| दिंनाक: 05 Nov 2003 00:00:00 |
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कैलास-मानसरोवर नेपाल से होते हुए कैलास-मानसरोवर यात्रा-7शिवचरणों में आराधनादमहुआ धरगत अंक में हमने नेपाल से होकर जाने वाले कैलास-मानसरोवर यात्रा पथ के वृत्तांत की छठी किस्त प्रकाशित की थी। यहां प्रस्तुत है, उसी वृत्तांत की अगली किस्त-रात को दलदल में फंस जाने के कारण हमारा ट्रक सुबह लगभग 5 बजे आया। हमारे कार्यक्रम के अनुसार हमें कैलास के पाददेश दारचेन के लिए सुबह ही रवाना होना था। लेकिन चालकों के थके होने के कारण हमने सोचा कि चलो, थोड़े विश्राम के बाद ही आगे बढ़ेंगे।मानसरोवर और कैलास के मध्य फैली विस्तृत समतल भूमि है- पारखा उपत्यका। इसी रास्ते से होते हुए हम आगे बढ़े दारचेन की तरफ। रास्ते में देखने को मिले दुर्लभ कस्तूरीमृग। गाड़ी की आवाज सुनकर वे दूर भाग जाते। थोड़ी दूर जाकर फिर गाड़ियों को देखते रहते। इसके अलावा पारखा उपत्यका में असंख्य खरगोश और अनेक किस्म के पक्षी देखने को मिले। चारों ओर सौंदर्य मंडित नैसर्गिक शोभा देखते हुए हम दारचेन गांव पहुंचे। कैलास पर्वत माला की दक्षिण दिशा में स्थित इस गांव की ऊंचाई है, लगभग 16000 फुट। दारचेन से ही शुरू होती है 32 मील लम्बी कैलास परिक्रमा। बीच में पार करना पड़ता है 18,300 फुट ऊंचा दोलमा गिरीपथ। साधारणतया कैलास परिक्रमा हमारी तीर्थयात्रा में नहीं रखी जाती क्योंकि इतने कम समय में समतल से चढ़कर दारचेन में आना और फिर परिक्रमा करना काफी कष्टदायक रहता है। भारत सरकार द्वारा आयोजित यात्रा में आने वाले यात्री तकरीबन एक माह चलकर आते हैं, इसलिए वे काफी स्वस्थ रहते हैं। दूसरा, ये यात्री अप्रैल से सितम्बर के बीच में आते हैं। अक्तूबर के महीने में तो दोलमा गिरीपथ एवं परिक्रमा के पथ पर भारी मात्रा में हिमवर्षा होती है। हम मानसरोवर के निकट ही थे कि हमें कैलास परिक्रमा पथ पर भारी हिमवर्षा के कारण जर्मन पर्यटकों की मृत्यु का दु:खद समाचार मिला। उनकी मृतदेह नीचे लाने के प्रयास किए जा रहे थे। दारचेन से पारखा उपत्यका और दक्षिण में स्थित गुरला मान्धाता शिखर का अपूर्व सौन्दर्य मंत्रमुग्ध कर देता है। दारचेन से हमारी यात्रा मानस की ओर शुरू हुई। उस दिन हमें मानस के तट पर पूजा और यज्ञ करना था। बर्फीली रास्ते के बीच से होती हुई हमारी गाड़ी पारखा उपत्यका के तल में बसे एक छोटे पहाड़ पर रुक गई। यहां से एक तरफ कैलास (22,028 फुट) और दूसरी ओर मानसरोवर का असाधारण दृश्य देखने को मिलता है। यहां थोड़ा समय बिताकर हम चल पड़े, मानसरोवर के तीर की ओर। समुद्र तट से 14,950 फुट की ऊंचाई पर, लगभग 200 वर्गमील विस्तृत, सुविशाल,मानस तट पर पूजा करते हुए तीर्थयात्रीमानसरोवर। युगों-युगों से एक दुर्लभ, अपार्थिव और स्वर्गिक सौंदर्ययुक्त यह पवित्र सरोवर कोटि-कोटि श्रद्धालुओं की अपार श्रद्धा का प्रतीक बनकर विराजमान है। मानस का यह देवदुर्लभ सौन्दर्य अनन्तकाल से कितने ही ज्ञानी, मुमुक्षु और तपस्वियों का आह्वान करता आया है। इसके तीर पर साधना करके मानव महामानव में रूपान्तरित होता है। महातीर्थ मानसरोवर। यहां देवी का नाम दाख्यायनी है और भैरव का नाम अमर। हिन्दू धर्म में मान्यता है कि कैलास पर्वत शिखर पर देवाधिदेव शंकर और देवी पार्वती वास करते हैं। पौराणिक साहित्य में यही महाकैलास पृथ्वी के मेरूदण्ड स्वरूप सुमेरू पर्वत के नाम से जाना जाता है। तिब्बती वज्रयान बौद्धों की मान्यतानुसार कैलास शिखर के अधिष्ठाता हैं, व्याघ्र चर्मधारी देम -चोग और महाशक्ति तारा वज्रवराही या दोर्जे फोगमा। जैन पंथ के अनुसार उनके प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने कैलास पर तपस्या करके सिद्धि प्राप्त की थी। इसलिए हिन्दू, बौद्ध, जैन सभी मत-पंथों के लिए यह कैलास मानसरोवर महातीर्थ है।द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग दर्शन-6श्री भीमेश्वरयह ज्योतिर्लिङ्ग गुवाहाटी के पास ब्राहृपुर पहाड़ी पर अवस्थित है। इस ज्योतिर्लिङ्ग की स्थापना के विषय में शिवपुराण (अध्याय 19 से 21) में विस्तारपूर्वक वर्णन दिया गया है। यह कामाख्या मन्दिर के निकट है। लेकिन बहुत-से लोगों को इसकी जानकारी नहीं रहने से यहां अधिक लोग नहीं पहुंच पाते। मानस के तीर पर पूजा होम आदि की व्यवस्था की गई। अक्तूबर का तीसरा सप्ताह होने के कारण मानसरोवर में बर्फ जमनी शुरू हो गई थी। बर्फ की तरह ठंडा पानी और प्रबल हवाएं। पूरी डुबकी लगाने की क्षमता तो थी नहीं, इसलिए सिर पर थोड़ा पानी डालकर स्नान किया। मई के महीने में इतनी ठंड नहीं होती। उस समय मानसरोवर में स्नान का आनन्द ही अलग है। स्नान करके सबने अपनी प्रथानुसार पूजा की। पूजा के लिए सामान की सारी व्यवस्था (यज्ञकुंड, समिधा आदि) सहज ही हो गई। सभी ने मिलकर बर्फ से शिवलिंग बनाया। अनिर्वचनीय अनुभूति। मानसरोवर के तीर पर देवात्मा कैलास के चरणों में बैठकर देवाधिदेव महादेव की आराधना। चारों दिशाओं में शास्त्रशुद्ध मंत्रोच्चारण और स्तोत्रपाठ गुंजायमान हो उठा। शाम तेजी से ढल रही थी। धीरे-धीरे मानस पर अंधेरा छा रहा था और इसी के साथ ठंडी हवाएं और तेजी से चलनी शुरू हो गई थीं।(अगले अंक में जारी…)28