‘केवल मेरा नज़रिया ही सही है’ – वामपंथी समूहों (जिन्हें अक्सर समाजवादी कहा जाता है), जैसे कि ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA), स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फेडरेशन (DSF) का यह संकीर्ण दृष्टिकोण मुख्य रूप से उनके पक्षपाती विचारों, कैंपस में हिंसक विरोध प्रदर्शनों के तरीकों और शैक्षणिक माहौल पर पड़ने वाले उनके हानिकारक प्रभावों पर केंद्रित होता है।
विश्वविद्यालयों के कामकाज पर इन समूहों के प्रभाव में निम्नलिखित बातें शामिल हैं:
शैक्षणिक गतिविधियों और बुनियादी ढांचे में बाधा: बार-बार कक्षाओं का बहिष्कार, शैक्षणिक हड़तालें, प्रशासन को अनिश्चित काल के लिए घेर लेना, और प्रशासनिक या शैक्षणिक सुविधाओं पर जबरन कब्जा कर लेना – इन सब से नियमित शैक्षणिक कामकाज में रुकावट आती है। इस तरह की बाधाओं के कारण परीक्षाएं टल सकती हैं, शोध कार्य में रुकावट आती है, संस्थान के संसाधनों की बर्बादी होती है, युवाओं के बीच एक नकारात्मक धारणा बनती है, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचता है।
उग्र आंदोलन और विभाजन: इन समूहों द्वारा बढ़ावा दी जाने वाली आक्रामक और विनाशकारी विरोध संस्कृति, अक्सर वैध असहमति से बदलकर टकराव, तोड़फोड़ और राष्ट्रवादी छात्र संगठनों या प्रशासनिक और सुरक्षा कर्मचारियों के साथ हाथापाई तक पहुंच जाती है। ऐसा माहौल कैंपस में तनाव और विभाजन पैदा करता है, जहां वैचारिक मतभेद बहुत जल्दी दुश्मनी में बदल सकते हैं।
संस्थागत अधिकार और प्रशासन का कमजोर होना: विश्वविद्यालयों के चुने हुए नेतृत्व, अनुशासनात्मक समितियों और प्रॉक्टोरियल बोर्डों को लगातार चुनौती देने से वहां की प्रशासनिक व्यवस्था कमजोर होती है। जब छात्र संगठन प्रशासनिक नियमों को चुनौती देते हैं या शिकायतों के समाधान के लिए तय प्रक्रियाओं को नजरअंदाज करते हैं, तो यह एक चिंताजनक मिसाल कायम करता है, जो कैंपस के सुचारू प्रबंधन में बाधा डाल सकती है।
वैचारिक प्रभुत्व और असहिष्णुता: ये समूह अपना वैचारिक नियंत्रण स्थापित करना चाहते हैं। वे अक्सर राष्ट्रवादी या दक्षिणपंथी छात्र संगठनों द्वारा आयोजित वैकल्पिक दृष्टिकोणों, व्याख्यानों या सांस्कृतिक कार्यक्रमों का विरोध करते हैं। इससे एक ऐसा माहौल बनता है, जहाँ ‘प्रगतिशील सक्रियता’ की आड़ में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विचारों की विविधता को दबा दिया जाता है।
उच्च शिक्षा का राजनीतिकरण: बाहरी वैचारिक समूह इन छात्र संगठनों का इस्तेमाल व्यापक राजनीतिक संघर्षों में एक हथियार के रूप में करते हैं। वे इनका उपयोग भारत विरोधी अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए एक साधन के तौर पर करते हैं, ताकि भारत में अशांति फैलाई जा सके, राष्ट्र को कमजोर किया जा सके, और संवैधानिक संस्थाओं, हिंदू संस्कृति तथा राष्ट्रीय विकास के खिलाफ हानिकारक नैरेटिव (विमर्श) फैलाए जा सकें।
कैंपस में हुई ऐसी प्रमुख घटनाएं, जिनमें हिंसा, टकराव या मारपीट के आरोप लगे हैं और जिनके परिणामस्वरूप लोग घायल हुए हैं, उनमें शामिल हैं:
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) हिंसा (जनवरी 2020): नकाबपोश लोगों का एक समूह जेएनयू कैंपस में घुस आया और उसने छात्रों तथा प्राध्यापक मंडल सदस्यों पर हमला कर दिया। जानकारी के अनुसार, छात्रों, शिक्षकों और अध्यक्ष सहित लगभग 30 से 40 लोग घायल हुए। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने दावा किया कि उसके लगभग 25 सदस्य घायल हुए, और कई लोगों का कोई अता-पता नहीं लगा।
जादवपुर विश्वविद्यालय (कोलकाता) में टकराव: जादवपुर विश्वविद्यालय में वामपंथी विचारधारा वाले छात्र संगठनों (जैसे SFI और FETSU) द्वारा आम सभा की बैठकों, वैचारिक कार्यक्रमों और कैंपस में प्रदर्शनों के दौरान अक्सर हिंसा देखी गई है। इन टकरावों में कई बार मारपीट होती है, जिसमें गैर-वामपंथी छात्र घायल हो जाते हैं और उन्हें इलाज की जरूरत पड़ती है।
ABVP के खिलाफ भी बढ़ी हिंसा
पिछले कुछ वर्षों में हैदराबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, विश्व-भारती विश्वविद्यालय और अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय सहित कई परिसरों में ABVP के खिलाफ टकराव, मारपीट और विरोध-प्रदर्शन की घटनाएं सामने आई हैं। हालांकि, इन घटनाओं के बाद अक्सर पुलिस में शिकायत दर्ज होती है, घायलों का मेडिकल रिकॉर्ड बनता है और संस्थान स्तर पर जांच भी होती है, लेकिन मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग का एक बड़ा हिस्सा वामपंथी समूहों के एजेंडे और उनकी आक्रामक कार्यशैली को नजरअंदाज कर देता है। एक नया चलन भी देखने में आया है, जिसमें संघ से जुड़े संगठनों या संस्थानों को फर्जी तस्वीरों या वीडियो के जरिए नकारात्मक रूप में पेश किया जाता है। इसका मकसद आम जनता को यह यकीन दिलाना है कि भाजपा को मिली राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल संघ से जुड़े संगठनों द्वारा हिंसक तरीके से किया जा रहा है।
संघ और भाजपा की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश
हाल ही में संघ से जुड़े संगठनों पर लगे आरोपों में कोलकाता स्थित सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (SRFTI) का मामला भी शामिल है, जहां पिछले कुछ हफ्तों में काफी उथल-पुथल रही है। कैंपस में हिंसा भड़क उठी है और छात्र परिसर की निगरानी कर रहे हैं, इस उम्मीद में कि हालात फिर से सामान्य हो जाएंगे। ये आरोप तब और तेज हो गए जब भाजपा (जिसका नेतृत्व सुवेंदु अधिकारी कर रहे हैं) सत्ता में आई। ऐसा लगता है कि इन आरोपों का मकसद संघ और सुवेंदु अधिकारी, दोनों की छवि को नुकसान पहुंचाना है। पश्चिम बंगाल के परिसरों और राजनीतिक माहौल से वाकिफ लोग—चाहे वह कम्युनिस्ट शासन का दौर हो या ममता बनर्जी का नेतृत्व—उन दमनकारी तरीकों को अच्छी तरह जानते हैं, जिनका इस्तेमाल वामपंथी समूहों ने उन छात्रों और संगठनों के खिलाफ किया जो उनकी कार्यप्रणालियों (जैसे हिंसा, वोट बैंक की राजनीति, और विकास व शिक्षा सुविधाओं की कमी) का विरोध करते थे। अब, अधिकारी की सरकार के तहत, बुद्धिजीवी, मीडिया और छात्र बंगाल के छात्रों के सामने मौजूद गंभीर चुनौतियों पर खुलकर चर्चा कर सकते हैं। सबको पता चलना चाहिए कि वामपंथी संगठनों का असली चेहरा क्या है।
संघ और उससे जुड़े संगठनों के प्रति गहरी शत्रुता का एक उदाहरण
कासरगोड स्थित सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ केरल (CUK) में ‘वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ मनाने के लिए आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के दौरान विरोध-प्रदर्शन और झड़पें हुईं। इस सेमिनार का आयोजन विश्वविद्यालय, साहित्य अकादमी और अखिल भारतीय साहित्य परिषद ने संयुक्त रूप से किया था। इसमें संघ से जुड़े संगठन ‘प्रज्ञा प्रवाह’ के संयोजक जे. नंदकुमार मुख्य वक्ता के रूप में शामिल थे। वामपंथी विचारधारा वाले छात्र समूहों ने उन्हें बुलाए जाने का कड़ा विरोध किया। बड़े पैमाने पर विरोध की आशंका को देखते हुए सुरक्षा बढ़ा दी गई थी और जे. नंदकुमार समय से पहले ही कैंपस पहुंच गए। जब छात्र विरोध करने और कार्यक्रम में बाधा डालने के लिए इकट्ठा हुए, तो तनाव बढ़ गया और स्थिति पुलिस के साथ हाथापाई तक पहुंच गई। इस हंगामे के बाद, विश्वविद्यालय और स्थानीय प्रशासन ने सख्त कदम उठाए; कई छात्रों को निलंबित कर दिया गया और सेमिनार में बाधा डालने वाले लगभग 25 लोगों के खिलाफ औपचारिक मामले दर्ज किए गए। छात्रों के विरोध और बहिष्कार के बावजूद सेमिनार जारी रहा। अंत में केरल के राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर ने भाषण दिया, जिसमें उन्होंने हंगामे की निंदा की और इसके पीछे किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा किया।
यह उन लोगों के प्रति उनके क्रूर रवैये को दर्शाता है जो उनकी विचारधारा से सहमत नहीं हैं, और उनके अमानवीय उद्देश्यों को उजागर करता है। आजकल, वे संघ से जुड़े संगठनों के बारे में मनगढ़ंत बातें फैला रहे हैं ताकि उनकी छवि खराब की जा सके। वास्तव में, इन वामपंथी संगठनों को आत्म-चिंतन करना चाहिए और हमारे महान संविधान को बेहतर ढंग से समझने की कोशिश करनी चाहिए। उन्हें मार्क्स, माओ, लेनिन और स्टालिन की विचारधाराओं—जिन्होंने दुनिया भर में केवल तबाही ही मचाई है—को मानने के बजाय ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की सोच अपनानी चाहिए।
















