13 सितंबर को भारतीय उद्यमिता विकास संस्थान (ईडीआईआई), अमदाबाद में आयोजित ‘साबरमती संवाद 2026’ में बदलती वैश्विक व्यवस्था, ब्रिक्स के बढ़ते प्रभाव, ग्लोबल साउथ में भारत की भूमिका और उभरते युवा नेतृत्व जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर और वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा ने भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं प्रख्यात चिंतक राम माधव से विस्तृत संवाद किया। प्रस्तुत हैं मुख्यांश
हितेश शंकर: दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में भारत, रूस और चीन के नेताओं की एक साथ दिखाई गई तस्वीर को आप बदलती विश्व व्यवस्था के संदर्भ में कैसे देखते हैं? वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में ब्रिक्स का महत्व क्या है?
एक नई वैश्विक व्यवस्था आकार ले रही है, जिसमें बहुपक्षीय संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और दुनिया बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रही है। ब्रिक्स की शुरुआत 2006 में रूस, भारत और चीन के समूह के रूप में हुई। बाद में ब्राजील और 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से BRICS बना, जो अब BRICS Plus के रूप में विस्तारित हो चुका है। भारत इसका संस्थापक सदस्य है और शुरुआत से सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। ब्रिक्स विश्व की करीब 50% आबादी, 46% वैश्विक जीडीपी और 27-28% वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है। जी-20 के बाद यह एक प्रमुख वैश्विक समूह है, जिसमें बदलती विश्व व्यवस्था के बीच भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
हितेश शंकर: ब्रिक्स को अक्सर ‘ग्लोबल साउथ की आवाज’ कहा जाता है। आपके विचार से इसकी वास्तविक भूमिका और वैश्विक प्रभाव कितना बढ़ा है? क्या यह विकासशील देशों के हितों को प्रभावी ढंग से सामने रखने वाला मंच बन रहा है?
दिल्ली घोषणा-पत्र के अनुसार, ‘ग्लोबल साउथ’ कोई भौगोलिक विभाजन नहीं, बल्कि विकासशील और गैर-पश्चिमी देशों का समूह है। जी-7 पश्चिमी देशों का समूह है, जबकि ब्रिक्स में कोई पश्चिमी देश नहीं है, इसलिए बदलती विश्व व्यवस्था में इसका महत्व बढ़ रहा है। भारत, इंडोनेशिया और चीन जैसी अर्थव्यवस्थाएं तेजी से बढ़ रही हैं, जबकि कई यूरोपीय देशों की विकास दर अपेक्षाकृत कम है। ग्लोबल साउथ की प्रमुख चुनौती वैश्विक संस्थाओं, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र, में पर्याप्त प्रतिनिधित्व का अभाव है। आज यह वैश्विक विकास का प्रमुख इंजन है, लेकिन उसकी आवाज अपेक्षाकृत कम प्रभावी है। ऐसे में ब्रिक्स ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती से सामने रखने वाले महत्वपूर्ण मंच के रूप में उभर रहा है।
अनुराग पुनेठा: अमेरिका की बदलती वैश्विक भूमिका और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समूहों के बीच भारत की सक्रियता को आप किस तरह देखते हैं? क्या ब्रिक्स केवल प्रतीकात्मक महत्व रखता है या बदलती विश्व व्यवस्था में इसकी वास्तविक प्रासंगिकता भी है?
दुनिया एक नई वैश्विक व्यवस्था की ओर बढ़ रही है और पुरानी व्यवस्था कमजोर पड़ रही है। अमेरिका, विशेषकर ट्रंप के नेतृत्व में, कई वैश्विक जिम्मेदारियों से पीछे हट रहा है। ऐसे में देश अपनी सुरक्षा और हितों के लिए नए समूह बना रहे हैं। मक्का समझौता इसी मिनी-लेटरल प्रवृत्ति का उदाहरण है। इतालवी विद्वान एंटोनियो ग्राम्शी ने कहा था, “The old order is dead, the new is yet to be born.” इस संक्रमण में नई शक्तियों का उभार और अव्यवस्था स्वाभाविक है, जिससे नई व्यवस्था आकार लेती है। इसीलिए भारत खुद को किसी एक गुट तक सीमित नहीं रखता। वह ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन, क्वाड और जी-20 जैसे मंचों पर सक्रिय है और जी-7 में भी आमंत्रित होता रहा है। यह भारत के बढ़ते वैश्विक महत्व को दर्शाता है। नई विश्व व्यवस्था किसी एक देश या गुट से नहीं बनेगी; इसमें सभी प्रमुख शक्तियों की भूमिका होगी और भारत विभिन्न मंचों पर अपनी भूमिका निभाता रहेगा।
हितेश शंकर : भारत तकनीक, निवेश और व्यापार के लिए पश्चिम से गहराई से जुड़ा है, वहीं ब्रिक्स में चीन और रूस जैसे देश भी महत्वपूर्ण साझेदार हैं। ऐसे में भारत की भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं और आर्थिक हितों की इन दोनों दिशाओं को आप किस प्रकार समझते हैं?
यह गलतफहमी दूर होनी चाहिए कि भारत की व्यापारिक निर्भरता केवल पश्चिमी देशों पर है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जबकि चीन दूसरा और रूस चौथा है। आईटी सेवाओं को अलग करें तो चीन सबसे बड़ा साझेदार बन जाता है। ब्रिक्स देशों के साथ भारत का कुल व्यापार लगभग 250 अरब डॉलर है, जो इन संबंधों के महत्व को दर्शाता है। पश्चिमी देशों के साथ तकनीक, व्यापार और निवेश जितने महत्वपूर्ण हैं, उतने ही महत्वपूर्ण ब्रिक्स देशों के साथ संबंध भी हैं। भारत की नीति दोनों के साथ संतुलित और अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संबंध मजबूत करने की है। हमारी भू-राजनीति और अर्थव्यवस्था किसी एक दिशा तक सीमित नहीं है।
अनुराग पुनेठा : यदि नई विश्व व्यवस्था में चीन का प्रभाव और अधिक बढ़ता है, तो भारत किस प्रकार की वैश्विक व्यवस्था देखना चाहेगा?
हम न चीन का वर्चस्व चाहते हैं, न किसी अन्य शक्ति का। दिल्ली घोषणा-पत्र में ऐसी वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया गया है, जिसमें सभी देशों की आवाज और पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो। संयुक्त राष्ट्र की बड़ी समस्या यह है कि पांच देशों के पास वीटो पावर है, जिससे कई महत्वपूर्ण निर्णय उनकी सहमति पर निर्भर हो जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव भी सुरक्षा परिषद की प्रभावशीलता पर सवाल उठा चुके हैं। इसलिए वैश्विक संस्थाओं की मौजूदा संरचना में सुधार आवश्यक है। इसी संदर्भ में ऋ षि अरविंद ने 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता और भविष्य की विश्व व्यवस्था के पांच लक्ष्य बताए थे, जिनमें एक लक्ष्य दुनिया को बेहतर वैश्विक व्यवस्था की ओर ले जाना भी था।
हितेश शंकर : सरसंघचालक मोहन भागवत जी के हालिया विदेश दौरे पर बिल डरेक्स के लेख में 1920 के दशक में मुस्लिम ब्रदरहुड, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उभार की तुलना की गई है। लेख में राष्ट्रवाद, औपनिवेशिकता-विरोध और आहत सभ्यताओं के आर्तनाद जैसे कारकों का भी उल्लेख है। आप इस विश्लेषण को किस दृष्टि से देखते हैं?
भारत का अध्ययन करने वाले युवा स्कॉलर बिल डरेक्स का विश्लेषण रोचक है। 11 सितंबर 1893 को स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में भारत की सभ्यता और उसके संदेश को वैश्विक मंच पर रखा। पिछले 133 वर्षों से विभिन्न संगठन, संत और महापुरुष उसी संदेश को अलग-अलग रूपों में दुनिया के सामने रखते आए हैं। मोहन भागवत जी के हालिया अमेरिका दौरे का संदेश भी मूलतः विवेकानंद जी के संदेश से जुड़ा था-शब्द अलग थे, लेकिन भाव समान था। विवेकानंद जी ने भारत की उस सभ्यता पर गर्व व्यक्त किया था, जो विविधता को केवल सहन नहीं करती, बल्कि उसे स्वीकार और सम्मान देती है। रा.स्व.संघ आज भले ही बड़ा और प्रभावशाली संगठन हो, लेकिन वह किसी नई विचारधारा का दावा नहीं करता। वह भारत की हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता के उसी संदेश को दुनिया तक पहुंचाने की बात करता है, जिसे विवेकानंद जी ने 130 से अधिक वर्ष पहले वैश्विक मंच पर रखा था।
अनुराग पुनेठा : मोहन भागवत जी के अमेरिका दौरे और पिछले कुछ वर्षों में हुए प्रयासों के संदर्भ में वैश्विक विमर्श में संघ-भाजपा के विचारों और नैरेटिव की प्रभावशीलता को आप किस तरह देखते हैं?
न्यूयॉर्क के मेयर ममदानी के विरोध ने भागवत जी के दौरे को और चर्चित कर दिया, जिससे भारत और संघ के विचारों पर वैश्विक बहस छिड़ी। इसी का परिणाम अमेरिकी विद्वान बिल डरेक्स का करीब 3,000 शब्दों का आरएसएस पर विश्लेषणात्मक लेख भी है। नैरेटिव्स का संघर्ष चलता रहेगा, लेकिन स्वामी विवेकानंद के 27 सितंबर 1893 के अंतिम भाषण का संदेश प्रासंगिक है-दुनिया में अलग-अलग विचार रहेंगे और हमें सभी का सम्मान करना चाहिए। इसी दृष्टि से भागवत जी ने अमेरिका समेत पाश्चात्य दुनिया के सामने संघ की सोच और भारत का दृष्टिकोण रखा।
हितेश शंकर : भाजपा की लगातार चुनावी सफलता के बाद उसके आलोचकों ने पार्टी को ‘जनोन्मुखी’ राजनीतिक संगठन के बजाय ‘चुनावी मशीनरी’ के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया है। दूसरी ओर, ‘आंदोलन’ के नाम पर देश में अराजकता फैलाने के आरोप भी सामने आते हैं। आप इन दोनों घटनाक्रमों को किस प्रकार देखते हैं?
राजनीतिक दल का उद्देश्य चुनाव जीतकर सरकार बनाना है, इसमें कोई संकोच नहीं। हम 22 राज्यों में जीत चुके हैं। लेकिन सत्ता का उद्देश्य निजी स्वार्थ नहीं, बल्कि समाज सेवा, सुशासन और जनहित है। इसी भावना से हम ‘सेवा संकल्प अभियान’ चला रहे हैं। जनता के समर्थन का आधार हमारा शासन और जनसेवा है। जिन्हें जनादेश का लोकतांत्रिक सामना कठिन लगता है, वे सड़क का रास्ता अपनाते हैं। 25 नवंबर 1949 को डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि स्वतंत्र भारत में राजनीतिक दलों को अपनी मांगों के लिए संवैधानिक माध्यमों-संसद, चुनाव और जनता के बीच-का सहारा लेना चाहिए। उन्होंने ऐसे रास्तों को ‘ग्रामर ऑफ अनार्की’ की संज्ञा दी थी। छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलनों से आपत्ति नहीं, पर राजनीतिक दलों को अपनी बात संसद और चुनाव के माध्यम से रखनी चाहिए। युवाओं को भी लोकतंत्र में संवैधानिक रास्ते को प्राथमिकता देनी चाहिए।
अनुराग पुनेठा : भाजपा में राज्यों से लेकर पार्टी संगठन तक दूसरी और तीसरी पंक्ति का नेतृत्व तैयार हुआ है। नए नेताओं को अवसर देने और उनके नेतृत्व का आकलन करने के लिए केंद्रीय नेतृत्व किन कसौटियों को महत्व देता है?
दूसरी पंक्ति का सबसे बेहतर नेतृत्व भाजपा के पास है, कांग्रेस के पास नहीं। हमारे पास उत्कृष्ट मुख्यमंत्री और केंद्र में युवा मंत्री हैं। पार्टी के अध्यक्ष 40 के दशक में हैं। 56 वर्ष की आयु में कोई स्वयं को युवा कह सकता है, लेकिन वास्तविक युवा नेतृत्व भाजपा ही आगे लाई है। हमारे पास मजबूत दूसरी और तीसरी पंक्ति का नेतृत्व है-बूथ स्तर तक। भाजपा 50 वर्ष पूरे करने वाली है। दो पीढ़ियां बीत चुकी हैं, तीसरी पीढ़ी नेतृत्व कर रही है, और चौथी-पांचवीं पीढ़ी आनी है। नए नेतृत्व को आगे लाना भाजपा की निरंतर प्रक्रिया है।
हितेश शंकर : वर्तमान राजनीति में ‘फ्रीबीज’ (मुफ्त सुविधाएं) का दौर चल रहा है। वहीं कांग्रेस मुस्लिम लीग की तरह व्यवहार कर रही है। दूसरी ओर कश्मीर में लाल चौक पर तिरंगे दिख रहे हैं, वंदे मातरम् का गान हो रहा है। इस बदलाव को आप किस रूप में देखते हैं?
‘फ्रीबीज’ कल्याणकारी राज्य का हिस्सा हैं। आवश्यक कल्याणकारी योजनाओं में आपत्ति नहीं, लेकिन केवल वोट के लिए आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च गंभीर चिंता का विषय है। 1960 के बाद अधिकांश लोकतंत्रों में कल्याणकारी नीतियां बढ़ीं। इसलिए सवाल योजनाओं का नहीं, उनकी आवश्यकता और सरकार की आर्थिक क्षमता का है। कश्मीर में अनुच्छेद 370 के बाद बदलाव दिखाई दे रहे हैं। पर्यटन बढ़ रहा है और वंदे मातरम् का सम्मान हो रहा है। महत्वपूर्ण यह है कि बहस अब आजादी या 370 की वापसी के बजाय शिक्षा और विकास के अवसरों पर केंद्रित है। कश्मीरियत और कश्मीरी संस्कृति को लेकर कवि सम्मेलन, मुशायरे और भारत के साथ संबंधों को दर्शाने वाले कार्यक्रम हो रहे हैं। इससे संकेत मिलता है कि आम समाज अलगाववादी मानसिकता से निकलकर अपनी संस्कृति और भारत के साथ अपने संबंधों को स्वीकार कर रहा है।
अनुराग पुनेठा: भाजपा में पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और बाहर से आए नेताओं को अपेक्षाकृत अधिक अवसर मिलने की चर्चा होती रही है। नई लीडरशिप और पुराने कैडर के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखने के लिए पार्टी किस प्रकार काम कर रही है?
मैं देश को दो भागों में देखता हूं-राजनीतिक रूप से सक्रिय और गैर-राजनीतिक। गैर-राजनीतिक वर्ग का रोजमर्रा की राजनीति से सीधा संबंध नहीं होता, लेकिन चुनाव के समय वे सरकार के प्रदर्शन, नेतृत्व और वादों के आधार पर मत बनाते हैं। नए लोगों के पार्टी में आने पर राजनीतिक दल अपने दरवाजे बंद नहीं रख सकते। भाजपा में सभी के लिए प्रवेश खुला है और लोग क्षमता के आधार पर आगे बढ़ते हैं। राजनीति में वरिष्ठता से अधिक प्रदर्शन और डिलीवरी का महत्व होता है। वरिष्ठता का सम्मान होना चाहिए, लेकिन केवल लंबे समय से पार्टी में होना आगे बढ़ने का पर्याप्त आधार नहीं।
भाजपा में पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा न हो, इसका विशेष ध्यान रखा जाता है। राष्ट्रीय से लेकर जिला स्तर तक पुराने कार्यकर्ताओं के संपर्क और देखभाल के लिए विशेष पदाधिकारी हैं। कोविड के समय प्रधानमंत्री जी ने 40-50 वर्ष पुराने हजारों कार्यकर्ताओं की सूची मंगवाई और प्रतिदिन करीब 100 को फोन कर उनका हालचाल पूछा। अतः नए लोगों को उनकी क्षमता और प्रदर्शन के आधार पर अवसर मिल रहे हैं, लेकिन साथ ही पुराने कार्यकर्ताओं का सम्मान बनाए रखने और उनकी उपेक्षा न होने का प्रयास किया जा रहा है।
















