महाराष्ट्र

वंदे मातरम आज भी देता है एकता की प्रेरणा: सरसंघचालक मोहन भागवत

सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि वंदे मातरम बंग भंग के षड्यंत्र को हराने वाला राष्ट्रगीत है। सामाजिक एकता, भारत भक्ति और भारतीय संस्कृति पर उनके पूरे विचार यहाँ पढ़ें।

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कुलदीप सिंह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने सामाजिक एकता पर बल देते हुए कहा है कि आत्मीयता, अनुशासन और राष्ट्रीय ध्येय के प्रति निष्ठा पर टिका समाज सामाजिक एकता प्राप्त करता है और अपराजेय शक्ति भी हासिल करता है। इसी संगठित परंपरा है कि हमारे समाज ने प्राचीन काल में अस्तित्व की एकता के सत्य का साक्षात्कार किया और उसके आधार पर समय-समय पर विश्व को एक अनुपम दृष्टि प्रदान की।

सरसंघचालक जी ने विजयदशमी कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने आगे कहा कि हमें एकता के उन सूत्रों पर टिके रहना चाहिए। यदि हम उन पर टिके रहेंगे, तो कोई संकट हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

उन्होंने वंदे मातरम का जिक्र करते हुए कहा कि जब लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल को विभाजित करना चाहा, तब एक भूमि व एक समाज को सांप्रदायिक आधार पर बांटने का विरोध समाज से डट कर हुआ, ब्रिटिश सत्ता को अपना विभाजन का प्रस्ताव वापस लेना पड़ा। उसी एकता व देशभक्ति के प्रतीक के रूप में उस समय ‘वन्दे मातरम्’ का उदय हुआ। विभाजन का यह दुष्टतापूर्ण खेल हुआ और सीमा पर तथा देश के भीतर स्थायी अशांति, परस्पर अविश्वास, असुरक्षा और छोटे-छोटे कारणों से कलह की परिस्थिति पैदा हो गई। भारत के जो पूर्वी अंग अलग हुए, वहाँ भी यह स्थिति आज तक विद्यमान है।

आज भी एकता की प्रेरणा देता है वंदे मातरम

बंग भंग के विभाजनकारी षड्यंत्र को परास्त करने वाला वन्दे मातरम् आज भी वही एकता की प्रेरणा देने में सशक्त है। वह अपना राष्ट्रगीत है। उसे स्वाभिमान से, उच्च कंठ से तथा संपूर्ण गाने में कोई संकोच या विरोध नहीं होना चाहिए। भारत की मातृभूमि के नाते भक्ति, हमारे समान भारतीय पूर्वजों के जीवन का गौरव व अनुकरण तथा हमारी सनातन भारतीय संस्कृति के वैश्विक मानवीय मूल्यों के अनुसार अपने जीवन को ढालना, यह हम सबको सदा एक रखते आए हैं।

सभी पंथों, प्रांतों, भाषाओं, जातियों और आधुनिकताओं को स्वीकार करने वाला यही आधार है। अपने-अपने छोटे अहंकार, अपने स्वयं की तथा अन्य लोगों की उपासनाओं के बारे में पाले हुए भ्रम तथा विविधता को अलगाव मानने की प्रवृत्ति को हमें त्यागना ही पड़ेगा। भारत भक्ति, पूर्वज गौरव तथा भारतीय संस्कृति के हम सभी को जोड़ने वाले इस त्रि-सूत्र को मन से अपनाते हुए देश के लिए जीने की राह पर बढ़ना होगा।

भारत का वैश्विक दायित्व व हमारे कर्तव्य

जिन समस्याओं के कारण आज विश्व त्रस्त एवं आतंकित है, उनके मूल में जीवन के दृष्टिकोण का अधूरापन है, वरना पुरुषार्थ के मामले में हम भी शेष विश्व से बहुत कुछ सीख सकते हैं। उन बातों को सीखने के साथ-साथ अपनी राष्ट्रीयता का स्पष्ट स्वरूप समझते हुए उसको अंगीकार कर, अपनी एकता व गुणवत्ता को संजोकर, हम संगठित पुरुषार्थ में जुट जाएँ यह आवश्यक है।

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