
प्रशिक्षण के दौरान संघ के स्वयंसेवक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में विजयादशमी के पावन अवसर पर हुई थी। संघ के लिए यह पर्व केवल स्थापना की वर्षगाँठ नहीं, बल्कि शक्ति की उपासना, समाज जागरण और राष्ट्र को परम वैभव पर पहुँचाने के संकल्प का प्रतीक है। यही कारण है कि संघ स्थापना दिवस के बजाय विजयादशमी उत्सव मनाता है। 27 सितंबर 1925 का दिन संघ की स्थापना से जुड़ी ऐतिहासिक तिथि के रूप में विशेष महत्त्व रखता है।
संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का विचार था कि संघ की स्थापना केवल वर्षगाँठ मनाने के लिए नहीं, बल्कि शक्ति की उपासना और राष्ट्र के पुनर्निर्माण के उद्देश्य से की गई है। उस समय ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की पराधीनता और समाज की चुनौतियों को देखते हुए भारत माता को परम वैभव पर पहुँचाने का संकल्प सामने रखा गया। संघ की स्थापना के तीन वर्ष बाद व्यास पूर्णिमा के दिन भगवा ध्वज को गुरु मानने का निर्णय किया गया। संघ की विचारधारा में भगवा ध्वज का विशेष महत्त्व है। इसका उद्देश्य स्वयंसेवकों को आदर्शों, त्याग, अनुशासन और कर्तव्य के प्रति प्रेरित करना है।
विजयादशमी का पर्व अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देता है। अहंकार को अधर्म का मूल और सर्वनाश का कारण माना गया है। इसलिए समाज में सज्जन शक्ति को बढ़ाना, लोगों को जागृत करना और सामाजिक एकता को मजबूत करना संघ के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है। संघ के शताब्दी वर्ष में कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता एवं सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण की भारतीय दृष्टि, स्वदेशी जीवनशैली तथा नागरिक कर्तव्यबोध जैसे पाँच विषयों पर विशेष जोर दिया गया है। संघ का लक्ष्य केवल संगठन का विस्तार करना नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण करना है। वह समाज में आत्मविश्वास, सहकारिता और आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर बल देता है। इस प्रकार, विजयादशमी उत्सव संघ के लिए शक्ति की उपासना, समाज के प्रति कर्तव्य और भारत को परम वैभव पर पहुँचाने के संकल्प का प्रतीक है। यह अवसर स्वयंसेवकों को राष्ट्रसेवा, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना के प्रति अपने दायित्वों का स्मरण कराता है।