
यह सुंदर और ज्ञानवर्धक श्लोक संस्कृत के पारंपरिक नीति ग्रंथों, सुभाषित संग्रहों और नैतिक वचनों से लिया गया है। इस प्रकार के श्लोक मुख्य रूप से जीवन में कर्म और ज्ञान के बीच के अटूट संबंध को स्थापित करने के लिए विभिन्न आचार्यों और नीति-कारों द्वारा रचे गए हैं।
कर्म रहित ज्ञान पंगु (निरर्थक) ही होता है। न तो उससे कोई वस्तु प्राप्त की जा सकती है और न उससे कोई कार्य ही सिद्ध किया जा सकता है।
ज्ञान और कर्म का समन्वय: यह श्लोक स्पष्ट करता है कि केवल सैद्धांतिक ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है। जब तक उस ज्ञान को आचरण या कर्म में नहीं उतारा जाता, तब तक वह पंगु के समान है।
व्यावहारिक जीवन की महत्ता: पढ़ाई, प्रशिक्षण या अनुभव से प्राप्त ज्ञान का वास्तविक मूल्य तभी है जब उसका उपयोग समाज, कार्यक्षेत्र या व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं को सुलझाने में किया जाए। केवल कोरी किताबें या विचार किसी काम नहीं आते
।
परिणाम की प्राप्ति: बिना कर्म के न तो लक्ष्य प्राप्त होते हैं और न ही कोई सफलता सिद्ध होती है। इसलिए जीवन में ज्ञान के साथ-साथ पुरुषार्थ का होना अनिवार्य है।