| दिंनाक: 09 Apr 2005 00:00:00 |
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हर पखवाड़े स्त्रियों का अपना स्तम्भजनजातीय स्त्रियों ने पहचानीअक्षर की ताकत-श्रीति राशिनकरकुंदा सुपेकरये अक्षर की ताकत है जो मनुष्य के जीवन को ऊंचा उठाती है। लेकिन यदि देश की आधी आबादी अक्षर ताकत के ज्ञान से ही अपरिचित रह जाए तो भला देश का भविष्य कहां जाएगा, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। देश की निरक्षर यह आधी आबादी ही कुंदा सुपेकर की चिंता का कारण है और इसीलिए उन्होंने ग्रामीण महिला साक्षरता कार्यक्रम को अपने जीवन का मिशन बनाया।सुश्री कुंदा सुपेकर म.प्र. राज्य संसाधन केन्द्र के अन्तर्गत चलने वाले ग्रामीण महिला संघ में समन्वयक के पद पर काम करती हैं। पिछले तीस वर्षों से मध्य प्रदेश के जनजातीय इलाकों में हजारों महिलाओं को सक्षम, सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्होंने खासा परिश्रम किया है। स्त्री पढ़े-लिखे, विशेषत: ग्रामीण स्त्री स्वावलंबी और सामथ्र्यवान बने, यही उनका जीवन-ध्येय है। उनके अनुसार, “महिला को साक्षर बनाने का अर्थ केवल यह नहीं कि वह अपना हस्ताक्षर कर सके या अक्षर ज्ञान मात्र प्राप्त करे।” सुश्री कुंदा कहती हैं, “महिलाओं को पढ़ने-लिखने में रूचि लेनी चाहिए। महिलाओं के हाथ में प्रत्यक्ष रूप से परिवार की बागडोर होती है। महिलाओं का साक्षर होना परिवार और अंतत: समाज की साक्षरता पर असर डालता है।”तेजस्विनीकितनी ही तेज समय की आंधी आई, लेकिन न उनका संकल्प डगमगाया, न उनके कदम रुके। आपके आसपास भी ऐसी महिलाएं होंगी, जिन्होंने अपने दृढ़ संकल्प, साहस, बुद्धि कौशल तथा प्रतिभा के बल पर समाज में एक उदाहरण प्रस्तुत किया और लोगों के लिए प्रेरणा बन गईं। क्या आपका परिचय ऐसी किसी महिला से हुआ है? यदि हां, तो उनके और उनके कार्य के बारे में 250 शब्दों में सचित्र जानकारी हमें लिख भेजें। प्रकाशन हेतु चुनी गईं श्रेष्ठ प्रविष्टि पर 500 रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा।1971 से 1984 तक सुश्री कुंदा ग्रामीण महिला संघ के साथ जुड़ी रहीं। 1985 में ग्रामीण महिला संघ जब राज्य संसाधन केन्द्र के अंतर्गत आया तो सुश्री कुंदा उसमें समन्वयक के रूप में काम करने लगीं। समन्वयक का पद संभालने के बाद उनकी जिम्मेदारियां बढ़ीं। कार्यक्षेत्र और व्यापक हुआ। म.प्र. के सभी जनपदों में उन्होंने शिविर एवं कार्यशालाएं चलाकर स्त्री शिक्षा के कार्यक्रमों को गति दी। सन् 1996 में कुन्दा सुपेकर राज्य संसाधन केन्द्र, प्रौढ़ शिक्षा महिला ग्रामीण संघ, जो म.प्र. में एक गैर सरकारी संगठन के रूप में कार्यरत है, की निदेशक बनीं। उनके नेतृत्व का कमाल था कि सन् 1998 में संस्था को यूनेस्को द्वारा सम्मानित किया गया। “महिला कामगारों को पुरुषों के समान वेतन मिलना चाहिए”- इस मुद्दे पर कुंदा सुपेकर ने जो पुस्तक लिखी, वह यूनेस्को के आस्ट्रेलिया सम्मेलन में खूब सराही गयी। उन्हें यूनेस्को द्वारा बैंकाक में आयोजित स्त्री शिक्षा सम्बंधी कार्यशाला में भाग लेने का निमंत्रण भी मिला। टोकियो और इंडोनेशिया में भी उन्होंने स्त्री शिक्षा पर भारत में चलने वाले प्रकल्पों का विवरण प्रस्तुत किया और विश्व के अनेक देशों के प्रतिनिधियों के साथ इस विषय पर अनुभवों का आदान-प्रदान किया। कुन्दा सुपेकर के इन प्रयासों को भारत में भी कम सराहना नहीं मिली है। पिछले दिनों अन्तरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित एक समारोह में राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने उन्हें सम्मानित किया था।”स्त्री” स्तम्भ के लिए सामग्री, टिप्पणियांइस पते पर भेजें-“स्त्री” स्तम्भ द्वारा,सम्पादक, पाञ्चजन्य,संस्कृति भवन, देशबन्धु गुप्ता मार्ग, झण्डेवाला, नई दिल्ली-55उनका साक्षरता और स्त्री सशक्तिकरण आन्दोलन आज भी अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा है। संगठित स्त्री शक्ति क्या-क्या कर सकती है, इसका परिचय उन्होंने बखूबी दिया है। इन्दौर की समाजसेविका स्व. कृष्णा अग्रवाल द्वारा स्थापित ग्रामीण महिला संघ में आज कुंदा सुपेकर के साथ डा. अरुणा शास्त्री, सुश्री तारा जायसवाल, विभ्रा नरगुंदे, सीमा व्यास आदि कुशल सहयोगियों के बूते छोटा सा बिरवा विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका है। इन सभी का एक ही संकल्प है, “स्त्री अब अबला नहीं रहेगी, अपने देश व समाज के लिए वह सब कुछ करेगी, जिससे भावी पीढ़ियों का जीवन समृद्ध व सुखमय हो सके।”NEWS