भुवनेश्वर : ओडिशा के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में श्रावण पूर्णिमा, रक्षा बंधन या गम्हा पूर्णिमा के अवसर पर होने वाले पारंपरिक राखी समारोह की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। श्रावण मास की पूर्णिमा ओडिशा में विशेष धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व रखती है। इस दिन को महाप्रभु बलभद्र के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। महाप्रभु जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और महाप्रभु बलभद्र से जुड़े अनेक विशिष्ट अनुष्ठान इस अवसर को और विशेष बना देते हैं। गम्हा पूर्णिमा के प्रमुख अनुष्ठानों में से एक है देवी सुभद्रा द्वारा अपने दोनों भाइयों, महाप्रभु जगन्नाथ और महाप्रभु बलभद्र को विशेष राखी बांधना। इसके लिए पुरी के दोलमंडप साही में पटरा बिसोई सेवकों द्वारा पारंपरिक विधि से राखियां तैयार की जा रही हैं। राखी निर्माण का काम अब अंतिम चरण में है।
चार पारंपरिक रंगों में तैयार होती हैं विशेष राखियां
मंदिर की परंपरा के अनुसार गम्हा पूर्णिमा के अनुष्ठान में महाप्रभु जगन्नाथ और महाप्रभु बलभद्र को दो-दो विशेष राखियां पहनाई जाती हैं। इन राखियों को चार पारंपरिक रंगों—लाल, पीला, नीला और बैंगनी—में तैयार किया जाता है। महाप्रभु जगन्नाथ को लाल और पीले रंग की राखियां पहनाई जाती हैं, जबकि महाप्रभु बलभद्र को नीले और बैंगनी रंग की राखियों से सजाया जाता है। इन राखियों का निर्माण बाजार में मिलने वाली सामान्य राखियों की तरह नहीं होता। इन्हें श्रीमंदिर से जुड़ी परंपराओं के अनुसार विशेष रूप से तैयार किया जाता है और इनके निर्माण की जिम्मेदारी निर्धारित पटरा बिसोई सेवकों की होती है।
पवित्र ‘बासुंगा पाट’ से बनती हैं राखियां
महाप्रभु जगन्नाथ और उनके भाई-बहन से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों में इस्तेमाल होने वाली विशेष रेशमी सामग्री ‘बासुंगा पाट’ से इन राखियों का निर्माण किया जाता है। मंदिर परंपरा में इस सामग्री का विशेष महत्व है। राखी तैयार करने की प्रक्रिया चितालागी अमावस्या से शुरू होती है और इसे पूरा होने में लगभग 10 से 12 दिन लगते हैं। श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन निर्धारित सेवकों को आवश्यक बासुंगा पाट उपलब्ध कराता है। इसके बाद इस सामग्री को पारंपरिक रंगों में रंगा जाता है। प्राकृतिक रंगों से रंगने के बाद इसे धूप में सुखाया जाता है।
इसके बाद बासुंगा पाट को निर्धारित आकार में काटकर कई गोलाकार परतों में तैयार किया जाता है। राखी को पारंपरिक स्वरूप देने के लिए लकड़ी की कंघी का इस्तेमाल किया जाता है। प्रत्येक मुख्य राखी में पांच परतें होती हैं। राखी से जुड़ी डोरियां भी इसी बासुंगा पाट से तैयार की जाती हैं। महाप्रभु जगन्नाथ और महाप्रभु बलभद्र के लिए चार मुख्य राखियों के अलावा मंदिर से जुड़े पार्श्व देवताओं के लिए 15 छोटी राखियां भी तैयार की जाती हैं।
चार विशेष ‘गुआमाला’ भी तैयार
राखी समारोह के साथ विशेष गुआमाला तैयार करने की परंपरा भी जुड़ी हुई है। सुपारी से बनाई जाने वाली इन पारंपरिक मालाओं का अनुष्ठान में विशेष महत्व है। महाप्रभु जगन्नाथ और महाप्रभु बलभद्र के लिए कुल चार गुआमाला तैयार की जाती हैं। प्रत्येक माला में 54 सुपारियां होती हैं। परंपरा के अनुसार महाप्रभु जगन्नाथ को पीले और लाल रंग की गुआमाला, जबकि महाप्रभु बलभद्र को नीले और बैंगनी रंग की गुआमाला अर्पित की जाती है। राखी और गुआमाला गम्हा पूर्णिमा के अवसर पर दोनों महाप्रभुओं के विशेष श्रृंगार का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं।
तैयार होने के बाद राखियां और गुआमाला गम्हा पूर्णिमा की सुबह श्रीमंदिर लाई जाती हैं। मंदिर प्रशासन की ओर से संदेश प्राप्त होने के बाद सेवक निर्धारित परंपराओं के अनुसार ताड़ के बने पात्रों में इन पवित्र सामग्रियों को लेकर मंदिर पहुंचते हैं।
महाप्रभु बलभद्र का जन्मदिवस
श्रावण पूर्णिमा या गम्हा पूर्णिमा का ओडिशा में विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन को श्रीमंदिर के तीनों प्रमुख देवी-देवताओं में सबसे बड़े भाई महाप्रभु बलभद्र के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार महाप्रभु बलभद्र का जन्म गम्हा पूर्णिमा के दिन श्रवण नक्षत्र और मकर लग्न में हुआ था। उनका प्रमुख अस्त्र हल माना जाता है। इसी कारण उन्हें कृषि परंपरा और कृषक समुदाय से निकटता से जुड़ा देवता माना जाता है।
गम्हा पूर्णिमा का संबंध ओडिशा की कृषि संस्कृति से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। इस अवसर पर किसान परिवार पारंपरिक रूप से अपने लकड़ी के हल और कृषि उपकरणों की पूजा करते हैं तथा अच्छी फसल, समृद्धि और कृषि वर्ष की सफलता के लिए महाप्रभु बलभद्र का आशीर्वाद मांगते हैं।
श्रीमंदिर में विशेष श्रृंगार
गम्हा पूर्णिमा के अवसर पर श्रीमंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान और श्रृंगार किए जाते हैं। रत्नवेदी से जुड़े छह देवी-देवताओं—महाप्रभु जगन्नाथ, महाप्रभु बलभद्र, देवी सुभद्रा, महाप्रभु सुदर्शन, भूदेवी और श्रीदेवी—का पारंपरिक रूप से स्वर्ण आभूषणों से विशेष श्रृंगार किया जाता है। देवी-देवताओं को सुपारी से बनी गुआमाला भी अर्पित की जाती है। इस पूरे अनुष्ठान में देवी सुभद्रा द्वारा अपने दोनों भाइयों को राखी बांधना सबसे विशिष्ट परंपराओं में से एक है। यह भाई-बहन के स्नेह, संरक्षण और पवित्र पारिवारिक संबंध का प्रतीक माना जाता है।
पटरा बिसोई सेवक पीढ़ियों से इस विशेष सेवा से जुड़े रहे हैं। इस वर्ष भी सेवक संतोष कुमार पात्र और उनके पुत्र सहित अन्य सेवक राखी निर्माण में जुटे हुए हैं। सेवकों के लिए महाप्रभु की राखी तैयार करना केवल पारंपरिक या वंशानुगत सेवा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सौभाग्य और भक्ति का अवसर है।
गम्हा पूर्णिमा और ओडिशा की सामरिक परंपरा
गम्हा पूर्णिमा का संबंध ओडिशा की पारंपरिक युद्धकला संस्कृति से भी रहा है। ऐतिहासिक रूप से यह पर्व पाइका परंपरा से जुड़ा रहा है और इस समय के आसपास योद्धाओं द्वारा सामरिक अभ्यास के नए चरण की शुरुआत किए जाने की परंपरा रही है। ओडिशा के कई क्षेत्रों, विशेषकर दक्षिणी जिलों में, महाप्रभु बलभद्र के जन्मदिवस के अवसर पर पारंपरिक ग्रामीण खेल ‘गम्हा डियां’ या ‘गम्हा छलांग ’ भी आयोजित किया जाता है। यह पर्व के धार्मिक स्वरूप के साथ-साथ ओडिशा की लोक एवं शारीरिक संस्कृति को भी प्रदर्शित करता है।
इस पारंपरिक खेल के लिए ग्रामीण युवा पत्थर, रेत, मिट्टी और पुआल आदि की मदद से एक ऊंचा मंच तैयार करते हैं। मंच के दोनों ओर बांस के खंभे लगाए जाते हैं और उनके बीच क्षैतिज रूप से रस्सी बांधी जाती है। इसके बाद प्रतिभागी पारंपरिक छलांग गतिविधि में हिस्सा लेते हैं। इसे शारीरिक क्षमता, फुर्ती और ओडिशा की पारंपरिक युद्धक संस्कृति से जोड़कर देखा जाता है। इस प्रकार गम्हा पूर्णिमा धार्मिक आस्था, कृषि परंपरा, भाई-बहन के पवित्र संबंध और ओडिशा की लोक एवं सामरिक विरासत का अनूठा संगम प्रस्तुत करती है। पुरी श्रीमंदिर में विशेष राखियां, गुआमाला, स्वर्ण श्रृंगार और महाप्रभु बलभद्र के जन्मदिवस से जुड़े अनुष्ठान इस पर्व को विशेष धार्मिक महत्व प्रदान करते हैं।
राखी निर्माण का कार्य अब अंतिम चरण में पहुंच चुका है और पुरी श्रीमंदिर एक बार फिर इस विशिष्ट वार्षिक परंपरा के स्वागत के लिए तैयार है। महाप्रभु जगन्नाथ, महाप्रभु बलभद्र और देवी सुभद्रा से जुड़ी यह परंपरा ओडिशा की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की विशिष्ट पहचान बनी हुई है।

















