिपार्श्व में मैं आज इसी विधा और इसी भंगिमा के साथ लिखी गई एक रचना को रखना चाहता हूं जिसका यथार्थ भावना का अतिरेकमय प्रक्षेपण नहीं अपितु विविध समाचार माध्यमों से पुन: पुन: प्रमाणित घटनाओं का काव्यात्मक प्रस्तुतीकरण भर है-मेरी बेटी की ओढ़नीतार-तार की गई-सब खामोश रहे।मुझे विवश किया गयाअपना घर-द्वार छोड़करसंस्थापित से विस्थापितबनने के लिएकोई कुछ नहीं बोला।मैं अपने परिवार से साथन्याय की गुहार लगाते हुएवर्षों से दिल्ली के फुटपाथ पर हूंकिसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।कोई भी मानवाधिकारवादीकोई भी टीवी चैनलकोई भी राजनीतिक ध्वजधारीमेरे विषय में चर्चा नहीं करता,मेरा आत्र्तनाद नहीं बनताकिसी भी प्रगतिवादी साहित्यकार कीकथा का विषयमेरी त्रासभरी आंखें नहीं बनतींकिसी भी जनवादी पत्रिका का मुखपृष्ठमैं अपने प्रान्त से बहिष्कृतअपने परिवेश से तिरस्कृतअपने अवाञ्छित अस्तित्व के लिएहर कदम पे दण्डित हूंक्योंकि मैंएक कश्मीरी पण्डित हूं।शायद यह मेरे पूर्वजन्म के पापों काफलरूप परिताप हैक्योंकि कश्मीर में हिन्दू होनाआज एक विडम्बना है, अभिशाप है!इस परिप्रेक्ष्य में मुझे कभी पढ़ी एक कहानी की याद आ रही है जिसे संभवत: तस्लीमा नसरीन ने लिखा है। इस रचना में कथा नायिका बंगाली महिला अपने बच्चे के साथ पश्चिम बंगाल से बंगलादेश अपनी एक सहेली के यहां कुछ दिन रहने जाती है। अपनी पिछली यात्रा में सहेली उसे अपने घर आने का आमंत्रण दे गई थी। वहां उसकी दृष्टि आंगन में खेल रहे अपनी सहेली के बच्चों पर पड़ती है। यहां यह भी उल्लेख है कि अतिथि सहेली हिन्दू महिला है और आतिथेया बंगलादेश की एक संभ्रान्त मुस्लिम विदुषी। वे बच्चे एक अजीब-सा खेल खेल रहे हैं। आंगन से होकर चींटियों की एक कतार जा रही है। काले रंग की अधिकांश चींटियों के बीच में कुछ लाल रंग की चींटियां भी हैं। बच्चों में से एक लाल रंग की चींटियां संकेतित करता जाता है और दूसरा चुन-चुनकर उन्हें मारता जाता है। भारतीय महिला बच्चों से पूछती है कि तुम ये कैसा खेल खेल रहे हो? मासूम बच्चे उसे बताते हैं कि आंटी! हम हिन्दू चींटी मुस्लिम चींटी खेल रहे हैं। ये जो लाल-लाल चींटियां हैं ये हिन्दू चींटियां हैं, ये हमारी दुश्मन हैं, अत: इन्हें खत्म कर रहे हैं। इनके न रहने पर काली चींटियों की कतार पाक-साफ हो जाएगी, ये हमारी मुस्लिम चींटियां हैं। कहानी के इस वार्तालाप के दौरान आतिथेया सहेली घर से बाहर किसी काम से गई हुई है। बच्चों का यह उत्तर सुनकर अतिथि सहेली स्तब्ध रह जाती है और उल्टे पांव भारत लौट आती है। क्या आज कश्मीर घाटी में रह गए गिने-चुने हिन्दू तस्लीमा नसरीन की कहानी की लाल चींटियों की तरह नहीं हो गए हैं? चुन-चुन कर मारा जाना उनकी नियति है और इसके प्रतिकार पूरे देश में कहीं नहीं है।अमरीका में हिन्दू शिविरऐसे समय में जबकि भारतवर्ष के हिन्दीभाषी प्रदेशों में हर वर्ष अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे हैं और शैशव अवस्था से ही बच्चों को अंग्रेजी की छुट्टी पिलाई जा रही है, यह समाचार सुखद प्रतीत होता है कि अमरीका में प्रवासी भारतीयों की युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए हिन्दी सीखने को समुत्सुक है। उसके लिए हिन्दी शिविरों का आयोजन हो रहा है-जहां योग की कक्षाएं भी संचालित हो रही हैं, भाषा-ज्ञान की भी और अनुरंजन के साथ शिक्षा के लिए हिन्दी सिनेमा का सहारा लिया जा रहा है। दूसरी ओर यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे देश का नन्हा बच्चा जब तोतली बोली में कुछ कहने योग्य होता है तब उसे घर के सभी सदस्य अंग्रेजी की वर्णमाला तथा संज्ञाओं का अभ्यास कराने लग जाते हैं। कुत्ते को देखकर वह “डॉगी” कहना सीखता है और गाय उसके लिए अब “काउ” ही है। जहां परिवार और विद्यालय दोनों ही अंग्रेजी की आसक्ति में हैं, वहां विद्यालय में हिन्दी भी अंग्रेजी में अनूदित कर पढ़ाई जाती है। प्रवासी चाहे जड़ों से जुड़ रहे हों, मूल निवासी फिलहाल जड़े काटने में संलग्न हैं।18