
वीर सावरकर
भारत का अपना राष्ट्रध्वज होना चाहिए, यह संकल्पना सावरकर के मन में आरंभिक काल से ही थी। 1907 में उन्होंने हेमचंद्र दास तथा मैडम कामा की सहायता से स्वतंत्र भारत के पहले तिरंगे ध्वज की परिकल्पना और निर्मिति में योगदान दिया। 1928 में उन्होंने हिंदू राष्ट्र के ध्वज की संकल्पना प्रस्तुत की। वर्तमान राष्ट्रध्वज में धर्मचक्र के समावेश की कल्पना भी उन्होंने लगभग बीस वर्ष पहले ही रख दी थी।
इंडिया हाउस में सावरकर का प्रयास था कि भारतीय स्वतंत्रता की आकांक्षा यूरोप, अमेरिका और विश्व तक पहुंचे। वे अनेक लेख जर्मन, फ्रेंच, आयरिश आदि भाषाओं में प्रकाशित करवाते थे। इसी बीच स्टुटगार्ट में होने वाली अंतरराष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस के अधिवेशन का निमंत्रण मैडम कामा और सरदार सिंह राणा को मिला। उन्होंने यह जानकारी सावरकर को दी। सावरकर ने प्रो. हिंडमन की सोशल डेमोक्रेटिक फेडरेशन के माध्यम से प्रस्ताव रखने की समस्या सुलझाई और मुख्य प्रस्ताव तैयार किया। तभी ध्यान में आया कि वहां फहराने के लिए भारत का अपना राष्ट्रध्वज नहीं था।
सावरकर के साथ हेमचंद्र दास कानुंगो थे। उन्होंने सचिंद्र प्रसाद बोस के साथ मिलकर 7 अगस्त 1906 को कोलकाता में एक त्रिकोणी ध्वज फहराया था, जो हरी, लाल और पीली पट्टियों का था और उस पर देवनागरी में ‘वंदे मातरम्’ लिखा था। सावरकर ने उसमें प्रांतों के प्रतीक कमल-पुष्प, निचली पट्टी पर सूर्य-चंद्र तथा आयताकार आकार का सुझाव देकर उसे परिष्कृत किया। चित्रकार हेमचंद्र दास ने इसे चित्रित किया।
अभिनव भारत के समापन समारोह में सावरकर ने इसका श्रेय हेमचंद्र दास और मैडम कामा को देते हुए कहा था-“लंदन में अभिनव भारत की चर्चाओं में भारत का ध्वज कैसा हो, इस पर चर्चा होती थी। उसके आधार पर एक स्वरूप निश्चित कर, हेमचंद्र दास ने तत्काल एक सुंदर ध्वज बनवाया।” (समग्र सावरकर साहित्य, खंड 8, ‘अभिनव भारत सांगता समारोह व्याख्यान’, पृ. 36) इस परिषद में प्रस्ताव के तुरंत बाद मैडम कामा ने जो तिरंगा छिपाकर लाया था, उसे फहराया और कहा-“यह हिंदुस्थान की स्वतंत्रता का ध्वज है। देखो; देखो! अभी उसका जन्म हुआ है। सम्माननीय सदस्यों, उठो! इस ध्वज को प्रणाम करो!” उनके आह्वान पर पूरी सभा ध्वज को प्रणाम करने के लिए खड़ी हो गई।
परिषद में लगभग 900 प्रतिनिधि थे-रूस के लेनिन, जर्मनी के बीकेल, लिबक्नेख्त व लुक्झेंबुर्ग, हॉलैंड के फॉन कोल, फ्रांस के जीन जॉरेस व विलाँ तथा इंग्लैंड के हिंडमन और पेरे क्यूरिन। इंग्लैंड के भावी प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड मैडम कामा को प्रस्ताव रखते देखकर परिषद छोड़ गए।इससे पहले 1904 में भगिनी निवेदिता ने लाल-पीले रंग का ध्वज बनाया था, जिस पर इंद्र का वज्र और बांग्ला में ‘वंदे मातरम्’ लिखा था। फिर भी हेमचंद्र दास-सचिंद्र प्रसाद बोस द्वारा निर्मित, सावरकर द्वारा परिष्कृत और मैडम कामा द्वारा विदेश में फहराया गया ध्वज ऐतिहासिक स्थान का अधिकारी बना।
इसके बाद जब मैडम कामा की नेहरू से भेंट हुई तो उन्होंने इस ध्वज की एक प्रति उन्हें दी। 22 जुलाई 1947 को ध्वज समिति द्वारा राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार किए जाने के दिन पं. नेहरू ने मैडम कामा और पूर्ववर्ती ध्वज का अत्यंत संक्षिप्त उल्लेख किया था, ऐसा माना जाता है। उल्लेख इतना अस्पष्ट है कि निश्चित निष्कर्ष कठिन है। बाद में प्रधानमंत्री संग्रहालय में इसे प्रथम ध्वज के रूप में स्थान मिला।
इतिहासकार और लेखक धनंजय कीर, विचक्षण चरित्रकार वि. श्री. जोशी तथा आधुनिक चरित्रकार विक्रम संपत इस ध्वज की परिकल्पना का श्रेय पूर्णतः वीर सावरकर को देते हैं तथा हेमचंद्र दास का नाम तक नहीं लेते। धनंजय कीर को लगता है कि यह कल्पना अचानक सावरकर के मन में आई। वि. श्री. जोशी भी कल्पना का बीज तथा ध्वज-निर्माण का श्रेय सावरकर को देते हुए इसके निर्माण के लिए परिश्रम करने का श्रेय मैडम कामा और भानुमती श्यामजी को देते हैं।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इतनी बड़ी उपलब्धि के बाद भी मैडम कामा ध्वज की निर्मिति का श्रेय वीर सावरकर को देते हुए नवंबर 1910 में प्रकाशित ‘Message to the People of India’ में लिखती हैं-“This flag of Bande Mataram … was made for me by a noble selfless young man, who is standing at the bar of so-called court of justice…” (Freedom Movement in India, Vol. 2, p. 525; क्रांतिकल्लोळ, वि. श्री. जोशी, पृ. 163) ध्वज सावरकर-निर्मित होने की व्यापक प्रसिद्धि के बावजूद सावरकर स्वयं उसकी परिकल्पना और निर्मिति का श्रेय हेमचंद्र दास तथा मैडम कामा को देते हैं। हेमचंद्र दास कानुंगो ने 1928 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘बांग्लाई विप्लव-प्रचेष्टा’ में इस नए ध्वज की साज-सज्जा का श्रेय स्वयं की ओर न लेते हुए पूरा श्रेय संगठन को दिया है। यह तीनों की राष्ट्रसेवा और श्रेय के प्रति उदासीनता को रेखांकित करता है।
हिंदुओं के अनेक ध्वज थे और हैं-मराठों का भगवा ध्वज, राजपूतों के अनेक केसरिया ध्वज, गोरखाओं का सूर्य-चंद्रांकित ध्वज तथा सिख, जैन, बौद्ध, लिंगायत, शैव और वैष्णव परंपराओं के अपने-अपने ध्वज। सावरकर का मानना था कि ये सभी पूजनीय रहें, किंतु उनका क्षेत्र मर्यादित हो; समस्त हिंदू राष्ट्र का एक प्रतिनिधि ध्वज भी होना चाहिए। इसी पर उन्होंने 1928 में तीन महत्त्वपूर्ण लेख लिखे। उनके अनुसार वैदिक, सिख, बौद्ध, जैन, आस्तिक, नास्तिक, मराठा, राजपूत, गोरखा-सभी का प्रतिनिधित्व करने वाला और सबको एक सूत्र में पिरोने वाला हिंदू ध्वज होना चाहिए। उसमें हिंदू राष्ट्र के सर्वोत्तम प्रतीक हों, जो श्रेयस और निःश्रेयस का संदेश दें। इसी विचार से उन्होंने ‘अभिनव हिंदू ध्वज’ की संकल्पना प्रस्तुत की।
इस ध्वज में स्वस्तिक का समावेश कर 1929 में सूरत में आयोजित हिंदू महासभा के अधिवेशन में इसे अध्यक्ष श्री रामानंद चटर्जी द्वारा फहराया गया। इसके बाद यह हिंदू महासभा का राष्ट्रीय ध्वज बना और सावरकर इसे अखंड भारत का ध्वज कहते थे।
‘स्वतंत्र हिंदुस्थान का राष्ट्रीय ध्वज’ (स्फुट लेख, पृ. 197) में सावरकर ने कांग्रेस के तिरंगे को राष्ट्रध्वज के रूप में स्वीकार किया था।
उन्होंने लाल, हरे और सफेद तीनों रंगों को ध्येयदर्शी कहते हुए स्वीकार किया था। उनकी आपत्ति केवल चरखे को लेकर थी। उनका मानना था कि चरखा भारत की संस्कृति, प्रगति और प्रवृत्ति का सर्वोच्च प्रतीक नहीं है। हल, हथौड़ा या दरांती प्रतीक हो सकते हैं, किंतु राष्ट्रध्वज पर सर्वोच्च राष्ट्रीय प्रतीक होना चाहिए। इसलिए उन्होंने बुद्ध के धर्मचक्र अर्थात अशोकचक्र, कमल, अश्वत्थ या कुंडलिनी जैसे प्रतीकों का सुझाव दिया। कोई चिह्न न होने पर भी वे उसे स्वीकार्य मानते थे। अंत में उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल सुझाव है, आग्रह या हठधर्मिता नहीं।
गांधी और कांग्रेस तिरंगे तथा उसके मध्य चरखे को लेकर दृढ़ थे। इसी बीच 6 जुलाई 1947 को सावरकर ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल, डॉ. आंबेडकर तथा डॉ. ना. भा. खरे को तार भेजकर मांग रखी कि ध्वज या तो भगवा हो अथवा उसमें भगवे रंग की एक पट्टी हो तथा चरखे के स्थान पर धर्मचक्र, अर्थात अशोकचक्र, रखा जाए। 22 जुलाई 1947 को ध्वज समिति ने चरखे के स्थान पर धर्मचक्र को स्वीकार किया। इस प्रकार उनकी दीर्घकालीन कल्पना को राष्ट्रीय ध्वज में स्थान मिला ।