मध्य प्रदेश के मुरैना के खड़ियाहार गांव में दो छोटे कमरों के भीतर चल रहे एक मदरसा का दरवाजा खुला तो सामने सिर्फ 35 बच्चे थे।जब रजिस्टर खुला, तो उसमें 448 बच्चों के नाम दर्ज थे। एक ओर कमरे बच्चों से भरे दिखाई दे रहे थे, दूसरी ओर कागजों पर संख्या 12 गुना से भी अधिक थी। सवाल सिर्फ इतना नहीं था कि इतने बच्चों को दो कमरों में पढ़ाया कैसे जाता होगा; बड़ा सवाल यह था कि जो बच्चे कागज पर मौजूद हैं, वे वास्तविकता में कहां हैं?
मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. निवेदिता शर्मा के नेतृत्व में हुए औचक निरीक्षण के दौरान मदरसा ‘आयसा इस्लामिया’ में अनेक खामियां मिलीं। आयोग के अनुसार, रिकॉर्ड में दर्ज बच्चों में करीब 90 प्रतिशत नाम हिंदू बच्चों के थे और इनमें से अधिकांश के मदरसे में नियमित रूप से आने की जानकारी नहीं मिली। निरीक्षण के बाद आयोग के निर्देश पर मदरसा को सील कर दिया गया और उसकी मान्यता निरस्त करने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए गए।

दो कमरे और 448 नाम
आयोग अध्यक्ष डॉ. निवेदिता शर्मा के साथ बीआरसी शिवराज शर्मा, शिक्षा विभाग की सहायक संचालिका वर्षा कोहली तथा बाल कल्याण समिति के सदस्यों सहित अधिकारियों की टीम जब मदरसे पहुंची तो वहां का भौतिक ढांचा किसी बड़े शिक्षण संस्थान जैसा नहीं था।
सिर्फ दो कमरे और आगे छोटा-सा आंगन। निरीक्षण के समय दोनों कमरों में कुल 35 बच्चे, जबकि दर्ज संख्या 448 है। यहीं से निरीक्षण औचक दौरे से बदलकर गंभीर जांच का विषय बन गया। यदि रिकॉर्ड सही है तो इतनी बड़ी संख्या में बच्चों के लिए भवन, शिक्षक, कक्षाएं और अन्य व्यवस्थाएं कहां हैं? और यदि बच्चे नियमित रूप से यहां नहीं आते तो उनके नाम रिकॉर्ड में क्यों दर्ज हैं? आयोग ने अन्य रिकॉर्ड भी मांगे, लेकिन उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों पर भी कई सवाल खड़े हो गए, इसके बाद तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए गए।
इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी अब सरकारी योजनाओं से जुड़ती है। किसी भी पात्र शैक्षणिक संस्था में छात्र संख्या के आधार पर शिक्षकों, पाठ्यपुस्तकों, पोषण संबंधी योजनाओं और अन्य सुविधाओं का प्रावधान प्रभावित होता है। मध्य प्रदेश में नियमों के तहत पात्र मदरसों को भी शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी विभिन्न सरकारी सुविधाएं मिलती हैं। आधुनिक विषयों के शिक्षकों के लिए सहायता, पुस्तकालय एवं शैक्षणिक सामग्री, पाठ्यपुस्तकें तथा पात्र बच्चों के लिए पीएम पोषण जैसी व्यवस्थाएं इसके उदाहरण हैं, इसलिए अब जांच का सबसे अहम प्रश्न यही है कि मदरसे के रिकॉर्ड में दर्ज बच्चों की संख्या के आधार पर कितनी सरकारी सुविधा, अनुदान, राशन अथवा अन्य लाभ लिया जाता रहा होगा?
हिंदू बच्चों के नाम दर्ज होने से बढ़ी गंभीरता
आयोग के मुताबिक, रिकॉर्ड में दर्ज बच्चों में लगभग 90 प्रतिशत हिंदू बच्चे बताए गए। यह तथ्य भी जांच के दायरे में है कि इन बच्चों का वास्तविक शैक्षणिक नामांकन कहां है और मदरसा के रिकॉर्ड में उनके नाम किस आधार पर दर्ज किए गए।
कार्रवाई संस्था पर, असर बच्चों पर नहीं
इस पूरे प्रकरण में आयोग ने एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया है, मदरसा पर कार्रवाई के कारण बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए। आयोग अध्यक्ष डॉ. शर्मा ने कहा है कि सभी बच्चों की वास्तविक स्थिति का सत्यापन कर उन्हें नजदीकी प्राथमिक विद्यालयों में प्रवेश दिलाया जाए।
बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. निवेदिता शर्मा ने इस संबंध में कहा, “मदरसे चलें, दीनी शिक्षा भी दी जाए, लेकिन नियमों के भीतर और बच्चों के हित को केंद्र में रखकर। बच्चों को सुरक्षित, स्वस्थ और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना उनका अधिकार है।जांच के दौरान आयोग के सामने आया कि कुल पंजीकृत 448 (135 हिंदू) बच्चों में से सिर्फ 35 उपस्थित बच्चे मिले। मदरसा संचालक, प्राचार्य आदि कोई भी उपस्थित नहीं था। पढ़ा रहे शिक्षकों में से किसी के पास पर्याप्त शैक्षणिक योग्यता नहीं थी।”
आयोग अध्यक्ष ने बताया, “मदरसा के ऑफिस में गेहूं की बोरियां रखी थी, राष्ट्र ध्वज गरिमापूर्ण स्थिति में नहीं रखा था। मदरसे के संबंध में कोई भी दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। छात्रों का स्कॉलर रजिस्टर, उपस्थिति पंजी, शिक्षकों का रिकॉर्ड, पुलिस सत्यापन, मान्यता के दस्तावेज, मिड डे मील का रिकॉर्ड इत्यादि नहीं मिला। मदरसा सिर्फ दो कक्षों में संचालित है, शौचालय नहीं है, पानी पीने की व्यवस्था नहीं है।1-5 तक की कक्षा के बच्चे एक साथ ओर 6-8 के बच्चे एक साथ बैठे थे। ऐसे ही अन्य खामियों मिलीं।”
उन्होंने कहा, “मप्र राज्य सरकार की नीति स्पष्ट है कि हर बच्चा राज्य के लिए महत्वपूर्ण है, नियमों के तहत जो भी व्यवस्थाएं जहां जैसे उनके हित के लिए संभव हैं वह उन्हें अधिकतम दी जाएं, किंतु फर्जी तरीके से शासन का लाभ बच्चों के नाम पर किसी को भी नहीं लेने दिया जाएगा, इसलिए बाल आयोग को जहां से भी शिकायत मिलती है या उसे जहां संदेह होता है, वह वहां जांच करने पहुंचता है, मुरैना के इस मदरसा को लेकर भी तमाम अनियमितताओं की जानकारी मिली थी। फिलहाल सख्त कार्रवाई करने के लिए उचित निर्णय दे दिए गए हैं।”
मदरसे ही नहीं, छात्रावास में भी खुली लापरवाही
इसी दौरे में आयोग की टीम ने ज्ञानोदय आवासीय छात्रावास का भी निरीक्षण किया। यहां सफाई व्यवस्था खराब मिली और भोजन की गुणवत्ता तथा निर्धारित मीनू के पालन पर सवाल उठे। बच्चों के लिए बनाया गया खेल ऑडिटोरियम बंद मिला। आयोग के अनुसार, उसके ऊपर ताला लगा था, जिससे बच्चे उस सुविधा का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे। निरीक्षण पंजी मांगे जाने पर भी उसे तत्काल उपलब्ध नहीं कराया गया। छात्रावास की खिड़कियां टूटी हुई थीं। बालिकाओं की सुरक्षा को देखते हुए आयोग अध्यक्ष ने इसे गंभीरता से लिया और तत्काल मरम्मत के निर्देश दिए।













