पर्यावरण

जल की हर बूंद में भारत का भविष्य

जल अब केवल जीवन की जरूरत नहीं, कृषि, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा की धुरी है। जलवायु संकट के बीच भारत को समाधान के लिए परियोजनाओं से आगे बढ़कर तकनीक, परंपरा, जनभागीदारी और दूरदर्शी जल-शासन को एक साथ साधना होगा। यही जल-सुरक्षित भविष्य की राह है

Published by
नागार्जुन

जल अब केवल जीवन की जरूरत नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन चुका है। जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित वर्षा, शहरीकरण, भूजल दोहन और बढ़ती बाढ़-सूखे की घटनाओं ने चुनौती और गंभीर कर दी है। भारत में कहीं बाढ़ तो कहीं जल-संकट, कहीं गिरता भूजल तो कहीं प्रदूषित नदियां इस संकट की तस्वीर दिखाती हैं।

इसी पृष्ठभूमि में 22–26 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में नौवां इंडिया इंटरनेशनल वाटर वीक आयोजित हुआ। ‘जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन’ विषय पर केंद्रित इस आयोजन का उद्घाटन उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने किया। जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटील समेत देश-विदेश के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। मुख्य आयोजन चार दिन चला, जबकि अंतिम दिन प्रतिभागियों और विशेषज्ञों के लिए जल प्रबंधन परियोजनाओं के अध्ययन हेते एक दिवसीय भ्रमण आयोजित किया गया। मुख्य आयोजन में 7,224 प्रतिनिधि, 227 प्रदर्शक और 119 शोधपत्र शामिल हुए। नीदरलैंड और जर्मनी सहयोगी देश रहे तथा 14 राज्यों-केंद्रशासित प्रदेशों की भागीदारी रही। संदेश स्पष्ट था—जल सुरक्षा ही जन सुरक्षा और राष्ट्र सुरक्षा का आधार है।

पानी का संकट, समाधान की नई भाषा

इंडिया इंटरनेशनल वाटर वीक में विमर्श बांध, नहर और पाइपलाइन से आगे बढ़कर जलवायु परिवर्तन, एआई, डेटा, वित्त, पुनर्चक्रण, भूजल, पारंपरिक ज्ञान और जनभागीदारी तक पहुंचा। उद्घाटन दिवस पर सस्टेनेबल अर्बन रिवर मैनेजमेंट फ्रेमवर्क और एआई-मशीन लर्निंग आधारित जलाशय तलछट प्रबंधन जैसी पहलें सामने आईं। जलाशयों में गाद उनकी भंडारण क्षमता घटाती है, जिसका असर सिंचाई, पेयजल और बाढ़ प्रबंधन पर पड़ता है। जल-खाद्य-ऊर्जा के परस्पर संबंध पर भी जोर दिया गया।

दूसरे दिन चर्चा के केंद्र में गांव, पंचायत और स्थानीय समुदाय रहे। नीदरलैंड के नेतृत्व वाले सत्र में ग्रे-वॉटर के विकेंद्रीकृत उपचार और पुन: उपयोग पर जोर हुए स्पष्ट किया गया कि हर क्षेत्र के लिए एक जैसा जल-मॉडल संभव नहीं। राजस्थान, बिहार, सिक्किम, आंध्र प्रदेश और बुंदेलखंड की अलग भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार स्थानीय समाधान जरूरी हैं। ग्रे-वॉटर प्रबंधन को ग्राम पंचायत विकास योजनाओं से जोड़ने और समुदाय को संचालन में भागीदार बनाने पर भी बल दिया गया। दूसरे अंतरराष्ट्रीय वॉश (जल, स्वच्छता और स्वास्थ्य) सम्मेलन में छह तकनीकी सत्रों में 25 शोधपत्र प्रस्तुत हुए। एआई, डिजिटल तकनीक, जल गुणवत्ता, जलवायु-सहिष्णुता, वित्त और संस्थागत सुधार पर चर्चा हुई। तकनीक जल-प्रबंधन को सक्षम बना सकती है, लेकिन उसकी स्थिरता ग्राम पंचायतों, पानी समितियों और स्थानीय समुदाय की भागीदारी से ही सुनिश्चित होगी।

पानी के लिए तकनीक भी चाहिए, पैसा भी

तीसरे दिन विमर्श का केंद्र जलवायु जोखिम और जल-वित्त रहा। जलवायु जोखिम आकलन, बहु-आपदा पूर्व चेतावनी, हिमनद झीलों की निगरानी, जल उपयोग दक्षता, जल मूल्य निर्धारण और निजी निवेश पर चर्चा हुई। विश्व बैंक के सहयोग से जल क्षेत्र में निजी पूंजी जुटाने तथा शहरी जल, अपशिष्ट जल और सिंचाई के लिए नए वित्तीय मॉडल की जरूरत रेखांकित की गई। साथ ही, जल तक समान पहुंच सुनिश्चित करने के अलावा स्मार्ट मीटरिंग, डिजिटल निगरानी, सूक्ष्म सिंचाई और मिट्टी की नमी आधारित सिंचाई को भी जल-दक्षता का महत्वपूर्ण उपाय बताया गया।

इंडिया इंटरनेशनल वाटर वीक में ‘जल-संस्कृति एवं हरित मार्ग’ सत्र को संबोधित करते डॉ. मुरली मनोहर जोशी

परंपरा में छिपा भविष्य का जल-ज्ञान

24 सितंबर को इंडियन सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी नेटवर्क और पर्यावरण संरक्षण गतिविधि के ‘जल-संस्कृति एवं हरित मार्ग’ सत्र में आधुनिक जल विज्ञान और पारंपरिक जल-दृष्टि के समन्वय पर जोर रहा। पद्म विभूषण डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने प्रकृति के संतुलन के साथ विकास की आवश्यकता रेखांकित की। बावड़ियां, कुएं, तालाब, जोहड़ और आहर-पाइन जैसी प्रणालियां केवल पुराने ढांचे नहीं, बल्कि स्थानीय वर्षा, भूगोल, मिट्टी और कृषि की समझ से विकसित ज्ञान-परंपराएं हैं। सत्र में विशेषज्ञों ने स्थानी स्तर पर वर्षाजल संचयन, पारंपरिक जल-संरचनाओं के पुनर्जीवन और ‘खेत में मेड़, मेड़ पर पेड़’ जैसे सामुदायिक मॉडलों पर अनुभव साझा किए। संदेश स्पष्ट था—जल का भविष्य खोजने के लिए भारत को अपनी जल-स्मृति छोड़ने नहीं, उसे आधुनिक विज्ञान से जोड़ने की जरूरत है।

तकनीकी सत्रों में ‘हिम झील नेत्र’, राष्ट्रीय बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली, ब्रह्मपुत्र क्षरण मॉडलिंग और बांध सुरक्षा के भू-भौतिकीय अध्ययन सामने आए। हिमनद झीलों की निगरानी और पूर्व चेतावनी से आपदा जोखिम घटाया जा सकता है, जबकि नदी क्षरण की वैज्ञानिक मॉडलिंग प्रभावित क्षेत्रों की समय रहते पहचान में मदद करती है। यानी भविष्य का जल प्रबंधन आपदा के बाद प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर पहले से चेतावनी और तैयारी पर आधारित होगा।

जल सहयोग का नया अध्याय

24 सितंबर को भारत और नीदरलैंड के बीच दो त्रिपक्षीय समझौते हुए। पहला केंद्रीय जल आयोग, गुजरात के कल्पसर विभाग और नीदरलैंड की डेल्टारेस के बीच तकनीकी सहयोग से जुड़ा था, जबकि दूसरा केंद्रीय जल आयोग, कल्पसर विभाग और टीयू डेल्फ्ट के बीच प्रशिक्षण व क्षमता निर्माण पर केंद्रित रहा। इससे नीदरलैंड के बाढ़, तटीय और जल-इंजीनियरिंग अनुभव को भारत की स्थानीय जरूरतों से जोड़ने की संभावना बनी है।

इसी दिन भारत-अफ्रीका वॉश गोलमेज में 22 अफ्रीकी देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। चर्चा में जल, स्वच्छता और जलवायु चुनौतियों पर ज्ञान-विनिमय, क्षमता निर्माण, डिजिटल ढांचे और समुदाय आधारित जल सेवाओं में सहयोग पर जोर दिया गया। यह दक्षिण-दक्षिण सहयोग की संभावनाओं को रेखांकित करता है।

अब रिपोर्ट नहीं, परिणाम चाहिए

25 सितंबर को केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटील की अध्यक्षता में मुख्य आयोजन का समापन हुआ। जोर इस बात पर रहा कि सिफारिशें दस्तावेजों तक सीमित न रहें, बल्कि जमीन पर लागू हों और उनके परिणाम मापे जाएं। ‘वॉटर ऐज वन डेटा’ के तहत भूजल, वर्षा, सिंचाई, जलापूर्ति, बाढ़ और जल गुणवत्ता के आंकड़ों को एकीकृत करने पर बल दिया गया। ‘सुजलम भारत’ जैसी डिजिटल पहलों से जल सेवाओं, स्रोत सुरक्षा, रिसाव और गुणवत्ता की निगरानी मजबूत हो सकती है। साथ ही बहु-आपदा पूर्व चेतावनी, नदी-बेसिन आधारित जलवायु योजना, जल-दक्षता, गाद प्रबंधन, जलभृत मानचित्रण, पर्यावरणीय प्रवाह और नए वित्तीय मॉडल को आगे बढ़ाने की जरूरत रेखांकित हुई।

समापन समारोह में कई महत्वपूर्ण रिपोर्ट और दस्तावेज जारी किए गए। इनमें प्रमुख एवं मध्यम सिंचाई परियोजनाओं की पहली जनगणना, सातवीं लघु सिंचाई जनगणना, जल निकायों की दूसरी जनगणना, झरनों की पहली जनगणना, केंद्रीय जल आयोग का इलेक्ट्रॉनिक सिंचाई एटलस और नदीय स्थूल प्लास्टिक निगरानी प्रोटोकॉल शामिल रहे। इनका महत्व इसलिए है कि प्रभावी जल नीति अनुमान नहीं, विश्वसनीय आंकड़ों पर टिकती है। जल निकायों, सिंचाई ढांचे, झरनों और जल उपलब्धता की सटीक जानकारी बेहतर योजना का आधार बनेगी।

नल से आगे की कहानी

जल जीवन मिशन की असली कसौटी केवल नल कनेक्शन नहीं, बल्कि नियमित, पर्याप्त, सुरक्षित और टिकाऊ जलापूर्ति है। पाइपलाइन बिछाना शुरुआत है। उसके संचालन, मरम्मत, जल गुणवत्ता और स्रोत की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय संस्थाओं को निभानी होगी। सत्र में मध्य प्रदेश के 2026 के संचालन-रखरखाव नियमों, गुजरात -बिहार के अनुभवों में ग्राम पंचायतों और समुदाय की भूमिका, पारदर्शी शुल्क व्यवस्था तथा डिजिटल निगरानी के महत्व को रेखांकित किया गया। यानी मिशन का भविष्य पाइपलाइन की लंबाई में नहीं, जल सेवा की निरंतरता में है।
इंडिया इंटरनेशनल वाटर वीक ने दिशा दिखाई है, लेकिन भूजल दोहन, शहरी सीवरेज, औद्योगिक प्रदूषण, नदी किनारों का अतिक्रमण और कृषि में कम जल-दक्षता जैसी चुनौतियां कायम हैं। अब सफलता का पैमाना दस्तावेजों की संख्या नहीं, बल्कि पुनर्जीवित जल निकाय, सुरक्षित जल स्रोत, उपचारित जल का पुन: उपयोग, जल-दक्ष कृषि और प्रभावी बाढ़ चेतावनी जैसे ठोस परिणाम होने चाहिए। अंततः प्रश्न यह नहीं कि भारत के पास कितना पानी है, बल्कि यह है कि उपलब्ध जल को हम कितनी समझदारी से बचाते, बांटते और भविष्य के लिए सुरक्षित रखते हैं। जल-सुरक्षा अब पर्यावरण का अलग विषय नहीं, भारत के भविष्य की आधारशिला है।

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