
शरजील इमाम (फाइल फोटो)
भारत में कई कथित पोर्टल अपने आप को निष्पक्ष या कहें सेक्युलरिज्म का चैंपियन बताते नहीं थकते, मगर उन पर जब दृष्टि डालते हैं तो पता चलता है कि वहां हिन्दू धर्म, हिन्दू पहचान वाले भारत और भाजपा के प्रति नकारात्मक समाचारों के शायद ही कुछ मिले। ये पोर्टल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उन लोगों के विचार भी लगातार प्रकाशित करते हैं, जो भारत के संविधान के प्रति अपमानजनक होते हैं।
द क्विंट ने सितंबर में शरजील इमाम का एक इंटरव्यू प्रकाशित किया था। इस इंटरव्यू को लेकर उस वर्ग में चर्चा नहीं हुई, जहां सबसे ज्यादा होनी चाहिए थी, जो अपने आप को संविधान बचाने का ठेकेदार मानते हैं।
शरजील इमाम ने इस इंटरव्यू में धर्मनिरपेक्षता को खारिज किया। उसने सेक्युलर फ्रेमवर्क के विषय में लिखा है कि यह हिन्दुत्व फ्रेमवर्क है, जिसमें मुस्लिम, ईसाई, द्रविड, आदिवासी और दलित एवं किसी भी वंचित वर्ग का कोई स्थान नहीं है और सबसे बढ़कर शरजील ने लिखा कि इसका मूल एक है कि और वह है ‘एक प्राचीन भारत के अस्तित्व का मिथक, जो एक था और यहां तक कि जो भी बाहरी आए, वह इसमें आत्मसात हो गए।’ शरजील इमाम ने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की भी आलोचना इस इंटरव्यू में की है।
जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक “भारत एक खोज” की आलोचना करते हुए शरजील इमाम का कहना है कि इस झूठ कि भारत एक प्राचीन सभ्यता है, को बताने का सबसे बड़ा उदाहरण जवाहर लाल नेहरू की लिखी पुस्तक है। मौलाना आजाद का शोध जहां इस बात को नकारता है कि भारत का कभी विचार भी था या भारत में कभी एकता भी थी, और इकबाल और जिन्ना ने भी भारतीय राष्ट्र के विचार को नकारा है तो वहीं इन सबका यही मानना है कि यह उपमहाद्वीप अभी भी राष्ट्र नहीं बना है और भारत के मुसलमान आधुनिक अर्थ में एक राष्ट्र कहे जा सकते हैं।
इसका अर्थ यह है कि शरजील इमाम भारत के प्राचीन अस्तित्व से ही इनकार करता है और जवाहर लाल नेहरू को भी झूठा ठहराने से नहीं हिचकता। उसके अनुसार भारत का जो सेक्युलर ढांचा है, वह सभी भारतीयों को एक मानता है और सभी शैक्षणिक और राजनीतिक विकास इस तरह से किए जाते हैं कि सभी केवल भारतीय हैं और कोई नहीं।
शरजील का मानना है कि ऐसा करके अर्थात भारतीय घोषित करके अल्पसंख्यकों या फिर अन्य वंचित समूहों का दमन किया जाता है। उसके अनुसार यदि धार्मिक अल्पसंख्यक या आदिवासी स्वायत्ता या अपने समुदाय के लिए भूमि का अधिकार मांगते हैं, तो उन्हें “सांप्रदायिक” या “विभाजन करने वाला कहा जाता है?”
शरजील इमाम का यह इंटरव्यू अपने आप में कई प्रश्न खड़े करता है। क्योंकि एक तो भारत में संविधान में सभी को समान अधिकार दिए गए हैं और दूसरे शरजील इमाम ने धर्मनिरपेक्षता को केवल और केवल ऐसा तत्व बताया है, जिसके चलते अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन किया जा सके!
हालांकि उसने ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिया है कि आखिर भारत में धर्मनिरपेक्षता के चलते कैसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन हुआ है। या हो रहा है! क्या शरजील इमाम चाहते हैं कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुसलमानों का ही शासन हो, क्योंकि उनके आदर्श जिन्ना और इकबाल हैं और जिनका यह मानना है कि भारत कभी एक राष्ट्र था ही नहीं।
मगर शरजील इमाम यह जबाव देने में विफल रहते हैं कि यदि इस्लाम ही राष्ट्र की पहचान का दायरा है तो आज इतने सारे इस्लामिक मुल्क क्यों हैं और क्यों वे आपस में ही लड़ रहे हैं?
शरजील खुलकर इस इंटरव्यू में लिखता है कि यह माना जाता है कि विभाजन मुस्लिम लीग का विभाजनकारी एजेंडा था। जबकि असली कारण यह है कि कांग्रेस में ब्राह्मणवादी ताकतों और पूंजीवादी तत्वों ने संसाधनों पर कब्जा करने के लिए विभाजन को स्वीकार किया था। शरजील का कहना है कि संविधान भी कोई बहुत महान नहीं है। इसने भी अल्पसंख्यकों के लिए ठीक नहीं किया है। उसका कहना है कि सेक्युलर ढांचा दरअसल इस्लामोफोबिक और संकीर्ण है।
शरजील इमाम इस इंटरव्यू में जिन्ना को और इकबाल को आदर्श बता रहा है और भारत के उस संविधान का अपमान कर रहा है, जो सभी को समान अधिकार देता है। समस्या उन लोगों की चुप्पी पर भी है, जो दिन रात संविधान हाथ में लेकर संविधान की रक्षा की कसमें खाते रहते हैं।
इतना ही नहीं शरजील इमाम महज इसलिए महात्मा गांधी को 20वीं सदी का सबसे बड़ा फासीवादी बताता है, क्योंकि उन्होंने राम राज्य शब्द का प्रयोग किया था।
दरअसल शरजील इमाम को राम शब्द से ही समस्या है। जिस व्यक्ति के लिए भारत की सभ्यता और इतिहास ही झूठ हो, उससे भारत के प्रति अच्छे विचारों की कामना ही कैसे की जा सकती है?
जरा सोचिए कि उसने उदारवादियों के अस्तित्व को केवल इसलिए नकार दिया है क्योंकि वे हिन्दू हैं। उसका कहना है कि उदारवादी और हिंदूवादी केवल हिन्दू हैं और कोई नहीं।
वह मुसलमानों को उस राजनीतिक ताकत मिलने का हिमायती है, जिसे वह इस जमीन पर अल्लाह की इच्छा लागू करने का अधिकार मानते हैं। शरजील के लिए उसकी मजहबी पहचान संविधान से कहीं बढ़कर है और उसे यही दुख है कि भारत का संविधान भारतीय क्यों बताता है?
यह और भी हैरतअंगेज है कि इस इंटरव्यू में जहां शरजील इमाम ने उदारवादियों को महज उनकी धार्मिक पहचान के चलते केवल हिन्दू होने तक समेट दिया है तो वहीं कथित उदारवादियों ने अपने इस नायक की आलोचना भी नहीं की है कि हमें हिंदूवादियों के साथ क्यों खड़ा किया?
भारत के इतिहास से लेकर भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करने वाले शरजील इमाम को वही तबका पीड़ित बताता है, जो संविधान की रक्षा के लिए लड़ाई का दम भर रहा है। प्रश्न यह उठता है कि आखिर कोई भी काट इसकी क्यों नहीं की गई?
जहां तक शरजील इमाम के गैर मुसलमानों के प्रति विचारों की बात है तो वह उसके उस भाषण से पता चलता है जो उसने सीएए के दौरान अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दिया था। उसने साफ कहा था कि “दिल्ली में हमारी कोशिश यह रही है कि ऐसी भीड़ जुटाई जाए जिसमें गैर-मुस्लिम हमारे साथ मिलकर ‘नारा-ए-तकबीर’ कहें और हमारी शर्तों पर हमारे साथ खड़े हों। अगर वे हमारी शर्तें मानने को तैयार नहीं हैं, तो वे हमारा और हमारी भीड़ का इस्तेमाल कर रहे हैं, जैसा कि वे पिछले 70 सालों से करते आ रहे हैं। अब वह समय आ गया है जब हम गैर-मुसलमानों को यह साफ कर दें कि अगर वे हमारे हमदर्द हैं, तो उन्हें हमारी शर्तों पर हमारे साथ खड़ा होना होगा। अगर वे ऐसा नहीं कर सकते, तो वे हमारे हमदर्द नहीं हैं।”
सोचिए कि शरजील इमाम को समर्थन भी तभी चाहिए, जब गैर मुसलमान समुदाय उनकी शर्तों पर सहमत हो! और बहुत कुछ ऐसा और इससे भी अधिक जहरीला शरजील इमाम ने द क्विंट के उस इंटरव्यू मे कहा है, मगर संविधान के कथित रक्षकों की चुप्पी बहुत कुछ कहती है।