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पटरी पर ऊर्जा परिवर्तन की नई रफ्तार

भारतीय रेल की पटरियों पर ऊर्जा परिवर्तन की नई कहानी लिखी जा रही है। विद्युतीकरण ने डीजल की निर्भरता घटाई, अब एलएनजी और हाइड्रोजन नए विकल्प बनकर उभर रहे हैं

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नागार्जुन

भारतीय रेल का ऊर्जा परिवर्तन अब केवल विद्युतीकरण तक सीमित नहीं है। 27 सितंबर 2026 को साबरमती रेलवे स्टेशन से देश की पहली एलएनजी–डीजल द्वि-ईंधन डीईएमयू रेलगाड़ी को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने हरी झंडी दिखाई। आठ डिब्बों वाली यह ट्रेन अपनी उद्घाटन यात्रा में साबरमती से मेहसाणा जंक्शन तक चली। इसमें दो ड्राइविंग पावर कारों को इस तरह परिवर्तित किया गया है कि वे एलएनजी और डीजल, दोनों ईंधनों पर चल सकें। इससे पहले 17 जुलाई 2026 को हरियाणा के जींद–सोनीपत खंड पर देश की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ईंधन-कोशिका रेलगाड़ी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरी झंडी दिखाई थी। यानी जिन पटरियों पर कभी डीजल का दबदबा था, वहां अब ऊर्जा के नए विकल्प दस्तक दे रहे हैं।

स्वच्छ ऊर्जा की ओर रेलवे

भारतीय रेल ने डीजल पर निर्भरता तेजी से घटाई है। कर्षण-डीजल खपत 2015-16 के 293 करोड़ लीटर से लगभग 63 प्रतिशत घटकर 2024-25 में 108 करोड़ लीटर रह गई। इसी अवधि में ब्रॉडगेज नेटवर्क का लगभग 99.6 प्रतिशत विद्युतीकरण हो चुका है। अब एलएनजी और हाइड्रोजन, विद्युतीकरण के पूरक ऊर्जा-विकल्प के रूप में उभर रहे हैं।

एलएनजी-डीजल द्वि-ईंधन ट्रेन में डीजल की जगह लगभग 40 प्रतिशत एलएनजी प्रयुक्त होता है। 2,000 किलोमीटर से अधिक परीक्षण के बाद इसे सेवा में उतारा गया है। इसका महत्व उन मार्गों के लिए है, जहां तत्काल विद्युतीकरण व्यावहारिक नहीं है। यानी एलएनजी-डीजल डीईएमयू तकनीक डीजल की खपत में अधिकतम लगभग 40 प्रतिशत तक कमी ला सकती है, जो लगभग 43.2 करोड़ लीटर डीजल के बराबर होगा। । हालांकि किसी एक ट्रेन की वास्तविक वार्षिक बचत उसके मार्ग, भार और परिचालन पर निर्भर करेगी। रेलवे के परीक्षण-अनुमान के अनुसार, इससे प्रति पावर कार लगभग 11.9 लाख रुपये और आठ-कोच रेक से लगभग 23.9 लाख रुपये सालाना ईंधन-लागत बचत हो सकती है। दोनों मिलकर एक बड़े परिवर्तन की तस्वीर सामने रखते हैं—कम आयातित तेल, अधिक घरेलू ऊर्जा, स्वदेशी तकनीक और अधिक ऊर्जा सुरक्षा।

तीन रास्ते, एक लक्ष्य

भारतीय रेल की ऊर्जा यात्रा को तीन स्तरों में देखा जा सकता है। पहला, जहां संभव हो, वहां विद्युतीकरण सबसे प्रभावी विकल्प है। दूसरा, जिन परिचालनों में बिजली-आधारित व्यवस्था तत्काल उपलब्ध नहीं है, वहां एलएनजी-डीजल द्वि-ईंधन तकनीक डीजल की खपत घटाने वाला संक्रमणकारी विकल्प हो सकती है। तीसरा, चुनिंदा गैर-विद्युतीकृत मार्गों पर उपयुक्त लागत और ईंधन-भराई ढांचे के साथ हाइड्रोजन ईंधन-कोशिका ट्रेनें दीर्घकालीन विकल्प बन सकती हैं। हाइड्रोजन ईंधन-कोशिका ट्रेन भारतीय रेल की स्वदेशी परियोजना है। इसमें 8 यात्री डिब्बे और दो हाइड्रोजन शक्ति-कार हैं। प्रत्येक पावर कार की क्षमता 1,200 किलोवाट है। यानी कुल प्रणोदन (Propulsion) क्षमता 2,400 किलोवाट है। इसमें हाइड्रोजन को जलाया नहीं जाता, बल्कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की विद्युत-रासायनिक अभिक्रिया से बिजली बनती है, जो मोटरों और बैटरी प्रणाली को चलाती है। इसमें डीजल की तरह कार्बन डाइऑक्साइड और धुआं नहीं, बल्कि जलवाष्प निकलता है।

रेलवे के अनुसार, 1,200 किमी से अधिक के प्रारंभिक संचालन में इस ट्रेन ने 3,200 लीटर से अधिक डीजल की बचत की। हालांकि यह शुरुआती प्रदर्शन है, कोई स्थायी दक्षता-मानक नहीं। वास्तविक परिणाम मार्ग, भार, गति और परिचालन परिस्थितियों के अनुसार बदलेंगे। जींद में हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण और आपूर्ति की स्वदेशी व्यवस्था स्थापित भी विकसित की गई है।

इसी साल 17 जुलाई को जींद–सोनीपत खंड पर देश की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ईंधन-कोशिका ट्रेन का परिचलान शुरू हुआ

पर्यावरण की सुरक्षा

पर्यावरणीय लाभ को समझने के लिए यह याद रखना जरूरी है कि डीजल जलाने पर प्रति लीटर लगभग 2.68 किलोग्राम CO₂ (कार्बन डाइऑक्साइड) निकलता है। इस दहन-आधारित अनुमान से, यदि वर्ष 2024-25 की 108 करोड़ लीटर कर्षण-डीजल खपत को पूरी तरह शून्य या अत्यल्प-कार्बन ऊर्जा से बदला जाए, तो लगभग 28.9 लाख टन CO₂ से बचाव संभव होगा।

एलएनजी का लाभ यह है कि इसे मौजूदा डीजल आधारित प्रणाली में अपेक्षाकृत आसानी से अपनाया जा सकता है। यह स्थानीय वायु गुणवत्ता के लिए उपयोगी हो सकता है, क्योंकि डीजल की तुलना में एलएनजी कम CO₂, नाइट्रोजन ऑक्साइड और सूक्ष्म कणों जैसे प्रदूषकों का उत्सर्जन कम हो सकता है। लेकिन इसके लिए गैस आपूर्ति ढांचा, भंडारण और सुरक्षा प्रोटोकॉल चाहिए। साथ ही, परिवहन के दौरान मीथेन के रिसाव की चुनौती भी बनी रहती है।

दूसरी ओर, हाइड्रोजन दीर्घकालीन स्वच्छ ऊर्जा विकल्प है। ईंधन-कोशिका में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की अभिक्रिया से बिजली बनती है, जिसमें कार्बन उत्सर्जन की जगह जलवाष्प निकलती है। यह डीजल-इंजन वाली ट्रेनों की तुलना में स्थानीय वायु-प्रदूषण और प्रत्यक्ष कार्बन उत्सर्जन घटाने में सक्षम है। है। यदि हाइड्रोजन जीवाश्म ईंधन से बनी है, तो उसकी पूरी ऊर्जा-शृंखला में काफी उत्सर्जन हो सकता है। नवीकरणीय बिजली से पानी के विद्युत अपघटन से बना हरित हाइड्रोजन इस दिशा में सबसे स्वच्छ विकल्प है। जींद की परियोजना केवल एक हाइड्रोजन ट्रेन का प्रदर्शन नहीं है। इसमें हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण, ईंधन आपूर्ति और रेल प्रणोदन, पूरी व्यवस्था को एक साथ परखा जा रहा है। यही इसे भारतीय रेल के लिए डीजल-मुक्त गैर-विद्युतीकृत मार्गों की दिशा में एक महत्वपूर्ण पायलट बनाता है।

बिजली सबसे बड़ी जरूरत

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। 2024-25 में आयात निर्भरता लगभग 88.2 प्रतिशत थी। इसलिए रेलवे का डीजल खपत घटाना केवल प्रदूषण कम करने का कदम नहीं है। यह विदेशी मुद्रा बचाने और अंतरराष्ट्रीय तेल-कीमतों तथा भू-राजनीतिक जोखिमों से निर्भरता घटाने में भी मदद करता है।

हालांकि, भारतीय रेल की ऊर्जा-रणनीति का मुख्य आधार बिजली है। 2024-25 में कर्षण (Traction) के लिए लगभग 34.5 अरब यूनिट बिजली खपत की गई, जिस पर लगभग 32,378 करोड़ रुपये खर्च हुआ। विद्युतीकरण के विस्तार के साथ बिजली-खपत बढ़ना स्वाभाविक है। इसलिए असली चुनौती बिजली बचाने की नहीं, बल्कि इस बढ़ती मांग को स्वच्छ, घरेलू और किफायती स्रोतों से पूरा करने की है। जून 2026 तक रेलवे ने लगभग 1,161 मेगावाट सौर और 103 मेगावाट पवन क्षमता स्थापित की थी।

पटरी वही है, लेकिन ऊर्जा बदल रही है। भारतीय रेल पहले मुख्यतः डीजल पर निर्भर थी। अब विद्युतीकरण उसकी रीढ़ बन चुका है, जबकि एलएनजी–डीजल द्वि-ईंधन तकनीक संक्रमण का पुल और हाइड्रोजन ईंधन-कोशिका तकनीक संभावित अगली छलांग है। इस बदलाव का लक्ष्य केवल ट्रेनें चलाना नहीं, बल्कि आयातित तेल पर निर्भरता घटाकर भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और रेल ऊर्जा को धीरे-धीरे हरित बनाना है।

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