लंदन। हिंदू सभ्यता और सांस्कृतिक जड़ों पर आधारित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना भारत में 1925 में हुई थी। इस वर्ष यह अपनी शताब्दी मना रहा है। इसके तहत इसकी विदेशी वार्ताओं का दायरा भी बढ़ रहा है। इसी कड़ी में सरसंघचालक श्री मोहन भागवत 2 से 7 सितंबर 2026 तक लंदन के दौरे पर हैं।
आरएसएस की स्थापना भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। उनका मानना था कि स्वतंत्रता मिलने के बाद उसे बनाए रखने के लिए एक मजबूत और एकजुट समाज आवश्यक है। पिछले एक दशक में यह संगठन भारत भर में सामाजिक सेवा में लगे स्वयंसेवकों द्वारा संचालित एक सभ्यतागत आंदोलन के रूप में विकसित हुआ है।
सेवा के सौ वर्ष
पिछले सौ वर्षों में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा (विश्व एक परिवार है) पर आधारित सामुदायिक सेवा की एक संस्कृति विकसित की है। इसके केंद्र में व्यक्तिगत चरित्र-निर्माण की परंपरा है, जिसे संघ व्यापक सामुदायिक शक्ति की नींव मानता है। आरएसएस की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट में भारत भर में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, समाज कल्याण, आत्मनिर्भरता और सामुदायिक जीवन के अन्य क्षेत्रों में 152,000 से अधिक सेवा पहलों का जिक्र है। भारत भर में संघ की 134,000 से अधिक नियमित स्थानीय बैठकें भी होती हैं, जिनमें दैनिक शाखाएं यानी स्थानीय आरएसएस बैठकें, साथ ही साप्ताहिक और मासिक बैठकें शामिल हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण साझी सभ्यतागत संस्कृति, विविधता में एकता और सामाजिक समरसता पर केंद्रित है। इसका कार्य सामाजिक एकजुटता को मजबूत करना है और यह सभी रूपों में विभाजन, कट्टरपंथ और हिंसा का विरोध करता है। अपनी शताब्दी वर्ष के लिए, संगठन ने ऐसे पांच प्राथमिकता वाले बिंदु तय किए हैं जिनसे व्यापक समाज को लाभ होगा: सामाजिक समरसता; पारिवारिक मूल्यों को मजबूत करना; पर्यावरणीय जिम्मेदारी; आत्मनिर्भरता; और नागरिक कर्तव्य।
विस्तार लेता सभ्यतागत संवाद
संघ अपने शताब्दी वर्ष के दौरान, दुनिया भर के समुदायों और संस्थानों के साथ सभ्यतागत संवाद और अपने अनुभव को साझा कर रहा है। इसका एक प्रमुख चरण अप्रैल 2026 में आगे बढ़ाया गया, जब सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका और जर्मनी का दौरा किया। उनकी बैठकों में लंदन में चैथम हाउस, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और हडसन इंस्टीट्यूट, और बर्लिन में अग्रणी जर्मन नीति संस्थान शामिल थे। उन्होंने शिक्षाविदों, संसद सदस्यों, व्यापारिक नेताओं, सामुदायिक प्रतिनिधियों और भारतीय प्रवासियों के साथ चर्चा की। इन वार्ताओं में सभ्यतागत दृष्टिकोण, सामाजिक एकजुटता और समकालीन वैश्विक चुनौतियों के साझी प्रतिक्रियाओं पर चर्चा की गई।
इसके बाद सरसंघचालक श्री मोहन भागवत इस सभ्यतागत संवाद को न्यूयॉर्क से टोरंटो और अब लंदन ले गए हैं। 29 अगस्त को न्यूयॉर्क में, AHEAD (अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग) के निमंत्रण पर, उन्होंने विभिन्न संप्रदायों के 175 प्रतिभागियों की उपस्थिति वाली एक बहु-धार्मिक नेताओं की बैठक को संबोधित किया। उन्होंने मैडिसन स्क्वायर गार्डन में “यूनिवर्सल वननेस” सम्मेलन को भी संबोधित किया, जहां 853 शहरों और 39 अमेरिकी राज्यों के 6,000 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया, जो 250 संगठनों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। संयुक्त राज्य अमेरिका भर के विश्वविद्यालयों के लगभग 250 छात्रों ने भी इस संवाद में भाग लिया। अंतर-धार्मिक नेताओं की बैठक में पांच सूत्रीय “कॉल फॉर एक्शन” प्रस्ताव को अपनाया गया।
इसके बाद डॉ. भागवत CHORD (कैनेडियन हिंदूज फॉर आउटरीच, रिलेशंस एंड डायलॉग) के निमंत्रण पर टोरंटो गए, जहां उन्होंने “हिंदू विश्व बंधु” सम्मेलन को संबोधित किया। इस सभा में कनाडा के सभी दस प्रांतों से 175 संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले 2,000 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
डॉ मोहन भागवत का लंदन दौरा
डॉ. मोहन भागवत शताब्दी दौरे के अंतिम चरण के लिए 2 सितंबर को लंदन पहुंचे। यहां कार्यक्रम का नेतृत्व और समन्वय यूके स्थित संगठन ‘इंटीग्रल’ ने किया है, जो यूके के भीतर और यूके तथा भारत के बीच संवाद, सहयोग और दीर्घकालिक संबंधों को मजबूत करने के लिए नेताओं और समुदायों को एक साथ लाता है। यूके के 115 से अधिक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों ने डॉ. भागवत का स्वागत करने और उनकी यात्रा के दौरान जुड़ाव के व्यापक कार्यक्रम का समर्थन करने में ‘इंटीग्रल’ का साथ दिया है।
अपनी यात्रा के दौरान, डॉ. भागवत धर्म गुरुओं, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और अन्य हस्तियों से मिल रहे हैं। अपने अंतर-धार्मिक जुड़ाव के हिस्से के रूप में, उन्होंने विल्डेसडन में श्री स्वामीनारायण मंदिर और खालसा जथा ब्रिटिश आइल्स गुरुद्वारे का दौरा किया है, और वह लंदन में एक जैन मंदिर का भी दौरा करने वाले हैं।
सामुदायिक नेताओं का स्वागत समारोह और सभ्यतागत संवाद 6 सितंबर 2026 को “सेलिब्रेशन ऑफ वननेस” विषय के तहत आयोजित किया जाएगा। इस कार्यक्रम की शुरुआत ब्रिटेन में 1966 में स्थापित एक हिंदू सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन, हिंदू स्वयंसेवक संघ यूके (HSS UK) द्वारा ‘इंटीग्रल’ के समर्थन से की गई है। यूके भर से 310 से अधिक सामुदायिक संगठनों और संघों के इस उत्सव में भाग लेने की उम्मीद है।
लंदन का यह कार्यक्रम उस संदेश को आगे बढ़ाता है जिसे डॉ. भागवत संयुक्त राज्य अमेरिका से कनाडा होते हुए यूनाइटेड किंगडम तक लेकर आए हैं, जिसमें आरएसएस के निस्वार्थ सेवा और सामाजिक समरसता के अनुभव तथा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ यानी “दुनिया एक परिवार है” के उनके दृष्टिकोण को साझा किया गया है।
















