| दिंनाक: 05 Aug 2005 00:00:00 |
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बिहारलालू कांग्रेसकुछ न होते हुए भी सिर्फ और सिर्फ झगड़ेबिहार कांग्रेस के बारे में दो बातें आमतौर पर कही जाती हैं- पहली, बिहार कांग्रेस में सिर्फ नेता रह गए हैं। दूसरी, बिहार में कांग्रेस का अपना कोई वजूद नहीं है, वह “लालू कांग्रेस” हो गई है। साधारण कांग्रेसी नेताओं से बात कीजिए तो यही कहेंगे यह दुर्गति कांग्रेस की बिहार नीति के कारण हुई, जहां पार्टी को लालू की गोद में बैठा दिया गया है। परिणाम स्वरूप पार्टी मरणासन्न दशा में पहुंच गई है।” इसके बावजूद, यहां कांग्रेस तीन धड़ों में बंटी हुई है। एक धड़ा लालू समर्थक है, दूसरा लालू विरोधी, और तीसरा धड़ा वह है जो समय के अनुसार बदलता रहता है। लालू समर्थक धड़े में वे कांग्रेसी हैं जो लालू राज में किसी न किसी तरह सत्ता का स्वाद चखते रहे। यही वर्ग बिहार में कांग्रेस को डुबाने वाला साबित हुआ। कांग्रेस में लालू समर्थक नेताओं का नेतृत्व केन्द्रीय सूचना एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री शकील अहमद के हाथों में है। इनके अतिरिक्त डा. अशोक, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सदानंद सिंह, अशोक चौधरी, वीणा शाही आदि लालू के धुर समर्थक हैं। दूसरा धड़ा वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष राम जतन सिन्हा के नेतृत्व वाला है, जो लालू से दूरी बनाकर कांग्रेस को पटरी पर लाना चाहते हैं। जबकि तीसरा धड़ा एल.पी. शाही, अशफाक करीम, के.के. तिवारी, विनय शंकर दुबे जैसे लोगों का है।गुटों में बंटे कांग्रेसी नेता करारी हार के बावजूद भी एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने में कोई परहेज नहीं करते। प्रदेश कांग्रेस के सचिव दिलीप कुमार राय कहते हैं- “विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की दुर्गति की पूरी जिम्मेदारी प्रदेश अध्यक्ष राम जतन सिन्हा की है। वे एक “फ्रॉड” नेता हैं। उन्होंने पैसे लेकर टिकट बांटे, संगठन को चापलूसों से भर दिया और “सेकुलर” ताकतों को बांटने और कमजोर करने का काम किया। उनके प्रदेश अध्यक्ष रहते कांग्रेस का कभी उत्थान नहीं हो सकता।” बिहार कांग्रेस के बारे में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि इन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी जहां-जहां भी कांग्रेसी प्रत्याशियों के चुनाव प्रचार में गर्इं, उनकी या तो जमानत जब्त हो गई या वे बुरी तरह से हारे। पर बात कहने का साहस किसी में नहीं है। वे तो आपसी उठापटक और एक-दूसरे को नीचा दिखाने में ही जुटे हैं। समझा जा रहा है कि राम जतन सिन्हा की शीघ्र ही प्रदेश अध्यक्ष पद से विदाई होने वाली है। बहाना, विधानसभा चुनावों में पार्टी का खराब प्रदर्शन। पर जमीनी सचाई जानने वाले कह रहे हैं, “लालू का विरोध करके वे प्रदेश अध्यक्ष पद पर कैसे रह सकते हैं? सिन्हा जी दिल्ली का गणित नहीं न बूझते हैं। मैडम को “स्टेट” नहीं, “सेंटर” बचाना है न!”पटना से कल्याणीNEWS