| दिंनाक: 07 Aug 2007 00:00:00 |
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हमने कभी आरक्षण देने की बात नहीं कही थी!!यह केन्द्र का विषय, हमें सिर्फ प्रस्ताव भेजना था, पर उन्होंने धैर्य खो दियागुलाब चंद कटारिया को राजस्थान की राजनीति में “भला मानुस” माना जाता है। मेवाड़ के यह भाजपा नेता अपनी सादगी से सबका मन मोहते हैं। राजस्थान सरकार में जब उनको गृहमंत्री बनाया गया तो कहा जाने लगा कि इतना जटिल विभाग वे कैसे संभालेंगे? शुरूआती दौर में जरूर उनको इस विभाग में काफी संघर्ष करना पड़ा, लेकिन अब आम पुलिसकर्मी भी यह मानता है कि इनके रहते पुलिस को स्वतंत्रता से काम करने का अवसर मिला है तथा उसका राजनीतिक दुरुपयोग रुका है। प्रस्तुत हैं गुर्जर आंदोलन के संदर्भ में उनसे सुरेन्द्र चतुर्वेदी की बातचीत के मुख्य अंश-राजस्थान में पिछले दिनों हुए आरक्षण आंदोलन पर आपका क्या कहना है?दरअसल, पिछले काफी समय से गुर्जर समुदाय के लोग अपने आपको अनुसूचित जनजाति में शामिल कराने के लिए आंदोलन कर रहे थे। सरकार उनसे बातचीत भी कर रही थी। हम लोगों ने एक मंत्रिमंडलीय उपसमिति का गठन किया था। हम लोग चार बार गुर्जर महासभा के साथ बैठे भी थे तथा सारे राज्य से जिलाधिकारियों के माध्यम से तथ्य भी एकत्रित किए गए थे। हम लोग 31 मई को फिर से बैठने वाले थे और हमने गुर्जर महासभा के प्रतिनिधियों को कहा था कि “हमारे पास हर जिले से जिलाधिकारी की रपट आ रही है, आप भी हर जिले से अपने प्रतिनिधियों को बुला लें। उससे आपके दावे व सरकार के पास आई जिलाधिकारी की रपट पर साथ बैठकर बात कर लेंगे।” लेकिन 29 मई को ही उन्होंने रास्ता रोका और उसके बाद जिस तरह से माहौल हिंसक हो गया, उससे सारी मेहनत बेकार हो गई।क्या उन गुर्जर प्रतिनिधियों के साथ बैठक में कर्नल (से.नि.) किरोड़ी सिंह बैंसला भी आते थे?हां, आते थे, लेकिन वे अंतिम बैठक में नहीं आए।क्यों?इसका तो नहीं पता। यह भी हो सकता है कि उन्होंने 29 मई को राष्ट्रीय राजमार्ग रोकने का आह्वान किया हुआ था, इसी कारण नहीं आए हों।क्या इसे राजस्थान में जातीय संघर्ष की शुरुआत माना जाए?शुरू में तो नहीं, लेकिन जिस तरह गुर्जरों द्वारा रास्ता रोकने के बाद मीणा समुदाय सड़कों पर निकला, उससे ऐसा लगता है कि जातीय विद्वेष के बीज इन समाजों में पड़ गए हैं।इस विद्वेष को समाप्त करने का मार्ग क्या है?लोकतंत्र में किसी भी मांग को मनवाने का तरीका हिंसक नहीं हो सकता। मैं यह भी मानता हूं कि लोकतंत्र में सभी को अपनी बात के लिए आंदोलन करने, अपनी ताकत दिखाने का संवैधानिक अधिकार है। आंदोलनों का हिंसक हो जाना या हिंसा के जरिए अपनी बात मनवाने की मंशा लोकतंत्र में संभव नहीं हो सकती। जब इन लोगों ने अपना आंदोलन वापस लिया, उसके लिए भी इन गुर्जर नेताओं को बातचीत का रास्ता अपनाना पड़ा। यही सही रास्ता है। लोकतंत्र में हर समस्या का हल आपसी बातचीत से ही होता है।लेकिन इन आंदोलनकारियों का कहना है कि भाजपा ने ही चुनाव से पूर्व गुर्जरों को अनुसूचित जनजाति में शामिल कराने का दावा किया था?यह गलत है। भाजपा के चुनाव अभियान में कभी भी, किसी भी मंच से यह बात नहीं कही गई। भाजपा शुरूआत से ही वर्गों के आधार पर आरक्षण देने के पक्ष में नहीं है। भाजपा की सोच है कि आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिए। यदि भाजपा यह वायदा करती तो घोषणा पत्र में जरूर इसकी चर्चा होती, घोषणा पत्र तो सभी देख सकते हैं, उसमें भी गुर्जरों को आरक्षण दिलवाने की बात नहीं है।कहा जा रहा है कि आपने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया?यह आरोप बेबुनियाद है। हमने गुर्जर प्रतिनिधियों को 31 मई को बुलाया भी था। हमने कहा था कि गुर्जरों को अनुसूचित जनजाति में शामिल कराने का विषय केन्द्र सरकार का है, राज्य सरकार इस मामले में सभी से चर्चा करके केन्द्र सरकार को पत्र भेज सकती है। इसकी एक निश्चित प्रक्रिया है, जिसमें समय लगता है। लेकिन वे लोग इंतजार नहीं कर सके।आरोप है कि आंदोलन से निपटने के लिए आपकी तैयारी पूरी नहीं थी।पूरे देश में कहीं पर भी ऐसा उदाहरण नहीं है, जब बिगड़ती स्थिति से निपटने के लिए तुरंत सेना की 32 इकाइयां बुलाई गई हों। इसके अलावा हमने मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश से भी सुरक्षा बल बुलाए थे। इतने बड़े आंदोलन में 24 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, यह दु:ख की बात है। लेकिन जिस तरह से यह आंदोलन संचालित किया जा रहा था, यदि हम धैर्य खो चुके होते तो मरने वालों की संख्या इससे कई गुना ज्यादा भी हो सकती थी। जहां तक सरकारी सम्पत्ति को नुकसान की बात है तो मैं व्यक्तिगत तौर पर मानता हूं कि जान की कीमत पर सरकारी सम्पत्ति की रक्षा न्यायोचित नहीं होती। सम्पत्ति तो फिर बन सकती है, लेकिन बिछुड़ा हुआ आदमी वापस नहीं आ सकता।लेकिन राजस्थान सरकार द्वारा आंदोलनकारियों पर बल प्रयोग को लेकर तरह-तरह की बातें की जा रही हैं।जब सारे रास्त बंद हो जाते हैं, उसके बाद बल प्रयोग की आवश्यकता पड़ती है। मेरा मानना है कि बड़े नुकसान से बचने के लिए छोटा नुकसान सहना पड़ता है। गुर्जर आंदोलन में भी गोली तब चलाई गई जब आंदोलनकारियों ने पुलिसकर्मियों के हाथ पांव काटने शुरू कर दिए।आप रा.स्व.संघ की पृष्ठभूमि के हैं। पिछला वर्ष संघ ने सामाजिक समरसता वर्ष के रूप में मनाया। क्या यह घटना समरसता को तोड़ने वाली नहीं है?नहीं, लोगों का यह अधिकार है कि वे अपने समाज की भलाई के लिए, अपने जीवन की उत्कृष्टता के लिए, जो कुछ बन पड़े, करें। लेकिन वह होना इस तरह चाहिए कि शेष समाज भी उनकी बातों से सहमत हो। हिंसा के रास्ते से कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। जब भी छोटे स्वार्थ हावी होते हैं, इस तरह का वातावरण बन ही जाता है। लेकिन यह भी तय है कि जब भी देश की बात आएगी यह समाज एकजुट दिखाई देगा।24