फ्रांस इस समय जल रहा है। शायद ही कोई ऐसा शहर रहा हो, जो इस आग की चपेट में न हो! यह आग क्यों लगी, इसके कारण कई खोजे जाते रहेंगे, मगर इस आगे में जल क्या क्या रहा है, वह देखना और भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि अब वहाँ पर सभ्यता के प्रतीक जल रहे हैं, इतिहास के प्रतीक जल रहे हैं।
फ्रांस में 143 वर्ष पुराना ऐतिहासिक लिमोजी टाउन हाल आग की भीषण लपटों में जलकर राख हो गया। और जब कोई इमारत जल कर राख होती है तो उसका इतिहास भी राख हो जाता है। फ्रांस में लिमोजी टाउन हॉल का भी अपना एक इतिहास था।
कब बना था यह हॉल और क्या था इतिहास?
फ्रांस में वर्ष 1879 में एक इमारत का निर्माण आरंभ हुआ। चूंकि उस शहर का पुराना प्रशासनिक कार्यालय जर्जर हो चुका था, तो शहर के कार्यों का सुचारु प्रबंधन करने के लिए एक नए भवन की आवश्यकता थी और चूंकि वर्ष 1875 में लिमोज के एक धनी जमींदार का निधन हुआ, जिसने निस्संतान होने के चलते अपनी संपत्ति और धन लिमोज शहर की काउंसिल के नाम कर दिया था, तो उसके धन से एक भव्य इमारत के निर्माण का निर्णय लिया गया।
जब इस इमारत की संकल्पना की जा रही थी, तो उसमें मात्र प्रशासनिक कार्य प्राथमिकता पर नहीं थे, बल्कि उसमें लिमोज शहर के इतिहास, कला, गौरव और आर्थिक समृद्धि को भी दिखाने का निर्णय लिया गया। इसके लिए वर्साय के महलों पर काम कर चुके विख्यात वास्तुकार चार्ल्सअल्फ्रेड लेक्लर का नाम सुनिश्चित किया गया और फिर इसका डिजाइन पेरिस के मशहूर टाउन हॉल की प्रेरणा से तैयार किया गया।
इसकी नक्काशी और इसके सामने बने ऐतिहासिक फुव्वारे को देखने के लिए लोग दूर दूर से आते थे। इसमें चीनी मिट्टी और इनेमल कला कृतियों का प्रयोग किया गया था। चार साल की कड़ी मेहनत के बाद 14 जुलाई 1883 को फ्रांस के राष्ट्रीय दिवस पर इसका शुभारंभ किया गया। इस भवन के आधार को ग्रेनाइट के पत्थरों से बनाया गया था। इसमें प्रवेश करते ही भव्य सीढ़ियाँ थीं और इसके कक्षों की दीवारों पर विख्यात चित्रकारों जैसे हेनरी-पॉल मोट्टे, जीन-जोसेफ वीर्ट्स, और अर्बैन बुर्जुआ की मूल और ऐतिहासिक पेंटिंग्स भी लगी थीं।
इस इमारत के लिए सबसे गौरवशाली क्षण वे भी रहे जब यह द्वितीय विश्व युद्ध में नाजी विरोधी “प्रतिरोध” के एक बड़े केंद्र के रूप में उभरा।
यह वही स्थान था जहां पर बेल्जियम की निर्वासित सरकार वर्ष 1940 में बनी थी। मई 1940 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी हमलों से बचते हुए बेल्जियम के प्रधानमंत्री हयूबर्ट पियरलों और उनके मंत्रियों ने लिमोज में शरण ली थी, तो यही टाउन हॉल था जिसे उस सरकार का मुख्यालय बनाया गया था। मगर अब यह इतिहास राख हो चुका है।
यहूदियों को जीवनदान
इतना ही नहीं, द्वितीय विश्व युद्ध के सौरान यह टाउन हॉल यहूदियों को जीवनदान देने के केंद्र के रूप में भी उभरा। टाउन हॉल के वीर प्रशासनिक अधिकारी थे, जैसे कि सुज़ैन रोडी-बोयर (Suzanne Leclere/Rodet-Boyer) और लुसिएन बर्डासे, इन लोगों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए यहूदियों के लिए जाली दस्तावेज बनाए। उन्होनें नाजियों से यहूदियों को बचाने के लिए काउंसिल से आधिकारिक मुहरों को चुराया। उन्होनें हजारों यहूदियों के परिवारों और प्रतिरोध सेनानियों के लिए फर्जी जन्म प्रमाणपत्र, नकली पहचानपत्र और जाली राशनकार्ड तक बनाए थे।
यही नहीं, जब युद्ध समाप्त हो गया था तो इस साहस को सलाम करने के लिए 4 मार्च 1945 को जनरल चार्ल्स डी गॉल स्वयं आए थे।
1975 में ऐतिहासिक स्मारक
इसके इतने ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए फ्रांस की सरकार ने वर्ष 1975 में इसे आधिकारिक रूप से मोनयूमेंट हिस्टॉरिक का दर्जा प्रदान किया था।
17 अक्टूबर 2026 जब राख मे बदल गया यह हॉल
नाजियों के हमलों का सफलतापूर्वक सामना करने के बाद वर्ष 2026 मे अक्टूबर में अंतत: यह भवन लपटों में घिर गया। जरा सोचिए कि जो काम नाजी नहीं कर सके, वह भी तब जब यहाँ पर यहूदियों को बचाने का काम हो रहा था, वह काम कथित छात्रों ने कर दिया है।
कथित छात्र आंदोलन ने फ्रांस में प्रतिरोध के इस इतिहास को मिटा दिया है। स्कूलों मे शिक्षकों की कमी को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब महंगाई के विरोध में प्रदर्शन के रूप मे बदल गया है। इस महंगाई के विरोध में किए जा रहे प्रदर्शन के दौरान 17 अक्टूबर 2026 को हिंसक प्रदर्शनकारियों की एक भीड़ ने लिमोजी शहर के केंद्र पर हमला कर दिया।
रेउटर्स से बात करते हुए लिमोजी के मेयर ने बताया कि कैसे दंगाइयों नें इस भवन की खिड़कियां तोड़ीं और उसके मुख्य द्वार को तोड़ने के लिए एक बैटरिंग रैम का प्रयोग किया। उन्होनें पत्रकारों को बताया कि चूंकि अधिकांश पुलिस फोर्स सड़क पर दंगाइयों से निपटने में लगी हुई थी, इसलिए इस भवन की सुरक्षा के लिए पर्याप्त पुलिस बल नहीं था।
इस हिंसा में इस भवन का केवल पश्चिमी विंग शेष है और बाहरी बहुत बड़ा हिस्सा जल चुका है।
आम लोगों में गुस्सा और दुख
अपने शहर के इतिहास को इस तरह राख बनते देखते हुए आम लोगों में गुस्सा और दुख दोनों ही है। Francoise Faurie नामक महिला ने reuters से बात करते हुए कहा कि “हम किस तरह के देश में रह रहे हैं? हम अपने बच्चों के लिए क्या छोड़कर जा रहे हैं? इस भवन को छूने की क्या आवश्यकता थी। आपकी मांगे हो सकती हैं, आपको प्रदर्शन का अधिकार है, मगर हिंसा का अधिकार नहीं है!”
एक और स्थानीय नागरिक गिल्बर्ट ने कहा कि जिन भी लोगों ने यह किया है, उसका दंड उन्हें मिलना ही चाहिए। लोग कह रहे हैं कि विरोध का अधिकार है और होना भी चाहिए, मगर हिंसा का अधिकार नहीं है।
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guardian से बात करते हुए एक स्थानीय अधिकारी मौरिके बारते ने कहा कि छत नीचे फ्लोर पर गिर चुकी है और दो तिहाई एक्सटीरियर गायब हो चुका है। उसने 143 वर्ष पुराने इस भवन को हुए नुकसान को “catastrophe for heritage. अर्थात धरोहर का विध्वंस कहा।
क्यों हो रही है फ्रांस में हिंसा?
जब ऐतिहासिक इमारतें जलाई जा रही हैं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर क्या कारण है कि इतने बड़े पैमाने पर हिंसा हो रही है? क्या कारण है कि शहर-दर शहर जल रहे है और सड़कों पर विनाश के निशान है? तो इसका उत्तर अभी तो मिलना संभव नहीं लगता क्योंकि शायद इसका उत्तर कोई अभी नहीं है, सिवाय इसके कि फ्रांस को जलाना है।
सितंबर में स्कूलों में शिक्षकों की कमी, आधारभूत सुविधाओं की कमी को लेकर आरंभ हुई यह हिंसा अब कथित महंगाई के विरोध में किए जा रहे प्रदर्शन में बदल गई है। और अब महंगाई का बहाना लेकर भड़की हिंसा ऐतिहासिक इमारतों को जला रही है और सड़कों पर खड़े वाहनों को भी निशाना बनाकर केवल विनाश के निशान छोड़ती जा रही है।











