
संविधान की बात करने वाले प्रदर्शन के दाैरान कानून को ही नहीं मानते
भारत ने विभाजन की कीमत केवल भूभाग खोकर नहीं चुकाई थी। लाखों परिवार उजड़े, हजारों गांवों की सामाजिक संरचना टूट गई और पीढ़ियों को विस्थापन की पीड़ा झेलनी पड़ी। 1947 में जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तानी आक्रमण ने इस त्रासदी को और गहरा किया। मीरपुर, मुजफ्फराबाद, भिंबर और कोटली जैसे नगर हिंसा तथा विनाश के शिकार हुए। पाकिस्तान ने कबायली जत्थों की आड़ में अपने राजनीतिक और सैन्य उद्देश्यों को आगे बढ़ाया। बाद में संयुक्त राष्ट्र के अभिलेखों में भी पाकिस्तानी सेना की उपस्थिति दर्ज हुई। इतिहास का यह अध्याय बताता है कि समाज की आंतरिक दुर्बलता और पड़ोसी की विस्तारवादी महत्वाकांक्षा मिलकर कितनी बड़ी राष्ट्रीय चुनौती बन सकती हैं।
विभाजन से पहले भी राजनीतिक असहमति (उत्पन्न की गई) थी। सामाजिक समस्याएं थीं और अलग-अलग समुदायों की अपनी चिंताएं थीं। किन्तु इनका समाधान खोजने के बजाय जब पहचान के आधार पर पृथक राजनीतिक अधिकारों और भूभाग की मांग ने जोर पकड़ा, तब विभाजनकारी राजनीति को शक्ति मिली। स्वतंत्रता के बाद भी पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में इसी राजनीति का सहारा लिया। राष्ट्रीय एकता के प्रश्न को मजहबी पहचान से जोड़कर आक्रमण और अलगाववाद को वैधता देने का प्रयास किया गया।
आज परिस्थितियां भिन्न हैं, लेकिन इतिहास से सावधान रहने की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई। जाति, क्षेत्र, भाषा और समुदाय की वास्तविक समस्याओं को राजनीतिक लाभ के लिए सामाजिक टकराव में बदलने की प्रवृत्ति खतरनाक है। जनहित के गंभीर विषयों के स्थान पर उत्तेजक नारों, अप्रमाणित आरोपों और संस्थाओं के प्रति अविश्वास को बढ़ावा देने वाली राजनीति लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है। जनता को पहचानना होगा कि कौन उसकी समस्याओं का समाधान चाहता है और कौन समस्याओं को स्थायी राजनीतिक हथियार बनाए रखना चाहता है।
भारत में मतदान व्यवस्था को लेकर विवाद नया नहीं है। 2017 में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों पर गंभीर आरोप लगाए गए। निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों को तकनीकी छेड़छाड़ का दावा निर्धारित शर्तों के अंतर्गत सिद्ध करने का अवसर दिया। तीन जून 2017 की चुनौती में किसी दल ने मशीन से छेड़छाड़ प्रदर्शित नहीं की। 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने मतदान पर्चियों के मिलान का दायरा बढ़ाया। अप्रैल 2024 में सभी पर्चियों के मिलान और मतपत्रों से मतदान कराने की मांग स्वीकार नहीं की गई, लेकिन अतिरिक्त सत्यापन के निर्देश दिए गए।
कुछ इसी तरह का हो-हल्ला मतदाता सूचियाों के गहन पुनरीक्षण का भी है। बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या को नकारना वर्तमान परिस्थितियों में दिन में सूरज को अनदेखा करना है। परंतु इस मुद्दे पर कोई राजनीतिक दल वास्तविक चर्चा ही नहीं करना चाहता। एस आई आर की प्रक्रिया में कुछ शिकायतें या त्रुटियां दिख सकती हैं परंतु अपवादों को उदाहरण की तरह प्रस्तुत करना क्या संवैधानिक लोकतंत्र के लिए अच्छा है!
इन घटनाओं का अर्थ यह नहीं कि चुनाव व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता समाप्त हो गई। इसका अर्थ यह है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं का परीक्षण आरोपों और आशंकाओं के बजाय प्रमाण, पारदर्शिता तथा निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया से होना चाहिए।
आज मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए। लोकतंत्र की पहली शर्त है कि प्रत्येक पात्र नागरिक मतदान कर सके और किसी अपात्र व्यक्ति या घुसपैठियों का नाम सूची में न रहे। मृत व्यक्तियों के नाम, दोहरी प्रविष्टियां और पुराने पते चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं। ऐसी त्रुटियों का राजनीतिक दुरुपयोग मतदाता संख्या और प्रतिनिधित्व को विकृत कर सकता है। दूसरी ओर किसी जीवित, पात्र नागरिक का नाम गलत ढंग से हटना उसके अधिकार पर गंभीर आघात है।
मई 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण कराने की निर्वाचन आयोग की वैधानिक शक्ति को स्वीकार किया। साथ ही उचित प्रक्रिया, सुनवाई और त्रुटियों के सुधार का महत्व भी स्पष्ट किया। अक्तूबर में संशोधित प्रपत्र छह की वैधता पर न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उस पर अभी निर्णय नहीं हुआ है। 15 अक्तूबर को विपक्षी नेताओं की याचिका पर आयोग से जवाब भी मांगा गया। इसलिए पुनरीक्षण को स्वतः षड्यंत्र घोषित करना और उसकी हर प्रक्रिया को प्रश्नों से परे मान लेना, दोनों अनुचित हैं।
मतदाता सूची की शुद्धता केवल निर्वाचन आयोग का दायित्व नहीं है। राजनीतिक दलों, मतदान केंद्र स्तर के प्रतिनिधियों और नागरिकों को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। प्रत्येक हटाई गई प्रविष्टि का कारण स्पष्ट हो, पात्र व्यक्ति को सूचना मिले, सुधार का अवसर उपलब्ध हो और शिकायतों का समयबद्ध निपटारा हो। यह व्यवस्था जितनी पारदर्शी होगी, राजनीतिक दुष्प्रचार की गुंजाइश उतनी कम होगी।
भारत को आज ऐसा जनमत चाहिए जो इतिहास के घावों को समझता हो, लेकिन वर्तमान का निर्णय केवल भावनाओं से न करता हो। जो राष्ट्रीय एकता और नागरिक अधिकारों को परस्पर विरोधी न माने। जो सामाजिक समरसता, सीमा सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और विकसित भारत के लक्ष्य पर राजनीतिक दलों को परखे।
1947 का सबक किसी असहमति को देश-विरोध घोषित करना नहीं, बल्कि विभाजनकारी राजनीति के परिणामों को पहचानना है। भविष्य का भारत तभी सुरक्षित और समर्थ बनेगा, जब नागरिक जागरूक होंगे, संस्थाएं उत्तरदायी रहेंगी और जनमत नारों के बजाय तथ्यों पर निर्णय करेगा। राष्ट्रीय एकता की सबसे मजबूत रक्षा विवेकशील समाज और विश्वसनीय लोकतंत्र ही कर सकते हैं।
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