| दिंनाक: 11 Feb 2008 00:00:00 |
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आतंतवाद से कतराता मीडियाशंकर शरणफासीवाद और साम्यवाद के बाद दुनिया के समक्ष सबसे बड़ा संकट इस्लामी आतंकवाद के रूप में उपस्थित हुआ है। किंतु इसकी विकटता यह है कि इसे सैन्य बल से हराना कठिन है। क्योंकि इसने जो चुनौती प्रस्तुत की है वह मूलत: सैनिक चुनौती नहीं है। यह सांस्कृतिक युद्ध है, जो मानवता के शरीर नहीं उसकी आत्मा पर प्रहार कर रहा है। इस्लामी आतंकवादियों के बमों, विस्फोटकों से भुलावे में नहीं आना चाहिए। वह तो रणनीति मात्र है। वे केवल मारने नहीं, बल्कि हमारे आत्मबल को नष्ट करने, हतोत्साहित करने, ब्लैकमेल करने, धमकाने का प्रयत्न कर रहे हैं।इस संकट में सबसे बुरी बात यह है कि इस्लामी आतंकवाद का शिकार विश्व इसे पहचानने से हिचकिचा रहा है। कुछ भ्रमवश, कुछ भयवश लोगों ने अपनी बुद्धि से सोचना बंद कर दिया है। उनका विवेक क्षीण हो गया है। इसीलिए फासीवाद, साम्यवाद आदि तानाशाहियों की आलोचना वे जिन आधारों पर करते थे, इस्लामी तानाशाही के संदर्भ में वे सभी आधार मानो त्याग दिए गए हैं। मनुष्य की स्वतंत्रता, विचार स्वातंत्र्य, धर्म और स्वविवेक की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति का अधिकार, शासकों का शासितों द्वारा निर्वाचित तथा उनके प्रति उत्तरदायी होना, मानवीय नैतिकता, विचार-मजहब-रंग-लिंग आदि से निरपेक्ष सभी मनुष्यों की समानता जैसे आधारभूत विचारों को कभी मुस्लिम संगठनों, नेताओं, तानाशाहियों, मांगों आदि की परीक्षा करने में लाया ही नहीं जाता। उलटे इस्लामी भावना के नाम पर जितने भी सड़े-गले, हजार वर्ष पुराने, क्रूर अंधविश्वास, रीतियां हैं उन्हें अपने विवेक को ताक पर रखकर सम्मान दिया जाता है। तब इस्लामी आतंकवाद से लड़ा ही कैसे जा सकेगा? आज उसका मूल्यांकन उसकी अपनी शर्तों, भंगिमाओं, इच्छाओं और विचारों को स्वीकार करके किया जा रहा है। यहां तक कि इस्लामी आतंकवादियों, संगठनों और उनके नेताओं की जो बातें गैर-मुस्लिम लोगों को सामान्य मानवीय बुद्धि से भयंकर और क्रूर लग सकती हैं उनकी चर्चा ही नहीं की जाती, ताकि उनकी वास्तविक छवि न दिखे। यह सब भारत, इंग्लैंड जैसे उदार लोकतंत्रों में हो रहा है। परिणामत: लोग इस विकट समस्या की पूरी तस्वीर ही नहीं देख पाते। यही कारण है कि इस्लामी आतंकवाद के संपूर्ण प्रसंग में उत्पीड़ित ही अपराधी लगता है और अपराधी उत्पीड़ित।यह पूर्ण विवेक-शून्यता की स्थिति है, जो मीडिया में प्रत्यक्ष व्यक्त हो रही है। अन्यथा क्या कारण है कि स्टूडेंट इस्लामी मूवमेंट आफ इंडिया (सिमी) जैसे दशकों पुराने संगठन के दस्तावेजों, मांगों, उसूलों, मान्यताओं पर कभी खुलकर विचार नहीं होता? अभी-अभी गुजरात और दिल्ली में आतंकी हमला करने से पहले सिमी ने 13-14 पृष्ठों का ई-मेल मीडिया संस्थानों को भेजा। उसे कहीं छापा, प्रसारित नहीं किया गया। क्यों? उसके बदले तरह-तरह की मनमानी बातें, टिप्पणियां और व्याख्याएं प्रस्तुत की जाती हैं। इससे अधिक उलटा और मूर्खतापूर्ण विमर्श क्या हो सकता है कि आतंकवादियों के अपने विचारों को छिपाकर उनके बारे में चर्चा की जाए। किंतु मीडिया में प्राय: यही हो रहा है। पूरी कोशिश की जाती है कि इस्लाम की छवि साफ-सुथरी रहे। इसीलिए आतंकवादियों के अपने दर्शन, दस्तावेज, कार्य-लक्ष्य आदि पर मौन रखा जाता है जो पूर्णत: इस्लाम पर आधारित हैं। यह कोई भटकाव, या किसी इक्के-दुक्के आतंकवादी नेता या संगठन का विचार भी नहीं है जिसे अटपटा मानकर उपेक्षित कर दिया जाए।सच यह है कि पिछले तीस वर्षों से विश्व में जितने भी इस्लामी आतंकवादी संगठन सक्रिय हुए और समाचार में आए हैं, सबमें एक वैचारिक समानता है। उदाहरण के लिए, “अरब राष्ट्रवादी आंदोलन, “हमास” और “इस्लामी जिहाद” जैसे संगठनों के संस्थापक, तथा फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन (पी.एल.ओ.) के सर्वोच्च नेता रहे जॉर्ज हबाश के शब्दों में उनके विचार, लक्ष्य और रणनीति का जायजा लीजिए-“फिलिस्तीनी समस्या कोई अलग समस्या नहीं है। यह समस्या अरब राष्ट्रवाद की सच्चाई से अलग नहीं है। फिलिस्तीनी अरब राष्ट्र का हिस्सा हैं। इसलिए पूरे अरब राष्ट्र को यूरोप और अमरीका के विरुद्ध युद्ध छेड़ना होगा। इसे पश्चिम के विरुद्ध युद्ध छेड़ना ही होगा। और यह छेड़ेगा। अमरीका और यूरोप नहीं जानते कि हम अरब अभी अपनी शुरुआत ही कर रहे हैं। अभी असली चीज होनी बाकी है। अब से पश्चिम के लिए कभी चैन नहीं रहेगा।…(हम बढ़ेंगे) कदम दर कदम। मिलीमीटर दर मिलीमीटर। साल दर साल। दशक दर दशक। पक्के इरादे, जिद और धीरज के साथ। यह हमारी रणनीति है। यही रणनीति हम पूरी दुनिया में फैलाएंगे।”यह एक वरिष्ठतम इस्लामी नेता के विचार हैं, जो इसी साल खुदा को प्यारे हुए। इसे हबाश ने 1972 में प्रसिद्ध पत्रकार ओरियाना फलासी को एक इंटरव्यू में कहा था। क्या हमारे देश के वरिष्ठतम पत्रकारों, राजनीति शास्त्र के प्रोफेसरों, टिप्पणीकारों और फिलीस्तीन के लिए आंसू बहाने और प्रदर्शन करने वाले वामपंथियों ने कभी इन विचारों को चर्चा के लिए सामने रखा है? कभी नहीं। इसके बदले केवल अमरीका, इस्राइल विरोधी नारेबाजी, या भावुकता भरी लफ्फाजी होती रही है। प्रश्न है-इस्लामी संगठनों के ऐसे स्पष्ट, निश्चित तथा आधिकारिक कार्यक्रमों को छिपाया क्यों जाता है? उसके बदले अपनी ओर से मनगढ़ंत या अधूरी बातें क्यों रखी जाती हैं?इतना ही नहीं। इस छत्तीस वर्ष पहले कही गई बात की तुलना आज सिमी, लश्करे तोयबा, दीनदार अंजुमन या अलकायदा की घोषणाओं, विचारों से करें। पता चलेगा कि उनमें कोई मूलभूत अंतर नहीं है। वही लक्ष्य, वही तरीके। पूरी दुनिया पर इस्लाम का झंडा गाड़ने, काफिरों को मिटाने या इस्लाम में मतांतरित करने, शरीयत से संपूर्ण विश्व को चलाने का मजहबी ख्याल ही सबको परिचालित कर रहा है। इस ख्याल का इस बात से कोई संबंध नहीं है कि अमरीका या उक्रेन की क्या नीतियां हैं अथवा जापान या दक्षिण अफ्रीका के लोगों ने अरब या अफगानिस्तान के साथ कभी कोई बुरा बर्ताव किया भी या नहीं। उन संगठनों के लंबे-लंबे दस्तावेज, प्रचार और ट्रेनिंग की किताबें, पोस्टर, सब कुछ वही गवाही देते हैं। फिर भी, ठीक जो समुदाय, देश इस्लामी संगठनों के निशाने पर हैं, उसी के शिक्षित, संपन्न पत्रकार बुद्धिजीवी इन बातों को छिपाते हैं। छिपाते ही नहीं, उसके बदले ऐसे झूठे या आधे-अधूरे तथ्य बताते हैं जिससे वे संगठन दोषी या मुख्य दोषी न दिखें। यही नहीं, उन अंतरराष्ट्रीय या देशी जिहादी संगठनों के स्थान पर कुछ दूसरे गैर-मुस्लिम संगठनों, नेताओं या देशों को अधिक से अधिक दोषी ठहराने के लिए हर झूठ-सच का प्रयोग करते हैं। जैसे, अभी सिमी को बचाने के लिए बजरंग दल या विश्व हिन्दू परिषद् पर प्रहार किया जा रहा है।यही आत्महंता प्रवृत्ति दर्शन और विचारधारा में भी दिखाई पड़ती है। इस्लाम में गढ़-गढ़कर अच्छी, मनोहर बातें दिखाई जाती हैं। उसकी किसी भी कुरीति पर या तो अभेद्य मौन या लीपा-पोती की जाती है। जबकि हिन्दू समाज में खोज-खोज कर किसी भी हाल के दुर्गुण या अपवाद प्रसंग को भी हिन्दू धर्म की विशेषता बताकर कीचड़ उछाला जाता है। वामपंथियों की जिद यहां तक है कि सभी धर्मों को समान बताना भी उन्हें गवारा नहीं। उदाहरण के लिए, प्रफुल्ल बिदवई नामक वामपंथी प्रचारक इसे इस्लाम की तौहीन मानते हैं। उनके अनुसार इस्लाम श्रेष्ठ है। अत: इसे हिन्दू धर्म के समान बताना अनुचित है।बिदवई महोदय अकेले नहीं। अभी करन थापर ने कहा कि यदि ईसाई मिशनरी हिन्दुओं का मतान्तरण कराते हैं तो इसमें चिंता की क्या बात। प्रसंग, अभिव्यक्तियां अलग-अलग हो सकती हैं, किंतु बड़े-बड़े अंग्रेजी अखबारों और टीवी चैनलों पर यही प्रवृत्ति प्रमुख है। हिन्दू चिंता की उपेक्षा या खिल्ली उड़ाना, तथा इस्लामी, ईसाई मिशनरी मांगों, दावों के सुर में सुर मिलाना। यह गंभीर स्थिति है, क्योंकि ऐसा करने वाले अधिकांश हिन्दू परिवारों में जन्मे पत्रकार, बुद्धिजीवी, प्रोफेसर हैं। व्यक्तिगत रूप से उनमें असंख्य ऐसे हैं जिन्हें हिन्दू भाव से द्वेष या पूर्ण उपेक्षा है। वे अकारण भी हिन्दू संगठनों को पसंद नहीं करते। जबकि अन्य हर तरह के संगठनों के प्रति सहज भाव रखते हैं-अकारण भी। इस्लामी उग्रपंथियों, गैर कानूनी तरीके से मतान्तरण कराने वाले मिशनरियों, हत्या और देशद्रोह की राजनीति में लगे माओवादियों, विदेशी प्रभुओं की सेवा में लगे चित्र-विचित्र एन.जी.ओ.आदि तक के प्रति वे सामान्य भाव रखते हैं। किंतु हिन्दू चेतना के संगठनों से उन्हें परेशानी होने लगती है। उदाहरण के लिए पी.एल.ओ.के लिए उनमें सहानुभूति मिलेगी। पर संभावना है कि वे स्वामी शिवानंद आश्रम या श्री अरविंद आश्रम के प्रति कोई फूहड़ टिप्पणी कर दें। ऐसा क्यों? यह एक पूरा पैटर्न है। इसीलिए अत्यंत घातक है। क्योंकि हम इस्लामी आतंकवादियों, शत्रु सेनाओं, घुसपैठियों और तरह-तरह के प्रपंच करते ईसाई मिशनरियों को तो आज नहीं कल पहचान लेते हैं कि वे हमारे हितू नहीं हैं। किंतु इन हिन्दू नामधारी हिन्दू-घातियों जैसे बिदवइयों, थापरों, सरदेसाइयों, संघवियों, दत्तों, रायों, गुप्ताओं, मेहताओं, यचूरियों, शर्माओं आदि के प्रति अचेत रहते हैं। उलटे, उन्हें बड़े पत्रकार या बुद्धिजीवी मानकर आदर देते हैं। यहां तक कि उनकी बातें दुहरा भी देते हैं। चाहे वह पूरी तरह हमारे अपने विरुद्ध क्यों न हों। क्या हरेक पुलिस मुठभेड़-जिसमें इस्लामी आतंकवादी या नक्सलवादी मारा गया है-को फर्जी नहीं बताया जाता? पिछले अनेक वर्षों में क्या ऐसी कोई भी मुठभेड़ हुई है जिसे फर्जी नहीं बताया गया, यदि उसमें कोई उस्मान, इशरत या राशिद मरा हो? यह आत्महंता वैचारिकता नहीं तो और क्या है।आतंकवाद के विरुद्ध टाडा या पोटा कानून का विरोध करने अनेक पत्रकार, बुद्धिजीवी और नेता सामने आए। किसी इस्लामी आतंकवादी की मुठभेड़ में मौत पर कितने ही मानवाधिकारवादी, समाजवादी और समाजसेवी चिंतित हो उठते हैं कि “कानून से बाहर जाकर” किसी को परेशान नहीं किया जा सकता। आतंकवादी के भी मानवाधिकार हैं। किंतु “आर.एस.एस.की विचारधारा” से जुड़े होने के नाम पर राज्यपालों, विद्वानों, अफसरों तक को हटाने, अपमानित करने पर कोई आवाज नहीं उठी। स्पष्टत: वही मानवाधिकारवादी इस कदम को अनुचित नहीं मानते, चाहे यह कानून से बिल्कुल बाहर जाकर भी क्यों न हो। आर.एस.एस.कोई अवैध संगठन नहीं। किसी न्यायालय ने आज तक इसके विरुद्ध कोई टिप्पणी तक नहीं की है। फिर भी इससे जुड़े लोगों, यहां तक कि केवल सहानुभूति रखने वालों को भी मनमाने चाहे जब जलील किया जा सकता है। हिन्दू परिवारों में जन्मे अनेक लेखकों, पत्रकारों, प्रोफेसरों और उनके अनुयायियों में ऐसी विचित्र प्रवृत्ति क्यों है?उनमें हिन्दुत्व के प्रति यह दुराव, उपेक्षा और हीनता का भाव आखिर क्या दर्शाता है? स्पष्ट ही यह सेकुलरिज्म या निष्पक्षता नहीं है, अन्यथा भगवान राम के साथ कभी प्रोफेट मुहम्मद की भी खिल्ली उड़ते देखा जाता। यह पूर्णत: अज्ञान भी नहीं, क्योंकि इस्लामी आतंकवाद पिछले दस-पंद्रह वर्ष से दुनिया में सरगर्म विषय है। असंख्य तथ्य-प्रमाण रोज सामने आते हैं, फिर भी हमारे बुद्धिजीवी इसके प्रति संकोचग्रस्त रहते हैं। यहां इस्लामी आतंकवाद विषय पर लिखी कोई पुस्तक तो क्या किसी पत्र-पत्रिका का विशेषांक तक ढूंढना मुश्किल है। इस आतंकवाद से दुनिया में सबसे अधिक पीड़ित देशों में भारत है। फिर भी यहां इस्लामी आतंकवाद जैसी संज्ञा पर भी विद्वानों, अधिकारियों द्वारा आपत्ति की जाती है। इसके उलट “हिन्दू फासीवाद” नामक मनगढ़ंत विषय पर लाखों पन्ने काले किए मिलेंगे। अकेले जनसत्ता या एन.डी.टी.वी.के ही कतरन या प्रसारण एकत्र करें तो रखने की जगह नहीं बचेगी। तो यह विचित्र दोहरापन क्या है?निश्चय ही इसके पीछे भय भी है। यह कोई छिपी बात नहीं कि इस्लामी संगठनों, नेताओं, प्रवक्ताओं के पास धमकी और हिंसा के सिवा कोई तर्क नहीं है। न कभी रहा है। मंसूर से लेकर तसलीमा नसरीन और डैनियल पर्ल तक हरेक चिंतक, लेखक, पत्रकार के विरुद्ध पहला और अंतिम तर्क हत्या या हत्या का प्रयास ही रहता है। अत: भय एक कारण है। इसी से जुड़ी है “जिम्मी” (क़्ण्त्थ्र्थ्र्त्) मानसिकता। जिससे वे हिन्दू परिवारों में जन्मे बुद्धिजीवी ग्रस्त हैं, जिनकी ऊपर चर्चा है। नेहरूवाद, गांधीवाद और सेकुलरवाद इन सभी विचारों में जिम्मी मानसिकता समान रूप से व्याप्त है। इसीलिए हमारा विश्वविद्यालयी शिक्षा जगत भी इस रोग से ग्रस्त है। जिम्मा एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ है करार। वह करार जो सदियों पहले इस्लाम द्वारा अपने राज्य में कुछ गैर-मुस्लिम लोगों को भी बर्दाश्त करने, उन्हें जिंदा रहने देने की शर्त के रूप में एकतरफा तय किया गया था। खलीफा उमर के शासनकाल (लगभग सन् 634) में जिम्मियों संबंधी बारह नियम सूत्रबद्ध हुए थे। इसकी मूल बात यह है कि जिम्मी, यानी गैर-मुस्लिम लोग इस्लाम और मुसलमानों को सर्वोपरि मानते हुए, उन्हें जजिया कर और दूसरे नजराने देते हुए, सदैव हीन लोगों की तरह रहेंगे। इस प्रकार इस्लामी अधीनता में लंबे समय तक रहते गैर-मुस्लिमों में जो हीन भाव आ जाता है, उसे ही जिम्मी मानसिकता की संज्ञा दी गई है। इस मानसिकता की विशेषता यह है कि इस्लामी शासन से मुक्त हो जाने पर भी जिम्मियों के विचार-व्यवहार में इस्लाम के प्रति विशेष आदर भाव आदतन बना रहता है।इसी मानसिकता के रूप में हमारे बुद्धिजीवियों का दोहरा व्यवहार समझा जा सकता है। इसी मानसिकता का प्रतिरूप मुस्लिम प्रवक्ताओं में भी है, जिसके अनुसार वे अपने लिए हर चीज कुछ अधिक, कुछ ऊपर चाहते हैं। ऐसे विशेषाधिकार चाहते हैं, जो दूसरों को न हों। जैसे, वे “काफिरों, मूर्तिपूजकों” की हर सांस में निंदा करेंगे, क्योंकि यह उनका मजहबी विश्वास है। किंतु गैर मुस्लिम लोगों का विश्वास कुछ हो, वे इस्लामी रीतियों जैसे बहुपत्नी प्रथा, गुलामी प्रथा या “तीन तलाक” की आलोचना तो क्या, उपेक्षा तक नहीं कर सकते। ऐसा होते ही वे धमकियां देने लगते हैं। अखबारों में आए दिन ऐसी धमकियां पढ़ने को मिलती हैं। इस्लामी विशेषाधिकार की ऐसी अनुचित मांगों को “भावना” के नाम पर स्वीकार किया जाता है। कुछ ऐसे मानो इस्लामी भावनाएं अन्य मनुष्यों की भावनाओं, देश के संविधान, नागरिक कानून या सामान्य मानवीय न्याय बुद्धि और विवेक से ऊंची चीज हों। अत: जिम्मी भाव गैर मुसलमानों में अपने विचारों, भावनाओं की कीमत पर भी इस्लाम की वरिष्ठता की स्वैच्छिक स्वीकृति है। इसमें डर का भाव भी समाहित रहता है।यह जिम्मी मानसिकता हमारे मीडिया में सर्वत्र व्याप्त है। विशेषकर अंग्रेजी मीडिया में हिन्दू-द्वेष इतना व्यापक है कि वह देश के दुश्मन के रूप में व्यवहार करने लगता है। वह अपना सेकुलर होना, अर्थात् अ-हिंदू होना, प्रमाणित करने के लिए हर उस चीज, घटना का बचाव करने के लिए उद्धत रहता है जिसमें इस्लामी या ईसाई मिशनरी संगठन दोषी दिख रहे हों। यह केवल भारत के संदर्भ में नहीं, जहां मुस्लिम या ईसाई समुदाय कथित रूप से अल्पसंख्यक हैं। इंडोनेशिया, ईरान या पाकिस्तान का भी प्रसंग हो-तब भी हमारे ऐसे पत्रकार और बुद्धिजीवी इस्लामपरस्ती ही दिखाते हैं। उन्हें इन देशों में भी “अल्पसंख्यक” हिन्दुओं, बौद्धों की चिंता नहीं रहती। वहां भी ये इस्लामी कानूनों, रीतियों और खुमैनियों का ही बचाव करते हैं।उनके लिए पत्रकारिता या शिक्षा यथातथ्य समाचार देना या सत्य पढ़ाना नहीं, बल्कि सबको हिन्दुत्व के विरुद्ध प्रेरित करना है। एक मिशन जिसमें खासकर अंग्रेजी मीडिया या प्रभावशाली हिस्सा दिन रात सक्रिय है। एक बड़े अंग्रेजी पत्र में एक खबर का शीर्षक था “सरकार ने माना कि वह संदेहास्पद मदरसों की निगरानी कर रही है।” ऐसे शीर्षक देने में रिपोर्टर/संपादक का क्या आग्रह है? यही कि संदेहास्पद मदरसों की भी निगरानी नहीं होनी चाहिए। यदि सरकार यह कर रही है तो एक तरह का अनुचित काम, जिसे मानकर उसने आखिर अपना “अपराध” स्वीकार किया। खबरों में इस तरह का झुकाव देने की जिद में कभी-कभी खबर से लंबा उसका शीर्षक हो जाता है। मगर मजबूरी, खबर के साथ-साथ इस्लाम परस्त या हिन्दू विरोधी दीक्षा भी देनी है। पाठक का विचार परिवर्तन किया जाना है।अत: हर कांड के बाद उनकी कलम और कैमरों का रुख उत्पीड़ित या उत्पीड़क का धर्म, जाति आदि देखकर तय होता है। कश्मीरी पंडितों के सफाए अथवा गोधरा कांड के अपराधियों के बारे में अंग्रेजी मीडिया आज भी साफ नहीं बोलता, क्योंकि पीड़ित हिन्दू थे। लेकिन यदि पीड़ित गैर-हिन्दू हुआ, तो उसके अपराधियों की पहचान (बिना किसी प्रमाण के भी) तत्क्षण हो जाती है। उसी तरह नक्सलवादी हमलों में चाहे सैकड़ों लोग मारे जाएं, मृतकों के परिजनों की पीड़ा पर न कैमरे घूमते हैं, न कलम चलती है। न नक्सलियों को घृणित अपराधियों के रूप में दिखाया जाता है। क्योंकि हिन्दुत्व विरोधी राजनीतिक अभियान में इसकी कोई उपयोगिता नहीं। मीडिया में इस अभियान का आग्रह इतना है कि जो पत्र, पत्रिका या लेखक, पत्रकार हिन्दुत्व विरोधी मिशन में शरीक न हो उसे भी लांछित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। चाहे वह निष्पक्ष हो, उसे “भाजपा की गोद में बैठ गया” बताया जाता है। मीडिया में औपचारिक और अनौपचारिक टीका-टिप्पणियों को देखकर यह विचित्र निष्कर्ष निकलेगा कि विचारों में हिन्दू विरोध सबसे बड़ा मूल्य है और निष्पक्ष प्रस्तुति भी हिन्दू सांप्रदायिकता या “संघी पक्षधरता” है।इस प्रवृत्ति ने कितनी गहरी जड़ जमा ली है, यह कुछ समय पहले की एक घटना से समझें। फिल्म निर्देशक राजा बुंदेला ने अपनी फिल्म “प्रथा” को प्रचार दिलाने के लिए उसके विरुद्ध बजरंग दल के हमले का एक नाटक रचा। जब उसकी कलई खुल गई, तो मीडिया में खबर गुम हो गई। अन्यथा इस बहाने मीडिया में लंबे समय तक संघ परिवार के “फासिज्म” की निंदा चलती। वाजपेयी सरकार बनने के बाद से अनेक खबरों-गुजरात में ईसाई-हिन्दू झगड़े, म.प्र.में ननों के साथ बलात्कार, उड़ीसा में ग्राहम स्टेंस की हत्या, कर्नाटक, गोवा, आंध्र प्रदेश के गिरजों में बम-विस्फोट आदि-जिन्हें आनन-फानन हिन्दुत्ववादियों के मत्थे डाला गया। बाद में हर मामले में सच दूसरा निकला। फिर भी हिन्दू संगठनों को निंदित करने की प्रवृत्ति नहीं बदलती। आज बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की मांग हो रही है, पर उसके विरुद्ध किसी ठोस घटना, मुकदमे या मामूली आपराधिक प्रसंग का भी उदाहरण नहीं दिया जाता। क्योंकि उसने कुछ किया हो तो उदाहरण याद रहे। जबकि सिमी के आतंकवादी कारनामों की पुलिस और अदालतों में ही नहीं, स्वयं मीडिया में मोटी-मोटी फाइलें इकट्ठा हो चुकी हैं। फिर भी, जिद है कि इसे प्रतिबंधित न करें। यदि करें भी तो बजरंग दल और आर.एस.एस. को भी साथ ही कर दें। राजा बुंदेला ने मीडिया के इसी दुराग्रह का लाभ उठाने की कोशिश की थी। इस दुराग्रह का पाकिस्तानी आई.एस.आई.भी जमकर इस्तेमाल करती रही है। दक्षिण भारत के गिरजों में विस्फोट उसी ने (दीनदार अंजुमन द्वारा) करवाए थे, जबकि आरोप हिन्दुत्ववादियों पर मढ़ा गया।मीडिया में इस दुराग्रह को किसी और तरह नहीं समझा जा सकता, सिवा इसके कि हिन्दू संगठनों को नीचा दिखाने के सब तरीके जायज हैं। हमारे उग्र-सेकुलर पत्रकार स्वयं जानते हैं कि उनके काम में पत्रकारिता कम हिन्दुत्व-विरोधी मिशन अधिक है। इस धुन में वे अपना देश, धर्म सब भूल गए हैं। मीडिया और अकादमिक संस्थानों में छाई इस हिन्दू विरोधी प्रवृत्ति ने स्वतंत्र भारत को सबसे अधिक हानि पहुंचाई है। इस बात को समझे बिना हम इस्लामी आतंकवाद, नक्सलवाद ही नहीं भ्रष्टाचार और नैतिक-शैक्षिक पतन जैसी समस्याओं का भी सूत्र नहीं पकड़ सकते।8