| दिंनाक: 04 Oct 2005 00:00:00 |
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अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक,दैनिक जागरणअल्पसंख्यकों के नाम परदेश की अस्मिता पर आघातइससे पहले कि “भारत हिन्दू क्यों रहे” विषय पर विचार किया जाए, यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि “भारत” और “हिन्दू” अलग-अलग क्यों हैं। विश्व के अधिकांश देशों के सामने हमारे देश का एक अजीब सा चित्र उभरा है और कुछ ऐसा माना गया है कि इस स्थिति के लिए जहां हमारे देश में आए आक्रमणकारी जिम्मेदार हैं वहीं, कहीं न कहीं हम स्वयं भी इसके जिम्मेदार हैं।वैदिक काल में पृथ्वी के इस खण्ड को ब्राह्मावर्त या आर्यावर्त के नाम से जाना गया। महाभारतकाल में इस भूखण्ड को ऋषिपुत्री शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर “भारत-वर्ष” के नाम से जाना गया। “भारत” का अर्थ है, “भा” यानी प्रकाश या ज्ञान और “रत” का अर्थ है अनुरक्त। अर्थात जिस भूखण्ड पर मानव कल्याण के लिए ज्ञान की ज्योति प्रज्ज्वलित हुई, उसे “भारत” कहा गया। मध्यकाल में पश्चिम से आए आक्रमणकारियों के हिन्दू कुश मार्ग से यहां आने के कारण इसे “हिन्दुस्थान” के नाम से जाना गया। विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि जिन सभ्यताओं में संस्कृत भाषा प्रचलित नहीं थी वहां “इन्द्र” शब्द को अपभ्रंश के रूप में “इन्दू” कहा और फिर वह “इन्दू” शब्द “हिन्दू” बन गया। इस प्रकार मध्यकाल में यह भूखण्ड “हिन्दुस्थान” के नाम से जाना गया। 17वीं शताब्दी में समुद्र मार्ग से आने वाले यूरोपीय लोगों ने इस देश को “इंडिया” नाम दिया। स्वाधीनता के उपरांत जब नया संविधान बना तो हमने अपने देश का नाम संविधान में हिन्दी में “भारत” और अंग्रेजी में “इंडिया” ही रखने का निश्चय किया। अब पृथ्वी के इस भूखण्ड को विश्व में चार नामों से जाना जाता है- 1. भारत-वर्ष 2. हिन्दुस्थान 3. इंडिया 4. भारत।मुझे लगता है कि स्वतंत्रता पूर्व से ही हमारा राजनीतिक नेतृत्व वैदिक या भारतीय संस्कृति अथवा हिन्दुत्व के बारे में भ्रमित रहा। फलस्वरूप तत्कालीन राजनीतिज्ञ स्वतंत्रता के उपरांत अपने राष्ट्र को एक पहचान, एक नाम और एक राष्ट्रभाषा नहीं दे सके। आज उस भ्रम का परिणाम हम सभी के सामने है, जिसे जाने-अनजाने इस देश के वासी भोग रहे हैं। देश में वैचारिक स्तर पर हिन्दी व भारतीय मूल की अन्य भाषाओं का अंग्रेजी भाषा से द्वंद्व चल रहा है। हमारे राजनीतिज्ञों ने हिन्दुत्व को इस्लाम एवं ईसाइयत आदि की भांति पंथ अथवा मजहब की श्रेणी में ला खड़ा किया है। जबकि हिन्दुत्व एक सर्वकल्याणकारी जीवनदर्शन है, जिसकी अवधारणा संकीर्णता, धर्मान्धता और रूढ़िवादिता से परे सत्य व ज्ञान की खोज में मानव का सनातन प्रयास है। विश्व भर के अनेक मनीषियों की यही मान्यता रही है कि मानव सभ्यता का विकास पृथ्वी के इसी भूखण्ड पर हुआ और भारतीय वेद ज्ञान के वे भण्डार हैं जिनकी रचना मानवीय मूल्यों और अनुभूतियों के आधार पर की गई है। भारतीय चिन्तकों ने मानव कल्याण हेतु जिस दर्शन का निर्माण किया वह अन्य दर्शनों की तुलना में सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि इसमें बाह्र जगत के साथ ही साथ अन्तर्जगत या अन्तर्मन की परिकल्पना की गई। अर्थात भौतिकवाद और अध्यात्मवाद – जीवन के दोनों पक्षों पर भारतीय मनीषियों ने गहन चिंतन कर विभिन्न ग्रंथों की रचना सर्वकल्याण की भावना से की। भारतीय संस्कृति अथवा हिन्दुत्व का मानव विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है, जिसे हमारे ऋषि-मुनियों ने सांख्य योग में साकार और निराकार ब्राह्म या सगुण और निर्गुण ब्राह्म के नाम से जाना है। सीमा पार से आए आक्रमणकारियों ने भारत पर राज करने के लिए भारतीय संस्कृति व हिन्दुत्व की मानव कल्याणकारी भावना को न समझते हुए उस पर अनेक लांछन लगाकर उसकी अस्मिता पर कुठाराघात किया और देशवासियों को भ्रमित किया। अरब से आए आक्रमणकारियों ने कभी भी भारत के आध्यात्मिक स्वरूप को नहीं पहचाना और उन्होंने अपने शासनकाल में अपने विचारों को बलपूर्वक थोपने का प्रयास किया।गोरों का भ्रामक प्रचारइस्लाम से भारतीय संस्कृति व हिन्दुत्व को उतना नुकसान नहीं हुआ जितना कि कुटिल अंग्रेजों ने अपनी साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों के विस्तार के लिए भारतीय अस्मिता की जड़ों पर प्रहार करके किया। उन्होंने वैदिक साहित्य का मनमाना अर्थ निकाला और अनेक प्रश्नचिन्ह लगाए। आर्यों का भारत आगमन, भारत में आने वाले “आर्य-अनार्य”, “आर्य एवं द्रविड़ संस्कृति” के प्रदूषण से भारतीय जीवन दर्शन के मनगढ़ंत निष्कर्ष निकाले। इसी दुराग्रह के तहत पश्चिमी देशों ने भारतीय दर्शन के प्रति अनेक भ्रामक प्रचार किए। अंग्रेजों ने साम्राज्यवादी प्रयोजनों को सिद्ध करने के लिए इस देश की जनता में भ्रामक प्रचार ही नहीं किए बल्कि देशवासियों की मानवीय संवेदनाओं व देशभक्ति तथा आपसी भाईचारे की भावना को तहस-नहस करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसका प्रयोजन यह था कि भारतीय जनमानस स्वदेश की भावना और अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाए। अंग्रेजों ने विश्व के अन्य देशों में यह प्रचार भी किया कि भारत कभी भी एक राष्ट्र नहीं था और यहां के निवासी इस देश की मूल सन्तान नहीं हैं। भारतीय जीवन दर्शन या हिन्दुत्व को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए अंग्रेजों ने हमारी शिक्षा पद्धति पर प्रश्नचिन्ह लगाए। मैकाले ने हमारी शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन करके उसे प्रयोगवादी और भोगवादी संस्कृति की ओर मोड़ दिया। उसने ज्ञान के स्थान पर बुद्धि के विकास पर अधिक बल दिया, जिसके फलस्वरूप सर्वकल्याण के स्थान पर आत्मसुख और स्व-कल्याण की भावना को बल मिला। अर्थात् निजी स्वार्थ ही सर्वोपरि हो गया।भोग की प्रवृत्तिआश्चर्य यह है कि स्वतंत्रता के छह दशकों के उपरांत भी हमारे राजनीतिज्ञ भारत के दर्शन एवं संस्कृति को समझने में असमर्थ हो रहे हैं। समझ में नहीं आता कि जब जापान में रहने वाला जापानी हो सकता है तथा अमरीका में रहने वाला अमरीकी हो सकता है तो भारत में रहने वालों को भारतीय या हिन्दुस्थान में रहने वालों को हिन्दू क्यों नहीं कहा जा सकता? “इंडिया” में रहने वाले हर व्यक्ति को “इंडियन” पुकारने में किसी को कोई हिचकिचाहट या विरोध नहीं दिखलाई पड़ता, किन्तु भारतीय या हिन्दू कहने में कठिनाई होती है। मेरी दृष्टि में स्वाधीनता के उपरांत भारत देश के निवासी भोगवादी अंग्रेजियत और अंग्रेजी भाषा के अधिक गुलाम हो गए हैं। पाश्चात्य जगत से आई भौतिक चकाचौंध ने भारतीय जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। हमारे देशवासियों की भोग करने वाली प्रवृत्तियों में बढ़ोत्तरी हुई है। भारतीय दर्शन में शरीर से परे बुद्धि है और बुद्धि से परे मन और मन से परे आत्मा की परिकल्पना की गई है, जबकि पश्चिमी दर्शन में बुद्धि के विकास पर ही अधिक बल दिया गया है।श्रीमद्भगवद्गीता एवं पातंजलि योगसूत्र भारत के दो ऐसे विशिष्ट मनोवैज्ञानिक ग्रंथ हैं जिनमें मानव मन में उठने वाली भावनाओं एवं प्रवृत्तियों का विस्तृत वर्णन किया गया है। जीवन गुणातीत है अर्थात समस्त प्राणियों में सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण का समावेश रहता है। इंद्रियां सदैव निर्धारित विषय की ओर ही आकर्षित करती हैं। बुद्धि के द्वारा ही इंद्रियां विषयों में प्रवेश करती हैं जो मन को अस्थिर अथवा सदैव चलायमान रखती हैं, तभी तो मन को चंचल कहा गया है। मन को स्थिर रखने के लिए इन्द्रियों पर अंकुश लगाना होगा, उन्हें नियंत्रित करना होगा तभी मायामोह से छुटकारा पाकर उसकी सर्वव्यापी सत्ता में प्रवेश मिलेगा। भारतीय चिन्तन में “वसुधैव कुटुम्बकम्” की परिकल्पना की गई है अर्थात वसुधा या पृथ्वी पर रहने वाले समस्त प्राणियों की परिकल्पना एक कुटुम्ब या परिवार के रूप में की गई है। भारतीय परिवेश में प्रेम के आध्यात्मिक स्वरूप को ही ईश्वर का रूप माना गया है। “चरैवेति-चरैवेति” के सिद्धान्त के अनुसार भारतीय मनीषा ईश्वर की सत्ता को किसी परिभाषा में न बांधकर अनंत कहा है, जिसकी न शुरुआत है और न ही अंत है। हमारे मनीषियों ने सृष्टि में विचरण करते हुए सभी प्राणियों के कल्याण की बात कही है- “सर्वे भवन्तु सुखिन:”। रामायण और महाभारत दोनों महाकाव्यों में मानव कल्याण के लिए दृश्य और अदृश्य दोनों क्षेत्रों की समुचित व्याख्याएं की हैं ताकि मानव “सत्य और असत्य”, “धर्म और अधर्म” पर चिंतन करते हुए सुखमय जीवन व्यतीत कर सके। इन महाकाव्यों में ऐसे संवेदनशील प्रसंग भरे हुए हैं जो समय-समय पर मानव कल्याण की ओर प्रेरित करते रहते हैं। हमारे शास्त्रों में बुद्धि विलास या चातुर्य के स्थान पर बैद्धिक कौशल की बात कही गई है। भारतीय संस्कृति अथवा हिन्दुत्व में सृष्टि के सभी प्राणियों, विशेष तौर पर मानव कल्याण की सार्वभौमिक परिकल्पना की गई है। वैदिक काल में प्रेम और सत्य के सिद्धांतों पर बल दिया गया है। विश्व में अनेक सभ्यताओं और मत-पंथों का जन्म हुआ है किन्तु भारत में जिस वैदिक धर्म या हिन्दू धर्म का विकास हुआ है उसने कभी अन्य सभ्यताओं और मत-पंथों पर अतिक्रमण नहीं किया। यही वजह है कि हिन्दू धर्म के आध्यात्मिक पक्ष को सभी मत-पंथों में मान्यता प्रदान की गई और हमने अपने देश में सभी पंथों-विचारधाराओं का आदर व सम्मान करते हुए उन्हें विकसित होने का अवसर प्रदान किया। प्रारंभ से ही भारतीय मनीषियों ने पंथ निरपेक्षता के मूल सिद्धांतों की रक्षा की है। आजादी के बाद बने नए संविधान के अंतर्गत जब भारत को पंथनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया तो यहां के निवासियों ने उसे सहर्ष स्वीकार किया, किन्तु दुर्भाग्यवश पंथनिरपेक्षता के नाम पर जो अधर्म और अनैतिकता का दौर चला उससे पंथ निरपेक्षता के अर्थ का अनर्थ हो गया। यहां के सत्ताधारियों ने अन्य मत-पंथों की तुलना में हिन्दू धर्म के अनुयायियों को साम्प्रदायिक कहकर उनके साथ न केवल अन्याय किया बल्कि घोर अत्याचार भी किए। पंथ निरपेक्षता का अर्थ किसी भी सूरत में यह नहीं लगाया जा सकता कि तुष्टीकरण की नीति अपनाकर किसी भी पंथ को अन्य पंथ विचार के बीच अपमानित किया जाए। भारत की 80 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दू है, फिर अल्पसंख्यकों के नाम पर देश की अस्मिता पर आघात करना कहां तक न्यायसंगत है?इसे भारत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिस राजनीतिक नेतृत्व से अपनी अस्मिता को बचाने की अपेक्षा की गई थी, वह ऐसा करने में निष्क्रिय और असमर्थ रहा। समझ में नहीं आता कि कब तक हम अपने ही घर में अपनी ही संस्कृति को स्थापित करने के लिए परीक्षा देते रहेंगे। भोगवादी संस्कृति का नशा भारतवासियों या हिन्दुस्थानियों पर इस तरह गहराता जा रहा है कि वे अपने मार्ग से भ्रमित हो इधर-उधर भटक रहे हैं। यह कैसी विडम्बना है कि आज भी अन्य देशों में भारत में रह रहे इस्लाम के अनुयायियों को “हिन्दू-मुसलमान” के नाम से जाना जाता है, किन्तु हिन्दुस्थान में रह रहे मुसलमानों को अपनी राष्ट्रीयता “भारतीय” या “हिन्दू-मुसलमान” बताने में आपत्ति है जबकि अंग्रेजी भाषा में अपने आपको “इंडियन” कहने में उन्हें आपत्ति नहीं? ऐसा लगता है कि अंग्रेजों ने स्वतंत्रता के पहले द्वेष और घृणा के जो बीज बोए थे वह अंकुरित हो भारतीय संस्कृति या हिन्दुत्व के विकास के मार्ग में रोड़े अटका रहे हैं। आज जब विश्व के सभी देशों में भारतीय चिंतन पर आधारित बन्धुत्व की बात की जा रही है तब हमारे देश के लोग सत्ता लोभ और साम्प्रदायिकता के नाम पर अपने स्वार्थों को सिद्ध करने में लगे हुए हैं।NEWS