| दिंनाक: 09 Dec 2004 00:00:00 |
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हर पखवाड़े स्त्रियों का अपना स्तम्भमेरी सास, मेरी मां, मेरी बहू, मेरी बेटीजब भी सास- बहू की चर्चा होती है तो लगता है इन सम्बंधों में सिर्फ 36 का आंकड़ा है। सास द्वारा बहू को सताने, उसे दहेज के लिए जला डालने के प्रसंग एक टीस पैदा करते हैं। लेकिन सास-बहू सम्बंधों का एक यही पहलू नहीं है। हमारे बीच में ही ऐसी सासें भी हैं, जिन्होंने अपनी बहू को मां से भी बढ़कर स्नेह दिया, उसे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। और फिर पराये घर से आयी बेटी ने भी उनके लाड़-दुलार को आंचल में समेट सास को अपनी मां से बढ़कर मान दिया। क्या आपकी सास ऐसी ही ममतामयी हैं? क्या आपकी बहू सचमुच आपकी आंख का तारा है? पारिवारिक जीवन मूल्यों के ऐसे अनूठे उदाहरण प्रस्तुत करने वाले प्रसंग हमें 250 शब्दों में लिख भेजिए। अपना नाम और पता स्पष्ट शब्दों में लिखें। साथ में चित्र भी भेजें। प्रकाशनार्थ चुने गए श्रेष्ठ प्रसंग के लिए 200 रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा।निर्मल, निर्झर-सी मांममता का सागर हैं मां: श्रीमती श्वेता सचदेवाअपनी सासू मां श्रीमती वंती देवी के साथ -श्वेता सचदेवाविवाह के बाद नए घर में प्रवेश वास्तव में स्त्री के लिए कल्पना लोक से यथार्थ के धरातल पर पदार्पण के समान ही होता है। लेकिन मेरे लिए यह कठोर यथार्थ भी कल्पना लोक जैसा ही कोमल और सुखदायक था। मेरे और मेरी सासू मां (श्रीमती वंती देवी) के बीच सम्बंध की शुरुआत उनके द्वारा मेरी आरती उतारने और मेरे द्वारा उनके चरण स्पर्श से हुई। मां बहुत ही धार्मिक और सुदृढ़ सोच वाली महिला तो हैं ही साथ ही दूसरे के दु:ख-तकलीफ और मन को समझने वाली भी हैं। मैंने विवाह से पूर्व स्नातकोत्तर तक की शिक्षा पूर्ण की थी। लेकिन अपना भविष्य बनाने के लिए और पढ़ना चाहती थी। विवाह के बाद चूंकि महिला का भविष्य बहुत कुछ उसके पति के परिवार वालों पर निर्भर करता है। इसलिए मन में तमाम तरह की आशंकाएं थीं कि आगे और पढ़ने की मेरी इच्छा पूरी होगी भी या नहीं। पारिवारिक दायित्व बढ़ते जा रहे थे, साथ में कालेज में पढ़ाने की मेरी इच्छा भी बलवती हो रही थी। कालेज में पढ़ाने का मतलब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित “नेट” परीक्षा उत्तीर्ण करना। “नेट” परीक्षा, मतलब जमकर पढ़ाई। मां मेरे लिए आगे आईं। मैंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित “नेट” परीक्षा की तैयारी की। मातृत्व की विषम किन्तु सुखद परिस्थितियों में मैंने परीक्षा दी, लेकिन अनुत्तीर्ण रही। मेरा सपना मेरे सामने बिखर गया था। मैं बहुत निराश हो गई। ऐसे समय में उन्होंने मुझे न केवल मानसिक वरन् आत्मिक संबल भी प्रदान किया। उन्होंने एक बार फिर मुझे प्रोत्साहित किया। मैंने दिल्ली प्रशासन के शिक्षा विभाग में प्रवक्ता पद के लिए परीक्षा दी और इसे उत्तीर्ण भी कर सकी। मैं आज अर्थशास्त्र प्रवक्ता के पद पर नियुक्त हूं। यह निराशा में डूबते को सहारा देने का अनुपम उदाहरण है। मैं यह गौरव उनकी वजह से प्राप्त कर सकी। आज भी अपनी नन्हीं बिटिया को उनकी स्निग्ध, स्नेहिल छाया में छोड़कर मैं आश्वस्त हो जाती हूं।माता-पिता ने शिक्षा प्रदान कर जिस नींव का निर्माण किया, उस पर भवन बनाने में मेरी सासू मां ने अपना पूरा सहयोग दिया। ईश्वर उनके मातृत्व का अजस्र स्रोत हम पर सदा बहाता रहे और उनके स्नेह निर्झर में मेरा मन सदा अवगाहन करता रहे।9-ए, न्यू गोविन्दपुरागली श्रीराम मंदिर, दिल्ली-5120