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स्वातंत्र्य संग्राम का एक और महत्वपूर्ण पक्ष

Written byArchiveArchive
Jan 7, 2007, 12:00 am IST
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दिंनाक: 07 Jan 2007 00:00:00

जनजातीय नेतृत्व ने दी थी ब्रिटिश सरकार को चुनौतीथ्दोलजी भीची थ्गोविन्द गिरि थ्मोती सिंह तेजावत थ्शंभुधन फुंगलोथ्अल्लूरी सीतारामराजू थ्वीर बिरसा मुण्डा-राजेन्द्र चड्ढाअ.भा. सह समन्वयक, प्रज्ञा प्रवाहसर जान सीले ने 1880 में लिखा था कि यदि शिवाजी अपनी सेना व शासन व्यवस्था में अनेक जातियों के बीच समन्वय बैठाकर हिन्दवी या मराठा स्वराज्य की स्थापना कर सकते हैं तो आगे उसी प्रकार के प्रयास की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।एक उदाहरण देखें। 1891 में तत्कालीन जनगणना आयुक्त लेस्टेन ने लिखा था कि सिख, जैन, बौद्ध तथा इस्लाम, ईसाई, पारसी एवं यहूदी मतानुयायियों को छोड़कर जो शेष बचते हैं, वही हिन्दू समाज है। इस समाज को भी जातीय, भाषाई एवं क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा में उलझाकर खण्ड-खण्ड करने का प्रयास ब्रिटिश जनगणना नीति द्वारा किया गया। सन् 1881 से 1941 तक की जनगणना नीति व रपटों पर ध्यान देने पर सामने आता है कि एक ओर तो ब्रिटिश जनगणना अधिकारी ईसाई, इस्लाम आदि पंथों को संगठित रूप देने का प्रयास करते रहे और दूसरी ओर हिन्दू समाज में जाति, भाषा व क्षेत्र की विविधता पर बल देकर आंतरिक कटुता व प्रतिस्पर्धा के बीज बोने में लगे रहे।स्वतंत्रता प्रिय भीलों का प्रत्यक्ष आन्दोलन 1823 में मोमट (उदयपुर) में दोलजी भीची के नेतृत्व में हुआ, जो ऊपर से तो जुल्म और शोषण के विरुद्ध था, पर वास्तव में ऐसा नहीं था। 1818 में मेवाड़ सरकार व ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ किए गए समझौते के विरुद्ध यह प्रथम घटना थी, जिसका असर मेवाड़ तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि पड़ोसी राज्यों के वनवासी क्षेत्रों पर भी पड़ा। भीलों की राष्ट्रभक्ति सदा अनुकरणीय रही। मुगलों व विदेशी आक्रान्ताओं पर आक्रमण और स्वतंत्रता आन्दोलन में उनके द्वारा प्रदर्शित शौर्य व निष्ठा सराहनीय रही। दोलजी भीची, गोविन्द गिरि, मोतीलाल व तेजावत, उधर महाराष्ट्र में उमेंद बसावा, भागोजी नायक व लथैया के नेतृत्व में भील जनजाति द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ आन्दोलन चलाए गए।सन्त स्वभाव वाले गोविन्द गिरि 25 वर्ष की आयु से ही भील जनजातीय क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करते रहे थे। वे भीलों द्वारा किए गए सामूहिक आन्दोलन के नेता के रूप में जाने जाते हैं।1881 में जब गोविन्द गिरि उदयपुर आए, तो उनकी भेंट स्वामी दयानन्द जी से हुई। गोविन्द गिरि द्वारा “सभ्य सभा” स्थापित की गई। 1903 में बांसवाड़ा में गोविन्द जी ने एक बड़ा यज्ञ किया। इसके पश्चात् प्रतिवर्ष 1908 तक लगातार यह यज्ञ अनुष्ठान चलता रहा। इसी बीच गिरि जी ने रजवाड़ों व जमींदारों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई जिससे उनमें इस आन्दोलन के प्रति आशंका उभरी। जब गोविन्द गिरि मानगढ़ पहुंचे तो हजारों की संख्या में धनुषधारी भीलों ने उनका स्वागत किया। इस तरह जो आन्दोलन विशुद्ध सामाजिक धरातल पर प्रारम्भ किया गया था, उसमें राजनीतिक आयाम भी जुड़ गए। कर्नल मेसरइन ने गोविन्द गिरि व भीलों के साथ समझौते का प्रस्ताव रखा, लेकिन असफल होने पर गोलियां बरसा दीं। लगभग 1500 भीलों का बलिदान हो गया। गोविन्द गिरि को गिरफ्तार कर फांसी की सजा दे दी गई जो बाद में आजन्म कारावास में बदल दी गई।उत्पीड़न के खिलाफ सबसे बड़ा आन्दोलन मोती सिंह तेजावत के नेतृत्व में हुआ। 7 मार्च, 1921 को जब अंग्रेज सरकार द्वारा स्थानीय प्रतिनिधियों के बीच समझौते की बात की जा रही थी तब स्थानीय भीलों पर मेवाड़ तथा रियासतों की फौजों ने गोलियां चला दीं। करीब 1200 भील हताहत हुए। इसी समय हेंगरी होलण्ड ने अतिरिक्त सचिव (विदेश विभाग) को पत्र लिखा कि मोती सिंह तेजावत और वनवासियों का मूल उद्देश्य तो भील राज्य स्थापित करना था।आमतौर पर 1857 को ही स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम समर माना जाता है। लेकिन इससे 28 वर्ष पूर्व 1828 में वीर बुद्ध भगत ने न सिर्फ क्रान्ति का शंखनाद किया था, बल्कि अपने साहस व नेतृत्व क्षमता से 1832 में लरका विद्रोह नामक ऐतिहासिक आन्दोलन का सूत्रपात्र किया था। सन् 1800 में रांची से 37 कि.मी. दूर पश्चिम में चान्हों प्रखण्ड में सिलालाई गांव में जन्मे बुद्ध भगत ने 1827 में ही अपनी लड़ाई की पहली शुरुआत कर दी थी। जल्दी ही इसमें भुण्डा, भेरी, होखेखार जनजातियों के लोग जुड़ते चले गए। लरका विद्रोह मूलत: वनवासियों को अपने परम्परागत जमीनी हक से बेदखल कर उसे अंग्रेजी हुकूमत, तत्कालीन राजाओं तथा जमींदारों को सौंपने व परम्परागत पेय पदार्थ हंडिया पर आबकारी लगाने व अत्याचारों के विरुद्ध था। इस आन्दोलन का प्रभाव दावानल की तरह छोटा नागपुर क्षेत्र में फैला। 27 फरवरी, 1932 को बंगाल में हरकारा में कैप्टन इम्वे को पता चला कि बुद्ध भगत मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित सिलालाई गांव में आए हैं तो उसने पूरे गांव को घेर लिया। ग्रामीणों को चिन्ता होने लगी कि बुद्ध भगत की रक्षा कैसे की जाए। 300 युवाओं व वृद्धों ने बुद्ध भगत को अपने बीचों-बीच करके चारों ओर घेरा बनाकर गांव से बाहर निकालने की कोशिश की। सायंकाल तक सिलालाई गांव की धरती शवों से पट गई। बुद्ध भगत व उसके समर्थक अंग्रेजों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए।असम के कछार जिले में जन्मे शंभुधन का विश्वास था कि शिव ही सृजनकर्ता, संरक्षण व संहारकर्ता हैं। शंभुधन डिमासा जनजाति से थे, जो सदैव सफेद चमड़ी वालों को टेड़ी नजर से देखती थी। 1854 में राजा तुलाराव की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने राहत की सांस ली तथा “फूट डालो राज करो” की योजना बनी। नगांव तथा नागाहिल्स इन दो जिलों की रचना की। ब्रिटिश सरकार की इस घोषणा से शंभुधन आवेश में आए तथा अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संगठन खड़ा किया। जिस समय शंभुधन के “क्रान्तिकारी बल” नामक संगठन का प्रशिक्षण शिविर चल रहा था उस समय अंग्रेज अधिकारी बहुत घबराए और मानसिंह व शंभुधन आदि की गिरफ्तारी के वारंट जारी किए। 1854 में ही शंभुधन ने अंग्रेजों को ललकारा।आंध्र के अल्लूरी सीतारामराजू ने एक बार बचपन में अंग्रेज अधिकारी के सामने सर झुका दिया था। पिता वेंकटरामराजू महान देशभक्त थे। उन्होंने पुत्र को ऐसा करने पर बहुत डांटा।राजू ने चकित होकर पिताजी की ओर देखा और रोने लगा। पिता ने कहा, “मूर्ख विदेशी के सामने सिर झुकाते हो? शर्म नहीं आती? वह कौन लगता है तुम्हारा? खबरदार, फिर कभी ऐसा किया तो जान से मार डालूंगा।” रोते-रोते राजू ने कहा, “नहीं, पिताजी फिर कभी ऐसा नहीं करुंगा।” वेंकटरामराजू ने बाद में कहा, “बेटा हमें कभी शत्रु के सामने सिर नहीं झुकाना चाहिए। यदि सिर झुकाना ही है तो केवल भारतमाता के सामने झुकाना।” राजू ने दो वर्ष निरन्तर साधक जीवन बिताया। वे सीतामाई नामक पहाड़ी की गुफा में अध्यात्म साधना में जुटे रहे। उन दिनों विशाखापट्टनम स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र था। देश के चोटी के नेता वहां आते थे। सार्वजनिक सभाओं में उनका भाषण होता था जहां राजू अवश्य जाता था। देश की गंभीर परिस्थिति उसके सामने थी। निकल पड़ा। उन दिनों बंगाल व पंजाब में क्रान्तिकारियों की हलचलें जोरों पर थीं। पंजाब में उसका कई क्रान्तिकारियों से परिचय हुआ।महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में असहयोग आन्दोलन जोर पकड़ रहा था। यही योग्य समय है, ऐसा सोचकर राजू ने मानसिक तैयारी करनी शुरू की।22 अगस्त, 1922 को राजू की सेना ने चितपल्ली पुलिस थाने को घेर लिया। गेरूआ वस्त्रधारी राजू थाने के अन्दर आंधी के समान घुसा। सारे सिपाही घबराकर शरण में आ गए। तब थाने से राजू बाहर आया और 11 बंदूकें, 1290 राउंड कारतूस, 5 तलवारें व 11 बायेनेट उसके पास थे। इसी दिन पूर्व सूचना देकर कृष्णदेवी पेठ के थाने पर धावा बोला। राजू की सेना वहां पहुंचने के पूर्व ही सभी पुलिसकर्मी वहीं हथियार छोड़कर भागे।राजवोमंगी गांव के पुलिस उपनिरीक्षक को राजू का पत्र मिला कि “24 अगस्त, 1922 को दोपहर आपके थाने पर छापा मारने आ रहा हूं। सावधान! शस्त्रों को हमें सौंपना है या हमसे लड़ना है। तय कर लो।” नीचे हस्ताक्षर थे-अल्लूरी सीतारामराजू। पत्र देखते ही वह थरथर कांपने लगा।6 मई 1924 की प्रात: पूजन करने के बाद हाथ में छड़ी लेकर गेरूए वस्त्र धारण कर जब राजू कोइरू गांव के पास से जा रहे थे तभी कोई जोर-जोर से चिल्लाया, यही हैं अल्लूरी सीतारामराजू। सन्नाटा छा गया। सिपाही हिम्मत बटोर कर आगे बढ़े और नि:शस्त्र राजू को पकड़कर मेजर गुडाल के सामने ले गए। राजू ने गरजकर कहा, “ए राक्षस, तुम मुझे मारने वाले हो। तुम सिर्फ एक राजू को मार सकोगे। भारतमाता के गर्भ से अनेक राजू पैदा होंगे। तलवार का जवाब तलवार से देंगे। प्राण के बदले प्राण लेंगे। मेरा प्यारा भारत स्वतंत्र होकर रहेगा।” राजू की गर्जना जारी थी। गुडाल क्रोध से चिल्लाया, “फायर!” और राजू ने आखिरी बार मातृभूमि को प्रणाम किया- “वन्देमातरम्”।राजू का बलिदान, उनके भोले-भाले वनवासी भाइयों का असीम त्याग, उनका पराक्रम व्यर्थ नहीं गया। उन लोगों के प्रबल प्रहारों के कारण अंत में अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। हमारी मातृभूमि स्वतंत्र हुई।अबुआ राज ऐते जना, महारानी राज ठण्डुजना। सिंहनाद की तरह पूर्वी भारत में गूंजी इस नाद ने ब्रिटिश राज को थर्रा दिया। इस नाद को गुंजाने वाले वीर का नाम था, बिरसा मुण्डा। छोटा नागपुर की भाषा में मुण्डा का अर्थ होता है सम्पन्न व्यक्ति। 15 नवम्बर, 1870 को रांची से 45 कि.मी. दूर उन्नाहातु नामक ग्राम में सुगन मुण्डा जैसे सम्पन्न जमींदार के घर बिरसा मुण्डा का जन्म हुआ था। 16 वर्ष की आयु में जब मुण्डा को के.जी.आई. मिशनरी स्कूल में भेजा गया तब स्वतंत्र स्वभावी बिरसा अंग्रेजों की गुलामी से विचलित हो उठा था।1894 में जब सारे देश में अकाल पड़ा, लोग दाने-दाने को तरसने लगे तब मालगुजारी वसूल करने के लिए ब्रिटिश सरकार के कारिन्दे आए। बिरसा यह देखकर क्रोधित हो गए। उन्होंने आतंक से भयभीत युवाओं को इकट्ठा किया, उनमें साहस भरा। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के सिपाही युसुफ खान का सिर एक झटके से धड़ से अलग कर दिया।27 अगस्त, 1895 को बिरसा को गिरफ्तार कर लिया गया। दो साल की सजा भुगतने के बाद रिहा होने पर बिरसा में देश प्रेम की भावना और बलवती हो गई थी। अगस्त 1897 में बिरसा ने एक सेवा दल की स्थापना की। खूंटी के दरोगा को छोटा नागपुर छोड़ने का आदेश दिया। पुलिस आयुक्त इसटिट फील्ड के अनुसार वनवासियों को साथ लेकर खूंटी पर बिरसा ने धावा बोला था। सरकार ने गोलियां चलाईं। 400 वनवासी हताहत हुए। 24 दिसम्बर, 1899 को बिरसा ने अपने साथियों के साथ रांची मुख्यालय पर हमला कर दिया। 3 फरवरी, 1900 को बिरसा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।35

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