
पुस्तक का लोकार्पण करते हुए (बाएं से) श्री मिलिंद ओक, डॉ. गौरी माहुलीकर और डॉ. अंजलि देशपांडे।
गत 9 अक्तूबर को पुणे (महाराष्ट्र) में ‘भारतीय विदुषी आणि लेखिका : सन् 1 ते 1857’ (भारतीय विदुषी और लेखिका : सन् 1 से 1857) पुस्तक के मराठी, हिंदी और अंग्रेजी संस्करणों का लोकार्पण हुआ। लोकार्पणकर्ता चिन्मय विश्वविद्यालय की अधिष्ठाता एवं लेखिका डॉ. गौरी माहुलीकर थीं।
इस अवसर पर विचारक एवं पुस्तक के लेखक श्री मिलिंद ओक और डॉ. अंजलि देशपांडे भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. गौरी माहुलीकर ने कहा कि “बालिकाओं को केवल परिवार का पालन-पोषण, सिलाई-कढ़ाई और बच्चों की परवरिश की शिक्षा दी जानी चाहिए, ऐसा विज्ञापन देने वाली यूरोपीय परंपरा ही ‘चूल्हा-चौका’ के विचारों की उपज थी। इसके विपरीत, भारत में सहस्राब्दियों से महिलाओं की बौद्धिक परंपरा ‘विदुषी’ के रूप में अत्यंत समृद्ध और गौरवशाली रही है।
हमारे पाठ्यक्रम में भारतीय विदुषी महिलाओं के महान इतिहास का अनिवार्य रूप से समावेश होना चाहिए।” पुस्तक के लेखक श्री मिलिंद ओक ने भारत में स्त्री-शिक्षा की जीवंत परंपरा पर प्रकाश डालते हुए कहा, “वात्स्यायन ने महिलाओं के लिए 64 कलाओं के ज्ञान का उल्लेख किया है। इसका सीधा अर्थ यही है कि उस काल में महिलाएं औपचारिक और व्यावहारिक शिक्षा ग्रहण करती थीं।
डॉ. अंजलि देशपांडे ने कहा, “यह पुस्तक हजारों वर्षों की हमारी संस्कृति से उपजा एक आनंददायी और ज्ञानवर्धक पुष्पकुंज है। इसके माध्यम से भारतीय स्त्रियों की दो हजार वर्षों की समृद्ध शिक्षण परंपरा के दर्शन होते हैं। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि अंग्रेजों द्वारा औपचारिक शिक्षा का दावा कितना संकीर्ण था। भारतीय समाज ने कभी भी अपनी स्त्रियों को अभिव्यक्त होने या ज्ञान अर्जित करने से वंचित नहीं किया।” कार्यक्रम का आयोजन ‘दृष्टि स्त्री अध्ययन प्रबोधन केंद्र’ के तत्वावधान में किया गया।