|
-डा. श्रीकान्त
कभी स्वार्थ में डिग न सके जो,
कभी मोह में फंस न सके जो,
सदा त्यागमय,
विलग लोभ से,
स्वयं, स्वयं का, घर का स्वाहा
जीवन का नैवेद्य चढ़ाता,
राष्ट्रभक्ति का भाव जगाता-
फड़क रहा हो,
मातृ-भूमि हित प्राण चढ़ाने-
तड़फ रहा हो।
स्वयं सन्त- सर्वस्व त्याग की
महामूर्ति-सा व्यक्ति चाहिए।
व्यक्ति चाहिए।
कोटि-कोटि जो आज उपेक्षित,
गिरि-कन्दर में,
नगर-नगर में,
ग्राम-ग्राम में,
झोपड़ियों में
जंगल-जंगल बसते प्यारे,
राम हमारे-
श्री नारायण-नर नारायण
आजादी की किरण न पहुंची
माता की थाती जो संचित
शिक्षा-संस्कारों से वंचित
दोनों वक्त कहां है भोजन?
अरे! प्यास में आंसू पीते!
जर्जर तन पर,
चीर न ढक कर,
खुले गगन में प्रतिदिन सोते।
जाड़ों के दिन कहां रजाई?
खोद-खोद गड्ढे जा छुपते।
मिट्टी से ही तन ढक लेते।
दृष्टि न जाती अगर उधर तो
घर-बाहर पद-पन्थ देख लो
काली गुदड़ी में
काले-काले लाल देख लो
कचड़े के अम्बारों से कुछ बीन रहे हैं
, रेल-बसों में भीख मांगते
बंधुए और गुलामों जैेसे,
जीवन के दिन काट रहे हैं।
उनके प्रति जो दया दिखाए
वह करुणा की मूर्ति चाहिए।
व्यक्ति चाहिए।।
25











