धर्म-संस्कृति

आज का श्लोक : मनुष्य के जीवन की दशा और दिशा

सुभाषितम् में पढ़ें आज का श्लोक

Published by
Panchjanya

यह अत्यंत सुंदर और गहन दार्शनिक श्लोक महाभारत (शान्तिपर्व) तथा गरुड़ पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में विभिन्न संदर्भों के साथ प्राप्त होता है (इसे श्रीमद्भगवद्गीता की वैचारिक परंपरा का विस्तार भी माना जाता है)।

श्लोक :

कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव हि लीयते।
सुखं दुःखं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते।।

भावार्थ :

‘कर्म’ से ही व्यक्ति का जन्म होता है तथा ‘कर्म’ से ही उसका लय (मोक्ष) होता है। सुख, दुःख, भय, क्षेम, (कल्याण) ये सभी मनुष्य कर्म से प्राप्त करता है।

आज के युग में प्रासंगिकता :

वर्तमान समय में जहां व्यक्ति शॉर्टकट (अल्पमार्ग), भौतिकता और भाग्यवादी सोच पर अधिक निर्भर होता जा रहा है, वहाँ यह श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है:

कर्म प्रधान जीवन: यह श्लोक स्पष्ट करता है कि मनुष्य के जीवन की दशा और दिशा किसी भाग्य या संयोग से नहीं, बल्कि उसके अपने कर्मों से तय होती है। आज के कॉर्पोरेट से भरे युग में यह हमें याद दिलाता है कि सफलता या असफलता का वास्तविक उत्तरदायित्व हमारे प्रयासों (कर्म) पर है।

मानसिक शांति और उत्तरदायित्व: जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि उसके सुख, दुःख, भय और कल्याण (क्षेम) का कारण स्वयं उसके कर्म हैं, तो वह दूसरों को दोष देने के बजाय अपने आचरण में सुधार करने की प्रेरणा पाता है।

नैतिकता और सामाजिक कल्याण: यह श्लोक कर्म की महत्ता बताते हुए यह भी सिखाता है कि हमारे अच्छे कर्म समाज में सुरक्षा और कल्याण (क्षेम) लाते हैं, जबकि बुरे कर्म भय और दुखों को जन्म देते हैं। अतः आधुनिक समाज में नैतिक और उत्तरदायी आचरण के लिए यह एक मार्गदर्शक सूत्र है।

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