| दिंनाक: 04 Aug 2007 00:00:00 |
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अंक-सन्दर्भ, 11 मार्च, 2007पञ्चांगसंवत् 2064 वि. – वार ई. सन् 2007वैशाख कृष्ण 5 रवि 8 अप्रैल, 07″” 6 सोम 9 “””” 7 मंगल 10 “””” 8 बुध 11 “”(नवमी तिथि का क्षय)”” 10 गुरु 12 “””” 11 शुक्र 13 “””” 12 शनि 14 “”(वैशाखी)उतर रहा है जादू “मैडम” काआवरण कथा “पंजाब और उत्तराखण्ड में फहरा केसरिया” से प्रतीत होता है कि एक बार पुन: देश की जनता भाजपा की ओर आशाभरी निगाह से देखने लगी है। भाजपा के लिए यह एक अच्छा अवसर है। इसलिए जहां वह सरकार चला रही है वहां यह स्पष्ट दिखना चाहिए कि भाजपा जो कहती है वह करती है। जहां भाजपा विपक्ष में है जनहित के मुद्दों को बढ़-चढ़कर उठाए। आपस में मनमुटाव जैसी कोई बात न हो तभी लोग भाजपा को पुन: अच्छी तरह स्वीकार कर पाएंगे।-सृष्टिधरहालगेट, अमृतसर (पंजाब)उतर रहा है जादू “मैडम” काआवरण कथा “पंजाब और उत्तराखण्ड में फहरा केसरिया” से प्रतीत होता है कि एक बार पुन: देश की जनता भाजपा की ओर आशाभरी निगाह से देखने लगी है। भाजपा के लिए यह एक अच्छा अवसर है। इसलिए जहां वह सरकार चला रही है वहां यह स्पष्ट दिखना चाहिए कि भाजपा जो कहती है वह करती है। जहां भाजपा विपक्ष में है जनहित के मुद्दों को बढ़-चढ़कर उठाए। आपस में मनमुटाव जैसी कोई बात न हो तभी लोग भाजपा को पुन: अच्छी तरह स्वीकार कर पाएंगे।-सृष्टिधरहालगेट, अमृतसर (पंजाब)पंजाब और उत्तराखण्ड में कांग्रेस की हार से यह सिद्ध हो गया कि चुनावों में अब जाति, मजहब की बात नहीं चलती, बल्कि लोग विकास को ज्यादा महत्व देने लगे हैं। इसलिए जो सरकार जितना अधिक विकास कार्य करेगी उसे जनता जरूर सर माथे पर लगाएगी, नहीं तो चुनाव में जड़-मूल सहित उखाड़कर फेंक देगी।-विपिन19, भूतनाथ रोड, कंकड़बाग, पटना (बिहार)मुखपृष्ठ पर छपे शीर्षक पर हमारी आपत्ति है। उत्तराखण्ड व पंजाब में भाजपा की जीत को “फहरा केसरिया” लिखा गया है। यह गलत है, क्योंकि भाजपा के ध्वज में डंडे से जुड़े पूरे भाग का रंग हरा है। इसके बाद आगे हरे का दोगुना केसरिया भाग जुड़ा है। इसे केसरिया की जीत नहीं कहा जा सकता। पंजाब में भाजपा ने 117 स्थानों में 19 और उत्तराखण्ड में 70 में से 34 स्थानों पर जीत दर्ज की है। इसे आप अच्छा प्रर्शन भले मानें, हमारे गले नहीं उतरता।-डा. नारायण भास्कर50, अरुणानगर, एटा (उ.प्र.)उत्तराखंड तथा पंजाब विधानसभा चुनावों में हुई कांग्रेस की पराजय साबित करती है कि लोगों से “मैडम” का जादू उतर रहा है। लोकतंत्र में जनता को कुछ समय के लिए तो बेवकूफ बनाया जा सकता है हमेशा के लिए। गांधी-नेहरू के विरासत को अपने हक में भुनाकर तथा “आम आदमी के साथ कांग्रेस का हाथ” के हवाई नारों के सहारे सत्ता में पहुंची कांग्रेस को अब अपनी जमीन तलाशनी मुश्किल हो जायेगी। आगामी उ.प्र. विधानसभा चुनाव में यह भी साबित हो जायेगा कि सिर्फ सोनिया का नहीं वरन राजदुलारे “राहुल” और प्रियंका का जादू भी क्षेत्र विशेष तक ही सीमित है। एक विदेशी के हाथों स्थापित कांग्रेस एक “विदेशी” के हाथों ही समाप्त हो जाए तो आश्चर्य नहीं।-अभिजीत “प्रिंस”इंद्रप्रस्थ, मझौलिया, मुजफ्फरपुर (बिहार)ताबूत की अन्तिम कीलसम्पादकीय “एक निष्प्राण, अभारतीय बजट” पढ़कर ताजगी भरा अहसास हुआ। इसमें श्रीमती सुषमा स्वराज ने केन्द्रीय बजट का विश्लेषण करते हुए कहा है, “वित्त मंत्री श्री पी. चिदम्बरम ने एक ऐसा बजट प्रस्तुत किया है जिसमें न कोई दिशा है, न कोई सोच, केवल रस्म अदा करने के लिए कुछ बातें प्रस्तुत कर दी हैं। इस बजट में न कोई आभा है, न ही कोई आत्मा। इसे पूरी तरह से निष्प्राण बजट कहा जाना चाहिए।” इन चन्द पंक्तियों में ही उन्होंने केन्द्रीय बजट के खोखलेपन को पूरी तरह उजागर कर दिया है। वास्तव में यह बजट बेरोजगारी और महंगाई को और बढ़ाने में सहायक होगा। बजट वाले दिन ही संवेदी सूचकांक का अभूतपूर्व 541 अंक नीचे लुढ़क जाना यही प्रमाणित करता है। पंजाब और उत्तराखंड की पराजय के बाद यह निष्क्रिय बजट संप्रग के ताबूत में अंतिम कील साबित हो सकता है।-रमेश चन्द्र गुप्तानेहरू नगर, गाजियाबाद (उ.प्र.)वंशवादी प्रवृत्तियांमंथन स्तम्भ के अन्तर्गत श्री देवेन्द्र स्वरूप का लेख “वंश बड़ा या देश” पढ़ा। कहा जाता है कि आज कांग्रेस पार्टी में सोनिया गांधी के अलावा और कोई नेता नहीं है जो कांग्रेस की नैया पार लगा सके। जबकि सत्य इसके विपरीत है, सोनिया की छवि केवल अमेठी और रायबरेली तक ही सिमट गई है। ऐसा न होता तो पंजाब, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव और मुम्बई महानगरपालिका आदि के चुनाव कांग्रेस नहीं हारती। ऐसा इसलिए देखने को मिल रहा है क्योंकि पार्टी में वंशवाद चरम पर है। वंशवाद की छाया तले देश की समस्याएं गौण हो गई हैं। वंशवादी प्रवृत्तियां भारतीय लोकतंत्र को खोखला कर रही हैं, पार्टी में चापलूसों की कतार लग गई है। भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान पर हावी वंशवादी मानसिकता देश को तबाही के रास्ते पर ले जा रही है। वह दिन दूर नहीं जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नाम सोनिया कांग्रेस या राहुल कांग्रेस हो जायेगा। कांग्रेस से गांधी जी का नामोनिशान तो मिट ही गया है।-दिलीप शर्मा114/2205 एम.एच.वी. कालोनी, समतानगर कांदीवली (पूर्व), मुम्बई (महाराष्ट्र)अंग्रेजी मानसिकता वाले “ब्राह्मण”सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के दीक्षांत समारोह में राज्यपाल टी.वी. राजेश्वर द्वारा संस्कृत भाषा का विरोध किया जाना अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण है। वैसे भी शिष्टाचार का नियम है कि मेजबान के घर पर उसी की बुराई नहीं की जाती। राज्यपाल महोदय निश्चय ही मैकाले शिक्षा वृत्ति से ग्रस्त हैं जिसके अंतर्गत अंग्रेज भारत में शिक्षा गुलामी छोड़ गये। जहां आज जर्मनी जैसे संपन्न राष्ट्र एवं संपूर्ण विश्व में संस्कृत भाषा की महत्ता स्वीकारी जा रही है तो दूसरी ओर अपने ही देश के अंग्रेजी मानसिकता वाले “ब्राह्मण” न केवल संस्कृत का विरोध कर रहे हैं, अपितु भारत और भारतीय संस्कृति का भी अपमान कर रहे हैं।-रतन प्रकाशमुरादाबाद (उ.प्र.)यह उचित नहींयह चिन्ता की बात है कि तमाम सरकारी प्रयासों को ठेंगा दिखाते हुए पूरे देश में अभी भी बाल-विवाह बदस्तूर जारी है। स्वास्थ्य मंत्रालय एवं मुंबई स्थित “इन्टरनेशनल इंस्टीटूट फार पापुलेशन साइंसेज” की ओर से हाल ही में कराये गये बाल स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रपट के अनुसार बिहार में 52 एवं उ.प्र. में 41 प्रतिशत बच्चे खेलने-पढ़ने की उƒा में ही विवाह की बेड़ियों में जकड़ दिए जाते हैं। राजस्थान में 49 प्रतिशत बाल-विवाह होते हैं। बाल-विवाह को रोकने के लिए बने कानून जमीनी स्तर पर अपना असर नहीं दिखा पा रहे हैं। बाल विवाह एक सामाजिक समस्या है। इसे रोकने के लिए समाज में जागरुकता फैलानी होगी और प्रशासन को भी सख्त रवैया अपनाना होगा।-कुमारी ज्योतिपालबी. 151, गायत्री नगर, मुरादाबाद (उ.प्र.)तुगलकी नीतियांपिछले दिनों एक सम्मेलन में केन्द्रीय उद्योग व वाणिज्य मंत्री श्री कमलनाथ ने कहा, “आज भारत के व्यवसायी व देश की जनता वैश्वीकरण को गले लगा रही है।” यह बयान पूर्णतया भ्रामक व तथ्यों से परे है। इस वैश्वीकरण व उदारीकरण से केवल संपन्न वर्ग को ही लाभ हुआ है, जबकि आम जनता महंगाई, बेरोजगारी, लघु उद्योगों व कृषि की बर्बादी में पिसती जा रही है। ध्यान रहे, इसी उदारीकरण ने 1980-90 के दशक में लातिन अमरीकी देशों को आर्थिक रूप से इतना तबाह कर दिया था कि वे आज तक इससे नहीं उबर पाये हैं। अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के वर्चस्व के चलते अकेले मैक्सिको में ही 10 हजार रेस्तरां बन्द हो गये। भारतीय कंपनियां भले ही आज विश्व में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं, जैसे- टाटा द्वारा कोरस का अधिग्रहण, पर अपने देश में यही कंपनियां केन्द्र व राज्य सरकारों के साथ मिलकर कृषि योग्य भूमि का दोहन कर देश के अन्नदाता किसानों के पेट पर लात मारने को आमादा हैं। सिंगूर, दादरी और नन्दीग्राम के उदाहरण सामने हैं। सत्य यह है कि वैश्वीकरण व उदारीकरण के नाम पर देश की जनता हमारी सरकारों के अदूरदर्शी निर्णयों व तुगलकी नीतियों को कड़वे घूंट की तरह पीने को विवश है।-शलभ सक्सेनाएच-454, अल्फा-2, ग्रेटर नोएडा (उ.प्र.)ऊंटों की तस्करीपिछले कुछ वर्षों से बड़ी संख्या में राजस्थान से ऊंटों की तस्करी हो रही है। “रेगिस्तान का जहाज” कहे जाने ऊंट तस्कारों के माध्यम से बंगलादेश भेजे जा रहे हैं। बकरीद आदि त्योहारों में तो हजारों ऊंट काटे जाते हैं। यदि हालत ऐसी ही रही तो आने वाली पीढ़ी ऊंटों को सिर्फ चित्रों में ही देखेगी।-प्रकाश अग्रवाल “किटी”नेहरू रोड, वार्ड नं.-9, ठाकुरगंज, किशनगंज (बिहार)पुरस्कृत पत्रयह “शिक्षा” अन्धेरे लाएगीविदित हुआ है कि भारत सरकार आगामी शिक्षा सत्र से सभी विद्यालयों में बच्चों के लिए यौन शिक्षा को पाठक्रम का एक अनिवार्य अंग बनाने जा रही है। कहा जा रहा है कि इस शिक्षा का उद्देश्य एच.आई.वी. और एड्स को रोकना है।प्राचीन काल से आज तक भारत ने ज्ञान, विज्ञान, शिक्षा, तप व त्याग द्वारा संसार में अपनी अलग पहचान बनाई है। विदेशी शिक्षाविद् भी भारत के शिक्षण संस्थानों में आकर ज्ञान अर्जित करते हैं। परन्तु आज आधुनिकता के नाम पर मादक वस्तुओं का प्रचार करने वाले नीति निर्धारकों को बाल्यावस्था से ब्राह्मचर्य व संयम की शिक्षा की आवश्यकता अनुभव नहीं हो रही है। उनका जोर केवल एक बात पर है- स्कूल जाएं, कालेज जाएं, कहीं जाएं, “कण्डोम लेकर चलें”। जगह-जगह ऐसे बोर्ड लगे देखे गए हैं। विद्यालयों को आदेश दिए गए हैं कि वे बच्चों को शारीरिक शिक्षा के साथ-साथ यौन शिक्षा से अवगत करायें। जिस बाल्यावस्था में नैतिक शिक्षा आवश्यक है उसके स्थान पर यौन शिक्षा दी जायेगी, यह आश्चर्य की बात है। यौन शिक्षा भारत में शिक्षा का विषय ही नहीं रहा। ऐसा आभास हो रहा है कि एच.आई.वी. और एड्स के नाम पर विदेशी दबाव में षडंत्र रचा जा रहा है ताकि भारत को प्रबुद्ध राष्ट्र के स्थान से गिरा कर एक रोगी व अपाहिज राष्ट्र बना दिया जाये। इस निन्दनीय व घृणित योजना को किसी भी हालत में लागू नहीं होने देना चाहिए, अन्यथा इसके भयावह परिणाम होंगे। बालक विवाह की आयु तक पहुंचते-पहुंचते नपुंसक बन जाएंगे, मेधावी बनने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।हम अपने बच्चों को कैसी शिक्षा देना चाहते हैं जिससे उनका भविष्य उज्ज्वल बने, यह हर नागरिक का अधिकार है। हर नागरिक, बुद्धिजीवी, प्रशासक, जन प्रतिनिधि एवं समाज के मार्गदर्शक इस कुयोजना का एकजुट होकर विरोध करें और अंतत: इसे लागू होने से रोकें।प्रकाश लालभारतीय योग संस्थान, ए.डी. 24, शालीमार बाग (दिल्ली)हर सप्ताह एक चुटीले, ह्मदयग्राही पत्र पर 100 रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा। -सं.4