पाञ्चजन्य द्वारा आयोजित ‘सुशासन संवाद राजस्थान’ में राजस्थान के प्रशासन, गुड गवर्नेंस और समग्र विकास से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर सार्थक, गहन और विचारोत्तेजक चर्चा हो रही है। इस विशेष संवाद में शिक्षाविद् श्री के. राम जी, श्री शैलेन्द्र भदौरिया जी और सीनियर जर्नलिस्ट श्री अनुराग पुनेठा जी ने राजस्थान के विकास, प्रशासनिक व्यवस्था और सुशासन से जुड़े विभिन्न अहम मुद्दों पर अपने विचार साझा किए।
एक समय था जब शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की भूमिका को ही सबसे महत्वपूर्ण माना जाता था। लेकिन भारत जैसे विशाल और युवा आबादी वाले देश में केवल सरकारी प्रयासों के माध्यम से हर व्यक्ति तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है। इसी आवश्यकता ने निजी क्षेत्र, सामाजिक संगठनों और विभिन्न संस्थाओं के लिए शिक्षा के क्षेत्र में योगदान की संभावनाएं पैदा कीं। निजी क्षेत्र ने स्कूल शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसे केवल शिक्षा के व्यवसायीकरण के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यदि इसका उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना, नए संस्थान विकसित करना और देश के मानव संसाधन को सक्षम बनाना है, तो यह राष्ट्र निर्माण में निजी क्षेत्र की महत्वपूर्ण भागीदारी है।
शिक्षा से रोजगार और उद्यमिता की ओर
हालांकि, शिक्षा के विस्तार के साथ एक दूसरी चुनौती भी सामने आई है- शिक्षा और रोजगार के बीच का अंतर। आज उच्च शिक्षा में नामांकन बढ़ा है, लेकिन केवल डिग्री प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है। विकसित भारत के निर्माण के लिए युवाओं को केवल नौकरी तलाशने वाला नहीं, बल्कि रोजगार पैदा करने वाला बनाना आवश्यक है। स्टार्टअप, एमएसएमई, इनोवेशन और उद्यमिता को बढ़ावा देना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। नई शिक्षा नीति ने भी इस आवश्यकता को समझते हुए कौशल, नवाचार, व्यावहारिक ज्ञान और उद्यमिता पर जोर दिया है। आज की युवा पीढ़ी के सामने अवसरों का दायरा पहले से कहीं अधिक व्यापक है। इसलिए शैक्षणिक संस्थानों और अभिभावकों की जिम्मेदारी केवल बच्चे को डिग्री दिलाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे ऐसा सोचने और निर्णय लेने में सक्षम बनाना चाहिए कि वह स्वयं अवसर पैदा कर सके। इसी संदर्भ में यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या सरकार को शिक्षा के क्षेत्र में रहना चाहिए? मेरा मानना है कि सरकार की भूमिका समाप्त नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसकी भूमिका का स्वरूप बदलना चाहिए। सरकार को शिक्षा से बाहर होने के बजाय एक नियामक, नीति-निर्माता और समान अवसर सुनिश्चित करने वाली संस्था के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करनी चाहिए। विशेषकर उन वर्गों और क्षेत्रों के लिए, जहां निजी क्षेत्र की पहुंच सीमित है, सरकार की जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए मानक तय करे, पारदर्शिता सुनिश्चित करे, कमजोर वर्गों को अवसर उपलब्ध कराए और निजी तथा सार्वजनिक संस्थानों के लिए ऐसा वातावरण बनाए जिसमें शिक्षा केवल एक सेवा या व्यवसाय न रहकर राष्ट्र निर्माण का माध्यम बने। अंततः शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ऐसी पीढ़ी तैयार करना है जो आत्मनिर्भर हो, रोजगार पैदा कर सके, नवाचार कर सके और देश के विकास में योगदान दे सके। सरकार, निजी क्षेत्र, शैक्षणिक संस्थान और अभिभावक- इन सभी की साझा जिम्मेदारी है कि भारत की युवा शक्ति को विकसित भारत की सबसे बड़ी ताकत में बदला जाए।















